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कविता

प्रबोध
महेन्द्र भटनागर


नहीं निराश / न ही हताश!
सत्य है -
गए प्रयत्न व्यर्थ सब
नहीं हुआ सफल,
किंतु हूँ नहीं
           तनिक विकल!

बार-बार
हार के प्रहार
शक्ति-स्रोत हों,
कर्म में प्रवृत्त मन
ओज से भरे
सदैव ओत-प्रोत हों!

हों हृदय उमंगमय,
स्व-लक्ष्य की
रुके नहीं तलाश!
भूल कर
रुके नहीं कभी
अभीष्ट वस्तु की तलाश!
              हो गए निराश
                      तय विनाश!
             हो गए हताश
                      सर्वनाश!


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