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कविता

पहल
महेन्द्र भटनागर


घबराए
डरे-सताए
मोहल्लों में / नगरों में / देशों में
यदि -
सब्र और सुकून की
बहती
सौम्य-धारा चाहिए,
आदमी-आदमी के बीच पनपता
यदि -
प्रेम-बंध गहरा भाईचारा चाहिए,

तो -
विवेकशून्य अंध-विश्वासों की
कंदराओं में
अटके-भटके
आदमी को
इनसान नया बनना होगा।
युगानुरूप
नया समाज-शास्त्र
विरचना होगा!

तमाम
खोखले अप्रासंगिक
मजहबी उसूलों को,
आडंबरों को
त्याग कर
वैज्ञानिक विचार-भूमि पर
नई उन्नत मानव-संस्कृति को
गढ़ना होगा।
अभिनव आलोक में
पूर्ण निष्ठा से
नई दिशा में
बढ़ना होगा!

इनसानी रिश्तों को
सर्वोच्च मान कर
सहज स्वाभाविक रूप में
ढलना होगा,
स्थायी शांति-राह पर
आश्वस्त भाव से
अविराम अथक
चलना होगा!

कल्पित दिव्य शक्ति के स्थान पर
'मनुजता अमर सत्य'
कहना होगा!
संपूर्ण विश्व को
परिवार एक
जान कर, मान कर
परस्पर मेल-मिलाप से
रहना होगा!

वर्तमान की चुनौतियों से
जूझते हुए
जीवन वास्तव को
चुनना होगा!
हर मनुष्य की
राग-भावना, विचारणा को
गुनना-सुनना होगा!


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हिंदी समय में महेन्द्र भटनागर की रचनाएँ