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कविता

पूर्वाभास
महेन्द्र भटनागर


बहुत पीछे
छोड़ आए हैं
प्रेम-संबंधों
शत्रुताओं के
अधजले शव!


खामोश है
बरसों, बरसों से
तड़पता / चीखता
दम तोड़ता रव!


इस समय तक -
सूख कर अवशेष
खो चुके होंगे
हवा में!
बह चुके होंगे
अनगिनत
बारिशों में!


जब से छोड़ आया
लौटा नहीं;
फिर, आज यह क्यों
प्रेत छाया
सामने मेरे?


शायद,
हश्र अब होना
यही है -
मेरे समूचे
अस्तित्व का!


हर ज्वालामुखी को
एक दिन
सुप्त होना है!
सदा को
लुप्त होना है!


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