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कविता

यह कि...
हरिओम राजोरिया


यह कि हमारी ही है गरज
यह कि छोटी सी है एक अरज
यह कि जिनके घर थे वे उजड़ गए
यह कि तिल धरने को नहीं है गाँव में जगह
यह कि नया कारड बना दीजिए सरकार
यह कि पहले की सारी दरख्वास्तें हो चुकीं बेकार

यह कि रोजी रोटी की है दरकार
यह कि अब नहीं देता कोई उधार
यह कि गारंटी के बाद भी मिला नहीं रोजगार

यह कि पुराना कुआँ कागज पर फिर हो गया तैयार
यह कि पाई-पाई से रहना पड़ता है मोहताज
यह कि खाली हाथ खाली के खाली पड़े हैं
यह कि सरपंच साहिब मशीनों से काम पर अड़े हैं

यह कि मोबाइल तो हो गया अब सस्ता
यह कि गाँव का भी बन गया पक्का रस्ता
यह कि देश हो गया मालामाल
यह कि काम करने वालों का है बुरा हाल
यह कि देश हो गया विकासशील
यह कि समय से नहीं मिल रहा केरोसिन
यह कि महँगे हो गए दाल-तिलहन
यह कि फोड़ों पर लगाने को नहीं है मल्हम

यह कि धनपशुओं की होती जा रही भरमार
यह कि परहेज ही था इस रोग का उपचार
यह कि जो धन-धान्य से भरे हैं
यह कि वे तो हर तरह के विचार से परे हैं
यह कि जब सारे अकुशल सकुशल हैं सरकार
लड़ने मरने के सिवा क्या चारा है हमारे पास!


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हिंदी समय में हरिओम राजोरिया की रचनाएँ