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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन


तुम मेरा प्रकाश हो और मैं तुम्हारा नेत्र। तुम बहती हुई मधु हो मैं मधु के पीछे उड़ता हुआ भँवरा।

भारती की सोच प्रगतिशील थी और वो अपने समय से बहुत आगे थे। अंधविश्वास का विरोध करते थे। विधवा विवाह की पैरवी करते, बालक-बालिका में भेद न करने का कहते। इसी तरह बाल विवाह का भी विरोध करते थे। पर उन्हें अपने पिता की जिद और हुक्म के आगे सिर झुकाना पड़ा। जब वो साढ़े चौदह वर्ष के थे तभी अपने से सात वर्ष छोटी चेल्लमा से विवाह करना पड़ा। उन दिनों विवाह के बाद पति-पत्नी लंबे समय तक आपस में बात नहीं करते थे। अन्य लोगों के सामने तो किसी भी हालत में नहीं। पर भारती ऐसे विचारों को परे सरका देता। वो तो चेल्लमा पर कविताएँ बनाते और जोर-जोर से उसका पाठ भी करते। छोटी सी चेल्लमा लाज से मर जाती और अन्य लोगों को मजाक करने और चिढ़ाने का कारण मिल जाता।

भारती के जीवन में उथल-पुथल की कमी नहीं थी। बचपन में माँ को खोया और अपने विवाह के एक वर्ष बाद किशोरावस्था में पिता का साया सिर से उठ गया। उस समय तक उनकी मसें भी भीगी नहीं थी। अपनी विमाता और भाई-बहन का भार कहाँ से उठा पाते। पिता की मृत्यु पर उनकी बुआ और फूफाजी इलाहाबाद से आए थे। भारती उस समय नौंवी कक्षा में थे। बुआ को उनकी शिक्षा की फिक्र हुई कि अधूरी न रह जाएँ। वो भारती को अपने साथ इलाहाबाद ले गईं। यायावरी तबीयत के भारती वैसे भी अपने छोटे से गाँव के बाहर निकलना ही चाहते थे।


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