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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 8. साहित्य के शिक्षक पीछे     आगे

मैं जितनी भाषाओं की जानकारी रखता हूँ तमिल सी मीठी कोई नहीं।

मधुर मधु की जैसे तमिल को पूरे संसार में फैला दें।

ये अच्छा हुआ कि उनकी बंदर की तरह बुरी गति नहीं हुई। मदुरै (उस समय के पाँड्य प्रदेश) में सेतुपति हायर सकेंडरी स्कूल में तमिल साहित्य के शिक्षक की जगह खाली हुई थी। एटैयापुरम से मदुरै 90-100 कि.मी. दूर है। 1901-1902 के दरम्यान करीब डेढ़ वर्ष वहाँ रहे। भारती को तमिल साहित्य के व्याकरण का अधिक ज्ञान नहीं था। सच बात तो ये थी कि उन्हें व्याकरण का अध्ययन भाता ही नहीं था। अपनी पद्य रचनाओं और छंदों के लिए उन्हें भारती की उपाधि मिली थी। इसी कारण सहजता से नौकरी मिली थी। कम उम्र के तो थे ही, शरीर से भी दुबले-पतले थे। यहाँ तक कि कक्षा के कुछ लड़के उनसे उम्र में भी बड़े थे और ऊँचे-पूरे ताकतवर भी थे। ये सारे कारण ऐसे थे, जिस कारण उन्होंने वहाँ लंबे समय रहने का मुगालता नहीं पाला। पर शिक्षक की नौकरी छोड़ते तो जाते कहाँ?

ऐसे हालातों में मानों उन्हें ईश्वरीय सहायता मिली। मद्रास (आज का चैन्नै) की एक पत्रिका 'स्वदेश मित्रन' के संपादक स्व. श्री सुब्रम्हणीय अय्यर मदुरै आए थे। मदुरै में उनका परिचय भारती से हुआ और वो उनसे बहुत प्रभावित हो गए। उन्होंने उसी समय मन में ठान लिया कि भारती को 'स्वदेशमित्रन' पत्रिका में काम देंगे। श्री सुब्रम्हणीयम उदार प्रकृति के विशाल मना थे। तमिल जनों को सही राह दिखाने वाले व्यक्ति यही सज्जन थे। पत्रिका में काम करने का उनका आग्रह भारती टाल नहीं पाए। जीवन निर्वाह के लिए नौकरी तो करनी ही थी, साथ ही देशप्रेम-देशभक्ति की प्यास को शांत करने का जरिया भी मिल रहा था। मदुरै छोड़कर चैन्नै चले गए।


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