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कविता

ममत्व
महेन्द्र भटनागर


न दुर्लभ हैं
न हैं अनमोल
मिलते ही नहीं
इहलोक में, परलोक में
आँसू... अनूठे प्यार के,
         आत्मा के
          अपार-अगाध अति-विस्तार के!
हृदय के घन-गहनतम तीर्थ से
इनकी उमड़ती है घटा,
और फिर...
जिस क्षण
उभरती चेहरे पर
सत्त्व भावों की छटा -
          हो उठते सजल
         दोनों नयन के कोर,
         पोंछ लेता अँचरा का छोर!


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हिंदी समय में महेन्द्र भटनागर की रचनाएँ