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कविता

परिवर्तन
महेन्द्र भटनागर


मौसम
कितना बदल गया!
सब ओर कि दिखता
              नया-नया!
सपना -
जो देखा था
             साकार हुआ,
अपने जीवन पर
अपनी किस्मत पर
                 अपना अधिकार हुआ!

समता का
बोया था जो बीज-मंत्र
पनपा, छतनार हुआ!
सामाजिक-आर्थिक
नई व्यवस्था का आधार बना!

शोषित-पीड़ित जन-जन जागा,
नवयुग का छविकार बना!
साम्य-भाव के नारों से
नभ-मंडल दहल गया!
मौसम
कितना बदल गया!


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