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कविता

मंत्र-मुग्ध
महेन्द्र भटनागर


गहन पहेली,
ओ लता - चमेली!

अपने
फूलों में / अंगों में
इतनी मोहक सुगंध
अरे,
कहाँ से भर लाईं!

ओ श्वेता!
ओ शुभ्रा!
कोमल सुकुमार सहेली!
इतना आकर्षक मनहर सौंदर्य
कहाँ से हर लाईं!
         धर लाईं!

सुवास यह
बाहर की, अंतर की
तन की, आत्मा की
जब-जब
           करता हूँ अनुभूत -
भूल जाता हूँ
           सांसारिकता,
           अपना अता-पता!

कुछ क्षण को इस दुनिया में
खो जाता हूँ,
तुमको एकनिष्ठ
          अर्पित हो जाता हूँ!

ओ सुवासिका!
ओ अलबेली!
ओ री, लता - चमेली!


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