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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 28. भारतीजी के बाद पीछे     आगे

हमें गर्व है अपने देश भारत पर। हम मशीनरी बनाएँगे और अच्छे कागज भी। विद्यालय , महाविद्यालय ही नहीं उद्योगों का निर्माण भी करेंगे।

हम विनाश की राह नहीं अपनाएँगे , सच्चाई से बँधे रह कर महान कार्य करेंगे।

हम अपने देश भारत पर गर्व करेंगे।

जन्म से कोई श्रेष्ठ या महान नहीं होता। अपितु जीवन की राह में उनके किए गए कर्म उन्हें महान और श्रेष्ठ बनाते हैं। अपेक्षाकृत छोटे जीवन में जो व्यक्ति अपनी पहचान, ख्याति और श्रेष्ठता का दर्जा पा ले तो यह एक महत्वपूर्ण घटना है। भारतीजी ने अपने लघु जीवनकाल में ऐसा ही कुछ कर दिखाया। जब तबीयत बिगड़ी हुई तो उन्होंने सोचा था सुधर जाएगी। यहाँ तक कि 'स्वदेशमित्रन' कार्यालय में संदेशा भी पहुँचाया था कि दि. 12 सितंबर सोमवार को वो पहुँच जाएँगे। विधि ने काल का ऐसा खेल रचा कि उस दिन वो अपने सूक्ष्म रूप में परिवर्तित हो गए।

'स्वदेशमित्रन' दैनिक में, 'दक्षिण भारत के कविश्रेष्ठ श्री सुब्रमण्यम भारती का देहांत' शीर्षक से समाचार प्रकाशित हुआ। उसी दिन दैनिक का दूसरा अंक भी प्रकाशित हुआ, जिसमें भारतीजी का विस्तृत परिचय देते हुए समाचार भी विस्तार से प्रकाशित हुआ।

'हिंदू' दैनिक में उप संपादकीय में उनकी मृत्यु का हवाला देते हुए लिखा - ''वर कवि (अर्थात ईश्वर से कवित्व का वर प्राप्त किए हुए) श्री सुब्रमण्यम भारती के अकाल मृत्यु से देश ने एक स्वस्फूर्त पैदाइशी कवि एवं देशभक्त को खो दिया। इस हानि की पूर्ति होना लगभग असंभव है।''

कुछेक शोक सभाएँ हुई। कहीं उनके प्रशंसक शोक में डूबे हुए थे। उन्हें गुरु मानने वालों में से एक कनक लिंगम (हरिजन, जिन्हें भारती ने बाकायदा मंत्रोच्चार और होम-हवन के साथ जनेऊ धारण करवाया था) स्वयं को बिन गुरु के दीन-हीन मानने लगे। अनेक लोगों ने दैनिकों में अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

दूरदृष्टि और दीर्घ दृष्टि और अपने समय से आगे की सोच रखने वाले महान लोगों के साथ अधिकांश यही होता है। उनके जीवित अवस्था में उनकी उतनी कद्र नहीं होती जितनी होनी चाहिए। भारतीजी के साथ भी यही हुआ। आलेखों व श्रद्धांजलि के रूप में अनन्य लोगों की भावनाएँ काफी समय तक पत्र-पत्रिकाओं में, पत्रों में प्रकाशित हुई। भारतीजी अपनी सारी रचनाओं को पुस्तकाकार में देखने को उत्सुक थे। इसके लिए एक योजना भी बनाई थी। पर उनके जीवन काल में बहुत कम प्रकाशन हुआ। अधिकांश पुस्तकें मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुईं। उनकी अँग्रेजी भाषा की पुस्तकें भी तभी प्रकाशित हुई।

प्रकाशन के कार्य में उनके कई साथी व परिवार के लोग आगे आए और अपनी-अपनी तरह से सहायता की। भारती ने छोटे से जीवन काल में ही अपने लेखन को चालीस (40) पुस्तकों में बाँट कर प्रकाशन करवाने का सोच रखा था। पर उनकी वो इच्छा उनकी मृत्यु के बाद भी पूरी नहीं हुई।

भारतीजी का 'देशीय गीतंगल' 1928 में जब प्रकाशित हुआ तो उसी साल पहले जब्त हुआ। कोर्ट में बहस चली। बहस के दौरान जब संग्रह के कुछ गीत, राग और लय के साथ गाए गए और शेक्सपीयर और भारती की समानता होने लगी। 1929 में जब्ती का आदेश वापिस लिया गया और हर प्रति पर इस बाबत स्टांप लगा आदेश छपा। भारती को कुछ ने महाकवि मानने से इनकार भी किया। पर एक अच्छा कवि जरूर कहा। बहरहाल वो जनप्रिय कवि अवश्य थे और जनता की माँग थी कि उनकी याद को चिरस्मरणीय बनाया जाए। जब जनता की भावना उफान पर हो तो सरकार झुक जाती है। सितंबर 1945, भारती की पुण्यतिथि को भारती के जन्मस्थान पर 'भारती-मंडपम्' के लिए चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) ने नीव का पत्थर रखा। ये वही राजाजी थे जो भारती का परिचय तमिलनाडु के श्रेष्ठ कवि के रूप में महात्मा गांधी से करवा सकते थे। यदि उस दिन परिचय करवाते तो शायद भारती का बाद का जीवन तनिक आशाओं से भरा खुशहाल होता। जिससे तमिल जनता का आत्मविश्वास बढ़ जाता और भारती पर गर्व भी बढ़ जाता। 'भारती मंडपम्' के लिए 'कलकी' पत्रिका के रा. कृष्णमूर्ति ने अपनी पत्रिका में पहल की थी। 'कलकी' चेन्नै से निकलने वाली प्रतिष्ठित पत्रिका है जो वर्तमान में भी प्रकाशित हो रही है। कृष्णमूर्ति एक उदार, सहृदय समाजसेवी भी थे।

तमिल जनता ने इस उद्देश्यों के लिए जी खोल कर धन दिया। 1948 में पश्चिमी बंगाल के गवर्नर के रूप में कार्य कर रहे राजाजी ने ही इसका उद्घाटन किया। इस उत्सवी कार्यक्रम में चेन्नै से प्रतिनिधि दल एक सजी हुई स्पेशल ट्रेन में भारती की फोटो के साथ शामिल होने के लिए गए। राजनीति के हर दल के आदमी वहाँ उपस्थित थे और आपस में घुल मिल रहे थे। बंगला कलाकार हरीपद राय का बनाया भारती का चित्र तथा भारती की कुछ कविताओं की उनकी हस्तलिपि प्रति की छायाप्रतियाँ तथा उनकी प्रतिमा का भी अनावरण हुआ। इसकी देख-रेख के लिए एक ट्रस्ट बनाया गया और प्रति वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर 'भारती संगम' यहाँ बड़ा कार्यक्रम आयोजित करता है।

भारती मात्र तमिलनाडु के लाड़ले बन कर ही नहीं रह गए। इनकी कीर्ति देश के अन्य भागों और विदेशों में भी फैली। उनके जीवन काल में भी अनेक विदेशी ज्ञानियों ने उनकी कविताओं की भरपूर प्रशंसा की। आंध्र प्रदेश में इनकी कविताओं और गीतों का तेलुगू अनुवाद गाया और सराहा जाता है। आयरलैंड के महाकवि एच. कसिंस, जापान की राजधानी टोकियो में 'इंपीरीयल यूनिवर्सिटी' में अँग्रेजी के प्राध्यापक थे। इन्होंने भारती के कुछ गीतों का अँग्रेजी अनुवाद कर विदेशियों को अचंभित और आकर्षित किया। फ्रेंच में भी कुछ अनुवाद हुए हैं। स्वयं राजाजी ने कुछ कविता और गीतों का अँग्रेजी अनुवाद कर 'यंग इंडिया' में प्रकाशित करवाया। संस्कृत व हिंदी में भी कुछेक अनुवाद हुए हैं।

बिहार के एक कवि महेश नारायण सिंह चेन्नै के 'हिंदी प्रचार सभा' में कार्यरत थे। 1950 में उन्होंने हिंदी में कुछ अनुवाद किए और 'दक्षिण भारत', 'हिंदी प्रचार पत्रिका' आदि में प्रकाशित किए। विद्वान तथा हिंदी प्रेमी दक्षिण भारतीय आर.शौरीराजन ने भारती के गीत-कविताओं का अनुवाद हिंदी की गरिमामयी पत्रिका 'नवनीत' में प्रकाशित करवाए। साथ ही भारती पर कुछ आलेख लिख उन्हें भी प्रकाशित करवाया।

पूर्णम सोमसुंदरम ने भारती पर आलेखों को रूस की जनता के लिए रूसी में अनुवाद किया।

साहित्य अकादमी ने भारती के गीतों के संग्रह को हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में निकाला। नेशनल बुक ट्रस्ट ने नेहरू बाल पुस्तकालय के लिए सचित्र भारती चरित्र का निर्माण अनेक भारतीय भाषाओं में किया। यह एक आवश्यक कदम था। जिस महान कवि की प्रशंसा विदेश में हो रही हो उससे देश के विभिन्न हिस्सों की जनता परिचित न हो तो अनुचित होगा।

कविकोकिला सुश्री सरोजिनी नायडू ने भारती के लिए बहुत सुंदर उक्ति कही है - 'भारती भाषा की हदों को पार कर चुके हैं, वे तो संपूर्ण मानव समाज के साझा जायदाद हैं।'

1960 में भारती पर टिकट निकाले गए। कडैयम में अलग घर जहाँ रहते थे, उसे नगर निगम का पुस्तकालय व वाचनालय बना दिया गया है। लोग बड़ी तादाद में वहीं पढ़ने व किताबें घर ले जाने आते हैं।

इतना सब होने पर भी अगर हम उन्हें गहराई में, चौड़ाई में, विस्तार में या परिपूर्णता से नहीं समझ पाएँ तो शायद उनके विविध आयामों के साथ उनकी संपूर्णता को नहीं समझ पाएँगे। तब उनको सही पीढ़े पर बैठाकर गर्वित भी नहीं हो सकेंगे।

मात्र 39 वर्ष की आयु में भारती ने पार्थिव देह त्याग दिया था। इतनी सी कालावधि में उन्होंने नए शब्द गढ़े, नया रस पैदा किया और मठों और राजा-जमींदारों से एक तरह से छुड़ाकर क्लिष्ठ तमिल को सहज-सरल-सरस जनप्रिय और लोकप्रिय बनाया। तमिल को पुर्नजीवित करने में भारती का सहयोग तमिलभाषी और तमिल साहित्य प्रेमी कभी भुला नहीं सकते।


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