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कविता

जीवंत
महेन्द्र भटनागर


दर्द समेटे बैठा हूँ!
रे, कितना-कितना
दुख समेटे बैठा हूँ!
बरसों-बरसों का दुख-दर्द
              समेटे बैठा हूँ!
रातों-रातों जागा,
दिन-दिन भर जागा,
सारे जीवन जागा!
तन पर भूरी-भूरी गर्द
                लपेटे बैठा हूँ!
दलदल-दलदल
                पाँव धँसे हैं,
गर्दन पर, टखनों पर
           नाग कसे हैं,
काले-काले जहरीले
            नाग कसे हैं!
शैया पर
आग बिछाए बैठा हूँ!
धायँ-धायँ!
दहकाए बैठा हूँ!


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