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कविता

हैरानी
महेन्द्र भटनागर


कितना खुदगरज
           हो गया इनसान!
बड़ा खुश है
पाकर तनिक-सा लाभ -
           बेच कर ईमान!
चंद सिक्कों के लिए
कर आया
शैतान को मतदान,
           नहीं मालूम
          'खुद्दार' का मतलब
          गट-गट पी रहा अपमान!

रिझाने मंत्रियों को
उनके सामने
कठपुतली बना निष्प्राण,
        अजनबी-सा दीखता -
        आदमी की
        खो चुका पहचान!


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हिंदी समय में महेन्द्र भटनागर की रचनाएँ