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कविता

राग-संवेदन
महेन्द्र भटनागर


1.

सब भूल जाते हैं...
केवल
याद रहते हैं
आत्मीयता से सिक्त
       कुछ क्षण राग के,
संवेदना अनुभूत
रिश्तों की दहकती आग के!
आदमी के आदमी से
प्रीति के संबंध
जीती-भोगती सह-राह के
            अनुबंध!
केवल याद आते हैं!
सदा।
जब-तब
बरस जाते
व्यथा-बोझिल
          निशा के
          जागते एकांत क्षण में,
          डूबते निस्संग भारी
          क्लांत मन में!
अश्रु बन
पावन!

2.
तुम -
बजाओ साज
       दिल का,
जिंदगी का गीत
मैं -
           गाऊँ!
उम्र यों
           ढलती रहे,
उर में
धड़कती साँस यह
          चलती रहे!
दोनों हृदय में
स्नेह की बाती लहर
            बलती रहे!
जीवंत प्राणों में
परस्पर
भावना - संवेदना
            पलती रहे!
तुम -
सुनाओ
इक कहानी प्यार की
            मोहक,
सुन जिसे
मैं -
चैन से
कुछ क्षण
            कि सो जाऊँ!
दर्द सारा भूल कर
मधु-स्वप्न में
             बेफिक्र खो जाऊँ!
तुम -
बहाओ प्यार-जल की
             छलछलाती धार,
चरणों पर तुम्हारे
स्वर्ग - वैभव
मैं -
            झुका लाऊँ!


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