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कविता

हवा
महेन्द्र भटनागर


ओ प्रिय
सुख-गंध भरी
          मदमत्त हवा!
मेरी ओर बहो -
         हलके-हलके!
बरसाओ

मेरे
तन पर, मन पर
        शीतल छींटें जल के!

ओ प्यारी
लहर-लहर लहराती
उन्मत्त हवा!
निःसंकोच करो
बढ़ कर उष्ण स्पर्श
          मेरे तन का!

ओ, सर-सर स्वर भरती
मधुरभाषिणी
          मुखर हवा!
चुपके-चुपके
मेरे कानों में
अब तक अनबोला
कोई राज कहो
          मन का!

आओ!
मुझ पर छाओ!
खोल लाज-बंध
            आज
आवेष्टित हो जाओ,
आजीवन
अनुबंधित हो जाओ!


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