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कविता

सुखद
महेन्द्र भटनागर


सहधर्मी / सहकर्मी
खोज निकाले हैं
दूर-दूर से
आस-पास से
और जुड़ गया है
            अंग-अंग
सहज
किंतु / रहस्यपूर्ण ढंग से
अटूट तारों से,
             चारों छोरों से
             पक्के डोरों से!

अब कहाँ अकेला हूँ?
कितना विस्तृत हो गया अचानक
             परिवार आज मेरा यह!
जाते-जाते
कैसे बरस पड़ा झर-झर
विशुद्ध प्यार घनेरा यह!
नहलाता आत्मा को
          गहरे-गहरे!
लहराता मन का
रिक्त सरोवर
         ओर-छोर
         भरे-भरे!


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हिंदी समय में महेन्द्र भटनागर की रचनाएँ