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कविता संग्रह

कबीर ग्रंथावली
कबीर
संपादन - श्याम सुंदर दास

अनुक्रम परिशिष्ट : सोलह पीछे     आगे

ज्यों कपि के कर मुष्टि चरन की लुब्धि न त्यागि दयो।
जो जो कर्म किये लालच स्यों ते फिर गरहि परो॥
भगति बिनु बिरथेे जनम गयो।
साध संगति भगवान भजन बिन कही न सच्च रह्यो॥
ज्यों उद्यान कुसुम परफुल्लित किनहि न घ्राउ लयो॥
तैसे भ्रमत अनेक जोनि महि फिरि फिरि काल हयो॥
या धन जोबन अरु सुत दारा पेखन कौ जु दयो॥
तिनहीं माहि अटकि जो उरझें इंद्री प्रेरि लयो॥
औध अनल तन तिन को मंदर चह दिसि ठाठ ठयो॥
कहि कबीर भव सागर तरन कौ मैं सति गुरु ओट लयो॥101॥

 

ज्यों जल छोड़ि बाहर भयो मीना। पूरब जनम हौं तप का हीना॥
अब कहु राम कवन गति मोरी। तजीले बनारस मति भई थोरी॥
सकल जनम सिवपुरी गवाया। मरती बार मगहर उठि आया॥
बहुत बरस तप कीया कासी। मरन भया मगहर कौ बासी॥
कासी मगहर सम बीचारी। ओछी भगति कैसे उतरसि पारी॥
कहु गुरु गजि सिव सबको जामै। मूवा कबीर रमत श्रीरामै॥102॥

ज्योति की जाति जाति की ज्योति। तितु लागे कंचुआ फल मोती।
कौन सुघर जो निभौं कहियै। भव भजि जाइ अभय ह्नै रहियै॥
तट तीरथ नहि मन पतियाइ। चार अचार रहे उरझाइ।
पाप पुन्य दुइ एक समान। निज घर पारस तजहु गुन आन॥103॥

टेढ़ी पाग टेढ़े चले लागे बीरे खान॥
भाउ भगति स्यो काज न कछु ए मेरो काम दीवान॥
राम बिसारौं है अभिमानी।
कनक कामिनी महा सुंदरी पेखि पेखि सचु मानी।
लालच झूठ बिकार महा मद इह विधि औध बिहानी॥
कहि कबीर अंत की बेर आई लागौ काल निदानी॥104॥

डंडा मुद्रा खिंथा आधारी। भ्रम कै भाई सबै भेषधारी।
आसन पवन दूरि करि बवरे। छोड़ि कपट नित हरि भज बवरे॥
जिह तू याचहि सो त्रिभुवन भोगी। कहि कबीर कैसो गज जोगी॥105॥

तन रैनी मन पुनरपि करिहौ पाचौ तत्व बराती॥
राम राइ स्यों भांवरि लैंहो आतम तिह रंगराती॥
गाउ गाउ री दुलहिनी मंगलचारा।
मेरे गृह आये राजा राम भतारा॥
नाभि कमल मुहि बेदी रचि ले ब्रह्म ज्ञान उच्चारा॥
राम राइ स्यों दूल्हो पायो अस बड़ भाग हमारा॥
सुर नर मुनि जन कौतक आये कोटि तैतीसो जाना॥
कहि कबीर मोहि ब्याहि चले हैं पुरुष एक भगवाना॥106॥

तरवर एक अनंत डार साखा पुहुप पत्रा रस भरिया॥
इह अमृत की बाड़ी है रे तिन हरि पूरै करिया॥
जानी जानी रे राजा राम की कहानी।
अंतर ज्योति राम परगासा गुरु मुख बिरलै जानी॥
भवर एक पुहुप रस बीधा बार हले उर धरिया॥
सोरह मध्ये पवन झकोरो आकासे फर फरिया॥
सहज सुन्न इक बिरवा उपज्या धरती जलहर सोख्या॥
कहि कबीर हौ ताका सेवक जिनका इहु बिरवा देख्या॥107॥

टूटे तागे निखुटी पानि। द्वार ऊपर झिलिकावहि कान॥
कूच बिचारे फूए फाल। या मुंडिया सिर चढ़िबो कान॥
इहु मुंडिया सगलो द्रव खोई। आवत जात ना कसर होई॥
तुरी नारि की छोड़ि बाता। राम नाम वाका मन राता॥
लरिकी लरिकन खैबो नाहि। मुंडिया अनुदिन धाये जाहि॥
इक दुइ मंदर इक दुइ बाट। हमकौ साथरु उनको खाट॥
मूंड पलोसि कमर बंधि पोथी। हमकौ चाबन उनकौ रोटी॥
मुंडिया मुंडिया हुए एक। ए मुंडिया बूडत की टेक॥
सुनि अधली लोई बेपीर। इस मुंडियन भजि सरन कबीर॥108॥

तू मेरो मेरु परबत सुवामी ओट गही मैं तेरी॥
ना तुम डोलहु ना हम गिरते रखि लीनी हरि मेरी॥
अब तब जब तूही तूही। हम तुम परसाद सुखी सदाहीं॥
तोरे भरोसे मगहर बसियो। मेरे तन की तपति बुझाई॥
पहिले दर्सन मगहर पायो। फुनि कासी बसे आई।
जैसा मगहर तैसा कासी हम एकै करि जानी॥
हम निर्धन ज्यों इह धन पाया मरते फूटि गुमानी॥
करे गुमान चुभहिं तिसु सूला कोऊ काढ़न कौ नाहीं॥
अजै सुचोभ को बिलल बिलाते नरके घोर पचाहीं॥
कौन नरक क्या स्वर्ग बिचारा संतन दोऊ रादे॥
हम काहू की काणि न कढ़ते अपने गुरु परसादे॥
अब तौ जाइ चढ़े सिंहासन मिलिहैं सारंगपानी॥
राम कबीरा एक भये हैं कोई न सकै पछानी॥109॥

थरथर कंपै बाला जीउ। ना जानौ क्या करसी पीउ॥
रैनि गई मति दिन भी जाइ। भवर गये बग बैठे आइ॥
काचै करबै रहै न पानी। हंस चला काया कुम्हिलानी॥
क्वारी कन्या जैसे करत सिंगारा। क्यों रलिया मानै बोझ भतारा॥
काग उड़ावत भुजा पिरानी। कहि कबीर इह कथा सिरानी॥110॥

 

थाके नयन òवण सुनि थाके थाकी सुंदर काया।
जरा हाक दी सब मति थाकी एक न थाकिस माया॥
बावरै तै ज्ञान बिचार न पाया बिरथा जनम गंवाया॥
तब लगि प्रानी तिसे सरेबहु जब लगि मही सांसां॥
जे घट जाइत भाव न जासी हरि के चरन निवासा॥
जिसको सबद बसावै अंबर चूकहि तिसहि पियासा॥
हुक्मैं बूझै चौपड़ी खेलै मन जिन ढाले पासा॥
जो मन जनि भजहि अवगति कौ तिनका कछू न नासा॥
कहु कबीर ते जन कबहु न हारहिं ढालि जु जानहिं पासा॥111॥

दरमादे ठाढ़े दरबारि।
तुझ बिन सुरति करै को मेरी दर्सन दीजै खोलि किवार॥
तुम धन धनी उदार तियारी òवनन सुनियत सुजस तुमार॥
माँगौ काहि रंक सब देखौ तुम ही ते मेरो निसतार।
जयदेव नामा बिष्प सुदामा तिनकौ कृपा भई है अपार॥
कहि कबीर तुम समरथ दाते चारि पदारथ देत न बार॥112॥

दिन ते पहर पहर ते घरियाँ आयु घटै तनु छीजै।
कौल अहेरी फिरहि बधिक ज्यों कहहु कौन बिधि कीजै॥
सो दिन आवन लागा।
माता पिता भाई सुत बनिता कहहु कोऊ है काका।
जग लगु जोति काया महि बरतै आपा पसू न बूझै॥
लालच करै जीवन पद कारन लोचन कछू न सूझै।
कहत कबीर सुनहु रे प्रानी छोड़हु मन के भरमा॥
केवल नाम जपहु रे प्रानी परहु एक ही सरना॥113॥

दीन बिसारो रे दीवाने दीन बिसारो।
पेट भरो पसुआ ज्यों सोयो मनुष जनम है हारो॥
साध संगति कबहु नहिं कीनी रचियो धंधै झूठ॥
स्वान सूकर बायस सम जीवै भटकत चाल्यो ऊठि॥
आपन की दौरघ करि जानै औरन कौ लघु मान॥
मनसा वाचा करमना मैं देखे दोजक जान॥
कामी क्रोधी चातुरी बाजीगर बेकाम॥
निंदा करते जनम सिरानी कबहु न सिमरो राम॥
कहि कबीर चेतै नहिं मूरख मुगध गवार।
राम नाम जानियो नहीं, कैसे उतरसि पार॥114॥

दुइ दुइ लोचन पेखा। हौं हरि बिन और न देखा॥
नैन रहे रंग लाई। अब बेगल कहन न जाई॥
हमारा भर्म गया भय भागा। जब राम नाम चितु लागा॥
बाजीगर डंक बजाई। सब खलक तमासे आई॥
बाजीगर स्वांग सकेला। अपने रंग रवै अकेला॥
कथनी कहि धर्म न जाई। सब कथि कथि रही लुकाई॥
जाकौ गुरु मुखि आप बुझाई। ताके हिरदै रह्या समाई॥
गुरु किंचित किरपा कीनी। सब तन मन देह हरि लीनी॥
कहि कबीर रंगि राता। मिल्यो जग जीवनदाता॥115॥

 

दुनिया हुसियार बेदार जगत मुसियत हौरे भाई॥
निगम हुसियार पहरुआ देखत जम ले जाई॥
नीबु भयो आंबु आंबु भयो नींबा केला पाका झारि॥
नालिएर फल सेबरिया पाका मूरख मुगध गवार॥
हरि भयो खांडु रे तुमहि बिखरियो हस्ती चुन्यो न जाई।
कहि कबीर कुल जाति पांति तजि चींटी होइ चुनि खाई॥116॥

देखो भाई ज्ञान की आई आँधी।
सबै उड़ानी भ्रम की टाटी रहै न माया बाँधी॥
दुचिते की दुई थूनि गिरानीं मोह बलेड़ा टूटा॥
तिष्णा छानि परी घर ऊपर दुमिति भाँड़ा फूटा॥
आँधी पाछै जो जल बर्षे तिहि तेरा जन भींना॥
कहि कबीर मग भया प्रगासा उदय भानु जब चीना॥117॥

देइ मुहार लगाम पहिरावौ। सगल के पावड़े पग धरि लीजै॥
अपने बिचारै असवारी कीजै। सहज के पावड़े पग धरि लीजै॥
चलु रे बैकुंठ तुझहि ले तारी। हित चित प्रेम के चाबुक मारी॥
कहत कबीर भले असवारा। बेद कतेब ते रहहि निरारा॥118॥

देही गावा जीउ धर्म हत उवसहि पंच किरसाना॥
नैनू नकटू òवन रसपति इंद्री कह्या न माना॥
बाबा अब न बसहु इहु गाउ।
घरी घरी का लेखा माँगै काइथु चेतू नाउ।
धर्मराय जब लेखा माँग बाकी निकसी भारी॥
पच कृसनवा भागि गये लै बाध्यौ जोउ दरबारी॥
कहहि कबीर सुनहु रे संतहु खेतहि करौ निबेरा॥
अबकी बार बखसि बंदे को बहुरि न भव जल फेरा॥119॥

धन्न गुपाल धन्न गुरुदेव। धन्न अनादि भूखे कब लुटह केव॥
धन ओहि संत जिन ऐसी जानी। तिनको मिलिबो सारंगपानी॥
आदि पुरुष ते होई अनादि। जपियै नाम अन्न कै सादि॥
जपियै नाम जपियै अन्न। अभै कै संग नीका बन्न॥
अन्ने बाहर जो नर होवहिं। तीनि भवन महि अपनो खोवहिं॥
छोड़हि अन्न करै पाखंड। ना सोहागनि ना बोहि रंग॥
जग महि बकते दूधाधारी। गुप्ती खावहि बटिका सारी॥
अन्नै बिना न होइ सुकाल। तजियै अन्न न मिलै गुपाल॥
कहु कबीर हम ऐसे जान्या। धन्न अनादि ठाकुर मन मान्या॥120॥


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