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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 4. तमिल प्रेम पीछे     आगे

मधुर तमिल भाषा चिरंजीवी हो , तमिलभाषी लंबी उम्र पाएँ हमारा महान देश चिरंजीवी हो जिसे भारत कहते है।

सुब्रमण्यमन के पिताश्री को अँग्रेजी भाषा, गणित व मशीनरी से जितना लगाव था, उतना ही वो इनसे दूर भागते थे। ये सब उन्हें करेले की तरह कड़वा लगता। बेटे को तमिल साहित्य, साहित्य के विद्वानों के बीच की बहस और चर्चा से अथाह प्रेम था। वो छोटा होते हुए भी अपने विचार रखता और विद्वानों से बहस करता। राजा साहब और उनके चाचाजी उसको शह देते।

एटैयापुरम में कंबन की रामायण के महापंडित एक वृद्ध सज्जन थे। अपनी मर्जी से उनके पास साहित्य के अध्ययन के लिए सुब्रमण्यमन और उनका एक दोस्त सोमसुंदरम जाया करते थे। मंदिर में उत्सवों के लिए जो पालकियाँ रखी रहती थी उनके बीच छिपकर बैठते और अध्ययन करते। दोनों के ही घरों में तमिल साहित्य के अध्ययन के लिए कोई उत्साह का वातावरण नहीं था। वरन अँग्रेजी सीखने का आग्रह ही अधिक था। हालाँकि उनके नाना ने उसके तमिल प्रेम को प्रोत्साहन दिया। पिता भी तमिल के खिलाफ नहीं थे, पर जीवन में उन्नति के रास्ते पर चलने के लिए उनके हिसाब से विज्ञान और अँग्रेजी अधिक आवश्यक थी। पर सुबैया तो कंबन और वल्लुवर को चख चुका था।

एटैयापुरम के राजा का तथा उनके साहित्य प्रेमी चाचा का सुब्बैया के प्रति स्नेह था। जब सुब्बैया के पिता घर पर होते तो वे राज प्रासाद में आकर राजा को अपनी बनाई कविताएँ सुनाते। छोटी सी उम्र में इतनी विद्वता और संवेदना देख कर राजा आश्चर्य से भर जाता। असल में यह बालक मानसिक परिपक्वता में अपनी उम्र से कहीं अधिक आगे था। राजा की सभा में बड़े-बड़े विद्वान थे जो उम्र और अनुभव में सुब्बैया से बहुत आगे थे। पर उनके बीच राजा को अपनी रची कविताएँ सुनाने में वो जरा भी न हिचकता। अपने विचार, अपनी बात निडर होकर सबके सामने रखता। उसकी इन्हीं बातों के कारण राजा सुब्बैया से स्नेह करते थे और उसके प्रति आदर भी प्रदर्शित करते थे। राजा की देखा-देखी सभा के विद्वजन भी सुब्बैया के प्रति आदर और स्नेह दिखाते। पर मन ही मन बालक से ईर्ष्या करते और उसे नीचा दिखाने का मौका ढूँढ़ते, तरह-तरह की युक्तियाँ सोचते। इसी समय ग्यारह वर्ष की ही उम्र में सभा के विद्वान पंडितों के बीच राजा ने सुबैया को 'भारती' की उपाधि से सुशोभित किया। भारती अर्थात वाग्देवी का ही दूसरा रूप। इस तरह बालक सुब्बैया बना सुब्रमण्यमन भारती।

भारती के पिताश्री को अपने बेटे का राजा के यहाँ जाना और कविता सुनाने की बात का पता नहीं था। एक दिन भरी सभा में राजा ने चिन्नस्वामी से कहा 'सुब्बैया जैसे पुत्र रत्न को पाकर आप तो धन्य हो गए। आपका बेटा एक दिन अवश्य ही अपने गाँव एटैयापुरम का नाम रोशन करेगा।'

चिन्नास्वामी अय्यर को कोई अंदाज ही नहीं था कि राजा साहब ऐसा क्यों बोल रहे हैं। वो तनिक डर भी गए थे और सकुचा रहे थे कि कदाचित उनके बेटे को चिढ़ाया जा रहा है। उनका प्रकृति प्रेमी बेटा घूमता रहता है, फूल-पत्ती, चिड़ियों आदि से ही नहीं स्वयं से भी बातें करता रहता है। बेटा निडर तो है ही कहीं उल्टा-सीधा कुछ बोल नहीं दिया हो। यही सब सोचते हुए, कुछ भयभीत होकर बोले - 'राजा साहब, मेरा बेटा नासमझ और नादान है। उसने कुछ गलत कहा या किया हो तो उसकी तरफ से मैं क्षमा माँगता हूँ।'

राजा को चिन्नस्वामी की मुद्रा और बातें सुन कर हँसी आ गई। 'मैं सत्य ही उसकी तारीफ कर रहा हूँ। आपकी गैर मौजूदगी में उसने स्वयं की बनाई कविताएँ मुझे सुनाई। नवरसों और उच्च भावों से भरपूर उसकी कविताओं की सरल, सरस भाषा ने मुझे मोह लिया। बालक की विद्वता का मैं कायल हो गया हूँ। कभी आप भी छुप कर सुनिए।'

चिन्नस्वामी अय्यर की जान में जान आई अपने बेटे की प्रशंसा से उनकी छाती गर्व से चौड़ी हो गई।

भारती किशोर विद्वान थे और अपने हास्यपूर्ण वार्तालाप से राजा का मनोरंजन करते थे। पर राजा की रसिक वृत्ति के अनुकूल श्रृंगार रस की रचनाएँ सुनाना या इस तरह की चर्चाएँ करना उनके बस का नहीं था ना ही उन्हें पसंद था। ऐसी स्थिति में वे स्वयं को असहज पाते। राजा की एक गलत नसीहत से उन्हें एक गलत आदत लगते-लगते रह गई। भारती दुबले-पतले शरीर के थे। राजा ने उनसे कहा 'तुम विद्वान तो हो पर शरीर से कमजोर हो। शरीर को भी ताकतवर बनाने के लिए एक चूर्ण है। इसका प्रतिदिन नियमित सेवन करने से खुलकर भूख लगती है जिससे तुम्हारी खुराक बढ़ेगी। अफीम-गांजे के नियमित सेवन से इनसान की भक्षण शक्ति बढ़ती है। गांजे का सेवन उन्होंने प्रारंभ अवश्य किया, पर अच्छा हुआ कि ये छोटे-मोटे प्रयोग उनकी आदत में शुमार नहीं हुए। बल्कि आगे चल कर इस घटना को भारती ने हास्य का बायस बनाया हुआ था।

भारती के साथ हुई उपरोक्त घटना से महात्मा गांधी के साथ घटी घटना की याद अनायास ही दिमाग में कौंध जाती है। गांधी जी भी दुबले-पतले थे और स्वयं के कुछ बड़ी उम्र के साथी के कहने पर चोरी से मांस खाने लगे। उनको उसका स्वाद अच्छा न लगने पर भी केवल शरीर को तगड़ा बनाने के उद्देश्यों से खाने लगे। इसके लिए पैसों की जरूरत पूरी करने के लिए चोरी भी की। पर अतिशीघ्र अपनी भूल को समझ कर अपने पिता को पत्र में पूरा ब्यौरा लिखकर क्षमा भी माँग ली। बालपन या किशोरावस्था में बच्चों को सही मार्गदर्शन न मिलने पर दूरगामी नुकसान हो सकता है।

चिन्नस्वामी की बड़ी इच्छा थी कि भारती को गणित तथा विज्ञान में पारंगत कर के उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजा जाए। उनका उद्देश्य था एक मशीनरी का कारखाना भारत में कही स्थापित किया जाए। वे तकनीकि शिक्षा के प्रति जूनून की हद तक आसक्त थे और इसके लिए उन्होंने कुछ पूँजी भी लगाई। पूँजी डूब गई, सब गँवा दिया। ऐसे में भारती को लेकर पाले गए ऊँचे-ऊँचे सपने तो क्या पूरे होते। भारती की विमाता के भी एक पुत्र और एक पुत्री हो गए थे और घर में सदस्यों की संख्या बढ़ गई थी। घर का खर्च ही कठिनाई से चल पाता था। तब तक भारती ने बारह वर्ष की उम्र में तिरूनेलवेली के हिंदू कॉलेज से नौंवी कक्षा पास की।

भारती में हास्य का बड़ा जबरदस्त माद्दा था। अपने गंभीरतम विचारों को भी व्यंग्य व हास्य में सराबोर करके व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने उसी समय किशोरावस्था में प्रवेश किया था। सो हमउम्र साथी इनके परिपक्व विचारों को समझ नहीं पाते थे। भाई-बहन उम्र में छोटे थे, उन्हें सुनाने का प्रश्न ही नहीं था। पिताश्री को सुनाने का साहस ही नहीं होता था, आखिर वो विद्वानों के भी पंडित थे। सो उनके विचार अन्य विद्वानों, जो उनसे उम्र में बहुत बड़े थे, को ही सुनाया करते थे। इनमें से कई उनसे खार खाते थे पर उनका भी साहस नहीं होता था कि भारती को छोटे हो या नासमझ हो कह कर दुत्कार दें।

देश की गुलामी से वो बहुत दुखी रहते थे। उन्हें लगता उनकी माँ ही कैद में है। दुख से कातर होकर भारत माता की आजादी के लिए क्रंदन भरी कविताएँ रचकर क्रांति घोष (नाद) करते। उस छोटी उम्र में ही उनके दिल में देश प्रेम का सैलाब सा उमड़ता था। अन्य विद्वान उन्हें नीचा दिखाने की जुगत भिड़ाते रहते पर उन पर इस सबका कुछ असर न होता। वो तो सतत पद्य रचना में लगे रहते जिससे पद्यों की संख्या अनगिनत हो गई थी। आगे चल कर सन 1912 के करीब उन्होंने अनेक प्रसिद्ध खंड काव्य की रचना की। इनमें भी 'पाँचाली शबदम्' में इन्होंने अपने दिल को निकाल कर रख दिया।


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