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कविता

विपत्ति-ग्रस्त
महेन्द्र भटनागर


बारिश
थमने का नाम नहीं लेती,
जल में डूबे
गाँवों-कस्बों को
थोड़ा भी
           आराम नहीं देती!

सचमुच,
इस बरस तो कहर ही
          टूट पड़ा है,
देवा, भौंचक खामोश
           खड़ा है!

ढह गया घरौंदा
छप्पर-टप्पर,
बस, असबाब पड़ा है
           औंधा!

आटा-दाल गया सब बह,
देवा, भूखा रह!

ईंधन गीला
नहीं जलेगा चूल्हा,
तैर रहा है चौका
          रहा-सहा!

घन-घन करते
नभ में वायुयान
मँडराते
गिद्धों जैसे!
शायद,
नेता / मंत्री आए
करने चेहलकदमी,
            उत्तर-दक्षिण
            पूरब-पश्चिम
छाई
गमी-गमी!

अफसोस
कि बारिश नहीं थमी!


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