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कविता

निरंतरता
महेन्द्र भटनागर


हो विरत...
एकांत में,
जब शांत मन से
भुक्त जीवन का
सहज करने विचारण -


झाँकता हूँ
आत्मगत
अपने विलुप्त अतीत में -


चित्रावली धुँधली
उभरती है विशृंखल... भंग-क्रम
संगत-असंगत
तारतम्य-विहीन!


औचक फिर
स्वतः मुड़
लौट आता हूँ
उपस्थित काल में!
जीवन जगत जंजाल में!


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हिंदी समय में महेन्द्र भटनागर की रचनाएँ