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कविता संग्रह

कबीर ग्रंथावली
कबीर
संपादन - श्याम सुंदर दास

अनुक्रम साखी - पारिष कौ अंग पीछे     आगे

जग गुण कूँ गाहक मिलै, तब गुण लाख बिकाइ।
जब गुण कौ गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाइ॥1॥
(टिप्पणी: ख-प्रति में इसके आगे यह दोहा है-

कबीर मनमना तौलिए, सबदाँ मोल न तोल।
गौहर परषण जाँणहीं, आपा खोवै बोल॥7॥)

कबीर लहरि समंद की मोती बिखरे आइ।
बगुला मंझ न जाँणई, हंस जुणे चुणि खाइ॥2॥

हरि हीराजन जौहरी, ले ले माँडिय हाटि।
जबर मिलैगा पारिषु, तब हीराँ की साटि॥3॥740॥
(टिप्पणी: ख-प्रति में इसके आगे ये दोहे हैं-

कबीर सपनही साजन मिले, नइ नइ करै जुहार।
बोल्याँ पीछे जाँणिए, जो जाको ब्योहार॥4॥

मेरी बोली पूरबी, ताइ न चीन्है कोइ।
मेरी बोली सो लखै, जो पूरब का होइ॥5॥)


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