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कविता संग्रह

कबीर ग्रंथावली
कबीर
संपादन - श्याम सुंदर दास

अनुक्रम परिशिष्ट : तेरह पीछे     आगे

काया कलालनि लादनि मेलै गुरु का सबद गुड़ कीनु रे।
त्रिस्ना काल क्रोध मद मत्सर काटि काटि कसु दीन रे॥
कोई हेरै संत सहज सुख अंतरि जाको जप तप देउ दलाली रे॥
एक बूँद भरि तन मन देवो जोमद देइ कलाली रे॥
भुवन चतुरदस भाठी कीनी ब्रह्म अगिन तन जारी रे॥
मुद्रा मदक सहज धुनि लागी सुखमन पोचनहारी रे॥
तीरथ बरत नेम सचि संजम रवि ससि गहनै देउ।
सुरति पियास सुधारस अमृत एहु महारसु पेउ रे॥
निर्झर धार चुऔ अति निर्मल इह रस मुनआ रातो रे॥
कहि कबीर सगले मद छूछे इहै महारस साचो रे॥41॥

 

कालबूत की हस्तनी मन बौरा रे चलत रच्यो जगदीस।
काम सुजाइ गज बसि परे मन बौरा रे अकसु सहियो सीस॥
बिषय बाचु हरि राचु समझु मन बौरा रे।
निर्भय होइ न हरि भजे मन बौरा रे गह्यो न राम जहाज॥
मर्क्कट मुष्टी अनाज की बन बौरा रे लीनी हाथ पसारि॥
छूटन को संसा पर्‌या मन बौरा रे नाच्यो घर घर बारि॥
ज्यो नलनी सुअटा गह्यो मन बौरा रे माया इहु ब्योहारु॥
जैसा रंग कसुंम का मन बौरा रे त्यों पसरो पासारु॥
न्हावन को तीरथ घने मन बौर रे पूजन को बहु देव॥
कबीर छूटत नहीं मन बौर रे छूट न हरि की सेव॥42॥

काहू दीने पाट पटंबर काहू पलघ निवारा।
काहू गरी गोदरी नाहीं काहू खान परारा॥
अहि रख बादु न कीजै रे मन सुकृत करि करि लीजै रे मन॥
कुमरै एक जु माटी गंधी बहु बिधि बानी लाई॥
काहू कहि मोती मुकताहल काहू ब्याधि लगाई॥
सूमहि धन राखन कौ दीया मुगध कहै धन मेरा॥
जम का दंड मुंड महि लागै खिन महि करै निबेरा॥
हरि जन ऊतम भगत सदावै आज्ञा मन सुख पाई॥
जो तिसु भावै सति करि मानै भाणा मंत्रा बसाई॥
कहै कबीर सुनहु रे संतहु मेरी मेरी झूठी॥
चिरगट फारि चटारा लै गयो तरी तागरी छूटी॥43॥

किनहीं बनज्या कांसा तांबा किनही लोग सुपारी।
संतहु बनज्या नाम गोबिंद का ऐसी खेप हमारी॥
हरि के नाम व्यापारी।
हीरा हाथ चढ़ा निर्मोलक छूटि गई संसारी॥
साँचे लाए तो संच लागे सांचे के ब्योपारी॥
सांची वस्तु के भार चलाए पहुँचे जाइ भंडारी॥
आपहि रतन जवाहर मानिक आपै है पासारी॥
आपै ह्नै दस दिसि आप चलावै निहचल है ब्यापारी॥
मन करि बैल सुरति करि पेडा ज्ञान गोनि भरी डारी।
कहत कबीर सुनहु रे संतहु निबही खेप हमारी॥44॥

कियौ सिंगार मिलन के ताई। हरि न मिले जगजीवन गुसाई॥
हरि मेरौ पितर हौं हरि की बहुरिया। राम बड़े मैं तनक लहुरिया॥
धनि पिय एकै संग बसेरा। सेज एक पै मिलन दुहेरा॥
धन्न सुहागिन जो पिय भावै। कहि कबीर फिर जनमि न आवै॥45॥

 

कूटन सोइ जु मन को कूटै। मन कूटै तो जम तै छूटै॥
कुटि कुटि मन कसवही लावे। सो कूटनि मुकति बहु पावै॥
कूटन किसै कहहु संसार। सकल बोलन के माहि बिचार॥
नाचन सोइ जु मन स्यौ नाचै। झूठ न पतियै परचै साचै॥
इसु मन आगे पूरै ताल। इसु नाचन के मन रखवाल॥
बाजारी सो बजारहिं सोधै। पाँच पलीतह को परबोधै॥
नव नायक की भगतिप छाने। सो बाजारी हम गुरु माने॥
तस्कर सोइ जिता तित करै। इंद्री कै जतनि नाम ऊचरै॥
कहु कबीर हम ऐसे लक्खन। धन्न गुरुदेव अतिरूप बिचक्खन॥46॥

कोऊ हरि समान नहीं राजा।
ए भूपति सब दिवस चारि के झूठे करत दिवाजा॥
तेरो जन होइ सोइ कत डोलै तीनि भवन पर छाजा॥
हात पसारि सकस्ै को जन को बोलि सकै न अंदाजा॥
चेति अचेति मूढ़ मन मेरे बाजे अनहद बाजा॥
कहि कबीर संसा भ्रम चूको ध्रुव प्रह्लाद निवाजा॥47॥

कोटि मूर जाके परगास। कोटि महादेव अरु कविलास॥
दुर्गा कोटि जाकै मर्दन करै। ब्रह्मा कोटि बेद उच्चरै॥
जौ जांनौ तौ केवल राम। आन देव स्यो नाहीं काम॥
कोटि चंद्र में करहि चराक। सूर तेतीसौ जेवहि पाक॥
नवग्रह कोटि ठाढे़ दरबार। धर्म कोटि जाके प्रतिहार॥
पवन कोटि चौबारे फिरहिं। बासक काटि सेज बिस्तरहिं॥
समुंद्र कोटि जाके पनिहार। रोमावलि कोटि अठारहि भार॥
कोटि कुबेर भरहिं भंडार। कोटिक लखमी करै सिंगार॥
कोटिक पाप पुन्य बहु हिराहि। इंद्र कोटि जाके सेवा कराहि॥
छप्पन कोटि जाके प्रतिहार। नगरी नगरी खियत अपार॥
लट छूटी बरतै बिकराल। कोटि कला खेलै गोपाल॥
कोटि जग जाकै दरबार। गंधर्व कोटहिं करहिं जयकार॥
बिद्या कोटि सबे गुन कहै। ताउ पारब्रह्म का अंत न लहै॥
बावन कोटि जाकै रोमवली। रावन सैना जहँ ते छली॥
सहस कोटि बहु कहत पुरान। दुर्योधन का मथिया मान॥
कंद्रप कोटि जाकै लवै न धरहिं। अंतर अंतर मनसा हरहिं॥
कहि कबीर सुनि सारंगपान। देहि अभयपद मानो दान॥48॥

कोरी को काहु भरम न जाना। सब जग आन तनायो ताना।
जब तुम सुनि ले बेद पुराना। तब हम इतनकु पसरो ताना॥
धरनि अकास की करगह बनाई। चंद सुरज दुह साथ चलाई॥
पाई जोरि बात इक कीनी तह ताती मन माना॥
जोलाहे घर अपना चीना घट ही राम पछाना॥
कहत कबीर कारगह तोरी। सूतै सूत मिलाये कौरी॥49॥

भव निधि तरनतारन चिंतामनि इक निमिष इहु मन लागा॥
गोबिंद हम ऐसे अपराधी।
जिन प्रभु जीउ पिंड था दीया तिसकी भाव भगति नहिं साधी।
परधन परतन परतिय निंद्रा पर अपवाद न छूटै॥
आवागमन होत है फुनि फुनि इहु पर संग न छूटै॥
जिह घर कथा होत हरि संतन इक निमष न कीनो मैं फेरा॥
लंपट चोर धूत मतवारे तिन संगि सदा बसेरा॥
दया धर्म औ गुरु की सेवा ए सुपनंतरि नाहीं॥
दीन दयाल कृपाल दमोदर भगति बछल भैहारी॥
कहत कबीर भीर जनि राखहु हरि सेवा करौं तुमारी॥50॥(शीर्ष पर वापस जाएँ)

कौन तो पूत पिता को काकौ। कौन मेरे को देइ संतापौ।
हरि ठग जग कौ ठगौरी लाई। हरि के बियोग कैसे जियों मेरी माई॥
कौन को पुरुष कौन को नारी। या तत लेहु सरीर बिचारी॥
कहि कबीर ठग स्यों मन मान्या। गई ठगौरी ठग पहिचान्या॥51॥

क्या जप, क्या तप, क्या ब्रत पूजा। जाकै रिदै भाव है दूजा॥
रे जन मन माधव स्यों लाइयै। चतुराई न चतुर्भुज पाइयै।
परिहरि लोभ अरु लोकाचार। परिहरि काम क्रोध अहंकार॥
कर्म करत बद्धे अहंमेव। मिल पाथर की करही सेव।
कहु कबीर भगत कर पाया। भोलै भाइ मिलै रघुराया॥52॥

क्या पढ़िये क्या गुनियै। क्या वेद पुराना सुनियै।
पढ़े सुनै क्या होई। जो सहज न मिलियो सोई॥
हरि का नाम न जपसि गंवारा। क्या सोचहिं बारंबारा॥
अंधियारे दीपक चहियै। इक वस्तु अगोचर लहियै॥
वस्तु अगोचर पाई। घट दीपक रह्या समाई॥
कहि कबीर अब जान्या। जब जान्या तौ मन मान्या॥
मन माने लोग न पतीजै। न पतीजै तौ क्या कीजै॥53॥

खसम मरे तौ नारी न रोवै। उस रखवारा औरो होवै॥
रखवारे का होइ बिनास। आगे नरक इहा भोग बिलास॥
एक सुहागिन जगत पियारी। सगले जीव जंत की नारी॥
सोहागिन गल सोहै हार। संत कौ विष बिगसै संसार॥
करि सिंगार बहै पखियारी। संत की ठिठकी फिरै बिचारी॥
संत भागि ओह पाछै परै। गुरु परसादी मारहु डरै॥
साकत को ओह पिंड पराइणि। हमसो दृष्टि परै त्राखि डाइणि॥
हम तिसका बहु जान्या भेव। जबहु कृपाल मिले गुरु देव॥
कहु कबीर अब बाहर परी। संसारै कै अंचल लरी॥54॥

गंग गुसाइन गहिर गंभीर। जंजीर बाँधि करि खरे कबीर।
मन न डिगै तन काहे को डराइ। चरन कमल चित रह्यो समाइ॥
गंगा की लहरि मेरी टूटी जंजीर। मृगछाला पर बैठे कबीर॥
कहि कबीर कोऊ संग न साथ। जल थल राखन है रघुनाथ॥55॥

 

गंगा के संग सलिता बिगरी। सो सलिता गंगा होइ निबरी॥
बिगरो कबीरा राम दुहाई। साचु भयो अन कतहिं न जाई॥
चंदन के संगि तरवर बिगरो। सो तरवर चंदन ह्नै निबरो॥
पारस के संग तांबा बिगरो। सो तांबा कंचन ह्नै निबरो॥
संतन संग कबीरा बिगरो। सो कबीर राम ह्नै निबरो॥56॥

गगन नगरि इक बूँद न वर्षे नाद कहा जु समाना॥
पारब्रह्म परमेसर माधव परम हंस ले सिधाना॥
बाबा बोलते ते कहा गये देही कै संगि रहते॥
सुरति माहि जो निरते करते कथा वार्ता कहते॥
बबजावनहारी कहाँ गयी जिन इहु मंदर कीना॥
साखी सबद सुरत नहीं उपजै खिंच तेज सब लीना॥
òवननि बिकल भये संगि तेरे इंद्री का बल थाका॥
चरन रहे कर ढरग परे हैं मुखहु न निकसै बाता॥
थाके पंचदूत सब तस्कर आप आपणै भ्रमते॥
थाका मम कुंजर उर थाका तेज सूत धरि रमते॥
मिरतक भये दसै बंद छूटे मित्रा भाई सब छोरे।
कहत कबीरा जो हरि ध्यावै जीवन बंधन तोरे॥57॥

गगन रसाल चुए मेरी भाठी। संचि महारस तन भया काठी॥
वाकौ कहिये सहज मतवारा। पीवत राम रस ज्ञान बिचारा॥
सहज कलानननि जौ मिलि आई। आनंदि माते अनदिन जाई॥
चीन्हत चीत निरंजन लाया। कहु कबीर तौ अनभव पाया॥58॥


गज नव गज दस गज इक्कीस पुरी आये कत नाई॥
साठ सूत नव खंड बहत्तर पाटु लगो अधिकाई॥
गई बुनावन माहो घर छोड़îो जाइ जुलाहो॥
गजी न मिनियै तोलि न तुलियै पाँच न सेर अढ़ाई॥
जौ जरि पाचन बेगि न पावै झगरू करै घर आई॥
दिन की बैठ खसम की बरकस इह बेला कत आई॥
छूटे कुंडे भीगै पुरिया चल्यो जुलाहो रिसाइ॥
छोछी नली तंतु नहीं निकसै नतरु रही उरझाही॥
छोड़ि पसारई हारहु बपुरी कहु कबीर समुझाही॥59॥

गज साढ़े तै तै धोतिया तिहरे पाइनि तग्गा।
गली जिना जपमालिया लौटे हत्थिनि बग्गा॥
ओइ हरिके संतन आखि यदि बानारसि के ठग्गा॥
ऐसे संत न मोकौ भावहि डाला स्यों पेड़ा गटकावहिं॥
बासन माजि चरावहिं ऊपर काठी धोइ जलावहिं॥
बसुधा खोदि करहि दुइ चूल्हे सारे माणस खावहिं॥
ओई पापी सदा फिरहि अपराधौ मुखहु अपरस कहावहिं॥
सदा सदा फिरहि अभिमानी सकल कुटुंब डूबावहिं॥
जित को लाया तितही लागा तैसे करम कमावै॥
कहु कबीर जिस सति गुरु भेटे पुनरपि जनमि न आवै॥60॥
 


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