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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 7. काशी से गाँव वापसी पीछे     आगे

जब मैं तमिलनाडु उच्चारित करता हूँ मेरे कानों में मधुर शहद घुल जाता है। जब मैं पुरखों के स्थान का उल्लेख करता हूँ मेरी साँस-साँस में नई ऊर्जा का संचार हो जाता है।

भारती यायावरी तथा फक्कड़ या औघड़ किस्म के इनसान थे सो धन की कमी हमेशा बनी रहती। काशी से गाँव लौटने के लिए भी राजा ने ही धन से मदद की। सन 1902 में चार वर्ष के काशी प्रवास के बाद अपने पैतृक गाँव लौट आए। जब तक वे काशी में रहे राजा उन्हें अपने पास आने के लिए पत्र लिखते थे और जब वो आ गए तो दोनों में अनबन बनी रहती थी। दोनों के बीच अहं का टकराव होता रहता। राजा तो आखिर सर्वेसर्वा होता है उसका अहं तो सर्वोपरि होता है। भारती को अपने 'भारती' होने का गर्व तो था ही फिर वो पैदाइशी स्वाभिमानी भी थे सो राजा के सामने आम जन की तरह हाथ जोड़े नतमस्तक हो खड़े नहीं रह पाते। राजा ने भारती को कोई नियत कार्य और नियत वेतन तय नहीं किया था। एक तरह से उनकी दया पर ही भारती की रोजी-रोटी चलनी थी। यह स्थिति किसी भी तरह अच्छी नहीं मानी जा सकती थी क्योंकि इसमें कोई इनसान निश्चिंत होकर कोई भी रचनात्मक कार्य नहीं कर सकता था। राजा लोगों की सोच और सहानुभूति का रुख बदल जाए तो फिर इनसान को पुरानी स्थिति में आ जाना पड़ता है। वैसे भी एटैयापुरम के राजा का व्यवहार ठीक वैसा ही था जैसा अंधेर नगरी में चौपट राजा का था। एक तरफ तो ऐसी परिस्थिति में किसी की दया पर जीवन निर्वाह करना किसी भी तरह गवारा नहीं था, साथ ही ये प्रश्न भी सिर उठाकर उन्हें बार-बार परेशान कर रहा था कि जीवन निर्वाह के लिए वे क्या कुछ कर सकते हैं।

राजा रसिक नहीं रसिया था। श्रृंगार रस, नाच-गान में उनका मन अधिक लगता था। वो चाहते थे भारती इन सब रास-रंगों में उनका साथ दे। बाद में कभी भारती ने हास्य में कहा भी था - 'राजा की ऐसी बातों और रसिया छवि ने मुझे अँग्रेज सरकार के कानूनों और बंधनों से भी अधिक डराया था।'

ऐसा कहा जाता है कि उस समय एक घटना भी हुई थी - राजा जब सड़क पर निकलते तो सब नजरें झुकाए, मुँह पर हाथ रख आदर के साथ खड़े हो जाते। ये भारती को नागवार लगता और वो इस तरह का व्यवहार नहीं कर पाते। किसी ने उन्हें टोका तो उनका जवाब था - 'एटैयापुरम बहुत ही छोटी सी जगह है, जब कि दुनिया बहुत बड़ी है।' उनका आशय था कि राजा कोई महामानव नहीं है, दुनिया में कई महान लोग हैं जिनके लिए मन स्वयमेव आदर से भर जाता है। ये बात जानबूझकर किसी ने बढ़ा-चढ़ाकर राजा के कान तक पहुँचा दी। राजा ने भारती को अपने महल से निकाल दिया।

उसी समय एटैयापुरम में आग लगने की बहुत-बड़ी घटना हुई थी। इस पर भारती ने तुकबंदी की कि 'एक युग में लंकापति ने एक कपि का अपमान किया तो लंका जल गई। एटैयापुरम के राजा ने एक कवि का अपमान किया तो एटैयापुरम जल कर श्मशान हो गया।

भारती काशी से एटैयापुरम लौट तो आए पर यहाँ के वातावरण में संवेदनाओं तथा भावों से भरी उनकी स्तरीय कवित्त को अधिक महत्व नहीं मिल रहा था। भारती को अपने लिए ऐसे कार्य की तलाश थी जिसमें उन्हें आत्मसंतोष भी मिले। सो राजा के यहाँ रहने में उनके स्वाभिमान को ठेस लगती थी। जब तक उनको ऐसा कोई काम न मिल जाएँ वो बैचेन ही रहते और एक जगह टिकने वालों मे से भी नहीं थे। महान व्यक्ति की ये एक पहचान भी होती है और गुण भी कि जब तक उन्हें माकूल काम न मिल जाएँ मन की चंचलता बनी रहती है। गांधीजी को भी जब तक अहिंसात्मक सत्याग्रह का अस्त्र नहीं मिला था, उनमें बैचेनी और मन की चंचलता बनी हुई थी। आत्म विवेचन में लीन व्यक्तियों के साथ ये बैचेनी तब तक बनी रहती है जब तक एक संतोषप्रद हल न निकल पाएँ।

एटैयापुरम में वे अँग्रेजी कवि शैली की रचनाओं की खूबियों से कवि-रसिकों को परिचित कराना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने रसिक-श्रोता दल का गठन किया। उसका नाम था 'शैलीज गिल्ड' । शैलीदासन के उपनाम से कई लेखों की रचना भी की। अँग्रेजी साहित्य में चौदह पंक्तियों की कविता होती है जिसे सॉनेट कहा जाता है। भारती ने तमिल में इस तरह के लेखन का प्रयास किया। वैसे सन 1902 में श्री सूर्यनारायण शास्त्री ने तमिल में इस तरह के सॉनेट की पुस्तक प्रकाशित की थी। भारती की इसी तरह के प्रारूप में पहली कविता 'विवेकभानु' पत्रिका के जुलाई 1904 के अंक में प्रकाशित हुई थी।

राजा की संस्था से अलग तो हो गए पर अब गुजर-बसर का क्या करें? उनके परिजन पूछते कि एक स्थिर और निश्चित शाखा को पकड़े हुए तो थे फिर एक अनेदखे, अनिश्चित शाखा को कैसे पकड़ोगे।

भारती मुस्कुराते हुए जवाब देते - 'ये खतरा तो लेना ही पड़ेगा, वरना पुरानी शाखा हाथ से छूटेगी कैसे? कोई दुस्साहस से पूछता - 'दूसरी शाखा हाथ के पकड़ में ही न आ पाए तो?

'तो क्या, बंदर की तरह नीचे गिर कर सिर फूटेगा। पर पहले ही उससे डरना भी तो उचित नहीं है।'


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