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कविता

खिलाड़ी
महेन्द्र भटनागर


दौड़ रहा हूँ
बिना रुके / अविश्रांत
निरंतर दौड़ रहा हूँ!
           दिन - रात
           रात - दिन
हाँफता हुआ
बद-हवास,
जब-तब
गिर-गिर पड़ता
             उठता;
धड़-धड़ दौड़ निकलता!
लगता है -
जीवन-भर
अविराम दौड़ते रहना
मात्र नियति है मेरी!
समयांतर की सीमाओं को
तोड़ता हुआ
अविरल दौड़ रहा हूँ!

बिना किए होड़ किसी से
निपट अकेला,
देखो -
किस कदर तेज - और तेज
             दौड़ रहा हूँ!

तैर रहा हूँ
अविरत तैर रहा हूँ
            दिन - रात
             रात - दिन
इधर-उधर
झटकता - पटकता
           हाथ - पैर
           हारे बगैर,
बार-बार
फिचकुरे उगलता
             तैर रहा हूँ!
यह ओलंपिक का
ठंडे पानी का तालाब नहीं,
खलबल खौलते
गरम पानी का
भाप छोड़ता
               तालाब है!
कि जिसकी छाती पर
उलटा-पुलटा
विरुद्ध-क्रम
देखो,
कैसा तैर रहा हूँ!
अगल-बगल
और-और
तैराक नहीं हैं
केवल मैं हूँ
मत्स्य सरीखा
लहराता तैर रहा हूँ!
लगता है -
अब, खैर नहीं
                कब पैर जकड़ जाएँ
               कब हाथ अकड़ जाएँ।
लेकिन, फिर भी तय है -
तैरता रहूँगा, तैरता रहूँगा!
क्योंकि
खूब देखा है मैंने
लहरों पर लाशों को
उतराते... बहते!

कूद-कूद कर
लगा रहा हूँ छलाँग
ऊँची - लंबी
तमाम छलाँग-पर-छलाँग!
                दिन - रात
                रात - दिन
कुंदक की तरह
उछलता हूँ
                  बार-बार
घनचक्कर-सा लौट-लौट
फिर-फिर कूद उछलता हूँ!

तोड़ दिए हैं पूर्वाभिलेख
लगता है -
पैमाने छोटे पड़ जाएँगे!
उठा रहा हूँ बोझ
एक-के-बाद-एक
भारी - और अधिक भारी
और ढो रहा हूँ
यहाँ-वहाँ
दूर-दूर तक -
इस कमरे से उस कमरे तक
इस मकान से उस मकान तक
इस गाँव-नगर से उस गाँव-नगर तक
तपते मरुथल से शीतल हिम पर
समतल से पर्वत पर!

लेकिन
मेरी हुँकृति से
थर्राता है आकाश-लोक,
मेरी आकृति से
भय खाता है मृत्यु-लोक!
तय है
हारेगा हर हृदयाघात,
लुंज पक्षाघात
अमर आत्मा के सम्मुख!
जीवंत रहूँगा
श्रमजीवी मैं,
जीवन-युक्त रहूँगा
उन्मुक्त रहूँगा
 


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