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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 6. हाईस्कूल की शिक्षा पीछे     आगे

मेरे पिताश्री ने मुझे नेलै भेजा विदेशियों की कला सीखने को। यह उसी तरह था मानो सिंह शावक को जबरदस्ती घास खिलाई जा रही हो।

भारती को इलाहाबाद, काशी में पढ़ने का मौका मिल गया। उन दिनों काशी में अलग से सर्वकला शाला नहीं थी। इसलिए कलकत्ता की सर्वकला शाला की प्रवेश परीक्षा की तैयारी की। काशी के सेंट्रल हिंदू कॉलेज के दसवीं (आज के हायर सेकेंडरी) में दाखिला लिया। उनका मन पढ़ाई के निश्चित मानदंडों के बीच जरा भी नहीं रमता था। प्रतिदिन स्कूल जाना भी उन्हें नहीं भाता था। स्वच्छंद पक्षी की तरह अपनी मौज के अनुसार काम करना चाहते थे। कक्षा में शिक्षक पढ़ाते रहते और वो शिक्षक के बारे में हास्यपूर्ण कविताओं की पंक्तियाँ लिखते रहते। कागज के उस पुर्जे को पास के लड़के को देते। वो पंक्तियाँ इतनी सटीक होती कि उस लड़के की हँसी रुक न पाती। कागज का वो टुकड़ा कक्षा में यात्रा करता हुआ लगभग सभी छात्रों के पास जाता। पूरी कक्षा मुँह छुपा कर हँसने लगती तभी किसी न किसी बहाने भारती कक्षा से बाहर चले जाते।

भारती के परिजन की चिंता ये नहीं थी कि वो शिक्षा में पीछे रह जाएगा। उनका दुख ये था कि इतना होशियार बालक अपना पूरा ध्यान शिक्षा में नहीं लगा रहा है। उसके भविष्य की चिंता भी उन लोगों को सता रही थी। परिजनों की चिंता के विपरीत प्रवेश परीक्षा में वे प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। जब तक गाँव में रहे उन्हें तमिल और अँग्रेजी भाषा का ज्ञान ही था। काशी में रहते-पढ़ते हुए हिंदी तथा संस्कृत भाषा का ज्ञान आवश्यक हो गया था। उन्होंने दोनों ही भाषाओं पर अधिकार प्राप्त कर लिया और दोनों में भी प्रथम श्रेणी के अंक लाएँ। यह अत्यंत सुखद आश्चर्य था। कहा जाता है कि उनके हिंदी के उच्चारण अटपटे नहीं थे। वो जब हिंदी में बात करते तो ऐसा नहीं लगता था कि कोई दक्षिण भारतीय बोल रहा हो।

काशी प्रवास में उनका मनपसंद काम था गंगा के प्रवाह को देखते हुए घंटों गुजार देना। उन्हें गंगा नदी से अगाध स्नेह हो गया था। शाम को उनका ठौर गंगा किनारे होता या वो नाव में बैठ गंगा की सैर करने का अपना प्रिय शौक पूरा कर रहे होते। काशी वास ने धीरे-धीरे उन्हें अन्य भारतीय भाषाओं का भी ज्ञान करा दिया। यहाँ रहते हुए उनकी वेष-भूषा और चाल-ढाल में मामूली परिवर्तन भी आ रहा था। काशी में रहते हुए ही उन्होंने अपनी शिखा कटवा दी। इसी समय उत्तर भारतीय शैली में पगड़ी बाँधने लगे और मूँछें भी रख ली।

काशी प्रवास के आखरी पड़ाव में एक विद्यालय में 20 रु. मासिक पर शिक्षक के रूप में अपनी सेवा दी। हालाँकि उन्हें तमिल साहित्य से प्रेम था और तमिल कविताएँ उनके मुखश्री से स्वतः फूट पड़ती थी पर वे स्वयं अँग्रेजी कवि शैली के प्रशंसक थे। जब भी समय मिलता गंगा नदी के किनारे बैठ शैली की कविताएँ पढ़ते रहते। काशी में रहते हुए सरस्वती नवमी (दशहरे के पहले वाला दिन) के दिन 'स्त्री शिक्षा' पर जोरदार भाषण दिया। भाषण तमिल में ही था। उनकी मान्यता थी कि स्त्री शिक्षा के बिना देश उन्नति नहीं कर सकता। स्त्री-पुरुष की समानता की वकालत करते हुए नारी के प्रति अपनी अतिरिक्त श्रद्धा प्रकट की।

अब पूरे देश के हालात को पत्र-पत्रिकाओं द्वारा जानने-समझने लगे थे। बड़े-बड़े नेताओं के विचार व उद्घोषों से आवेश में आ जाते थे। आगे चलकर अँग्रेजों के प्रति यही आवेश उनकी विविध कविताओं तथा लेखों में दृष्टिगोचर हुआ। सन 1898 में हिंदू कॉलेज से उन्होंने मैट्रिक (10वीं) में सफलता प्राप्त की। संस्कृत तथा हिंदी में प्रथम आए।

रानी विक्टोरिया की मृत्यु के पश्चात एडवर्ड-सप्तम का सिंहासनारोहण हुआ। लॉर्ड कर्जन ने इस उपलक्ष्य में दिल्ली में एक वृहद आयोजन किया। इस समारोह में देश के समस्त राजा, महाराजाओं, तथा बड़े-बड़े भूपतियों (जमींदारों) को आमंत्रित किया गया था। एटैयापुरम के राजा को भी निमंत्रण मिला था। समारोह की समाप्ति पर राजा भारती से मिलने दिल्ली से काशी आए। उन्होंने भारती को पहले भी गाँव लौट आने के लिए कुछ पत्र लिखे थे। इन पत्रों में ये भी लिखा था कि उनको राजमहल के ही हिस्से में रहने को जगह दी जाएगी। भारती तो अपने मन के राजा थे। किसी के दया पात्र बन कर या किसी के दबाव में रहने का सोच ही नहीं सकते थे। अब राजा स्वयं ही मिलने आ गए थे। राजा ने उन्हें आश्वासन भी दिया कि उन पर राज्य का या उनका कोई दबाव नहीं रहेगा। भारती अपनी मर्जी के मालिक बने रहेंगे।

इसके अलावा राजा ने उन्हें एक बात और कही - 'तुम विवाहित हो, पत्नी को यूँ गाँव में अकेला छोड़कर तुम्हारा यहाँ रहना उचित नहीं है।

दूसरी घटना ये हुई कि भारती की पत्नी चेल्लमा के जीजा जी काशी यात्रा करके लौटे थे। उन्होंने कुछ सत्य कुछ मजाक में अपनी साली से कहा - 'तुम्हारा पति अँग्रेजों के विरुद्ध आग उगल रहा है। उसे पकड़ कर जेल में बंद कर दिया जाएगा। क्या पता देश निकाला या फाँसी की सजा ही हो जाएँ।' जीजा जी ने चेल्लमा को इतना भयभीत कर दिया कि उसने भारती को कई पत्र लिखे। हर पत्र में उन्हें शीघ्र लौटने को लिखती रही। इन दोनों घटनाओं ने भारती को गाँव लौटने पर बाध्य कर दिया, यह बात सही है। पर यह बात भी उतनी ही सत्य है कि भारती को अपने गाँव की याद और मातृभाषा के प्रति स्नेह और आदर उन्हें वापिस गाँव की तरफ खींच लाया।


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