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कविता

बेकाम
हरिओम राजोरिया


भूख प्यास से बेहाल एक चितकबरा घोड़ा
कैद कर लिया गया पिंजड़े मे
कल दोपहर एक स्कूटर सवार को
बाद में पता चला वह कोई न्यायाधीश था
काट खाया इस घोड़े ने
अखबारों में खबर आई
घोड़े के खाए का इंजेक्शन नहीं शहर में
सरकारी अमला दौड़ा दिया गया दिल्ली
घोड़े का चित्र भी छपा है आज अखबार में
पर वह घास के मैदान में नहीं
कैद है नगरपालिका के पिंजड़े में

आवारा घोड़ों की धरपकड़ जारी है
घोड़े जो मारे मारे फिरते हैं सड़कों पर
आवारा होंने का जिन्हें कोई अभ्यास नहीं
जिनकी आँखों पर अब नहीं अनपट
और ये खुली आँखों से घूरते बाजारों को
पिचक चुके इनके पेट
खड़े-खड़े भगा रहे पूँछ से मक्खियाँ

तांगे वाले उठा नहीं सकते इनका बोझ
ये हो चुके हैं इतने ज्यादा कमजोर
कि नहीं रहे बारात के भी लायक
इसलिए जिला कलेक्टर का है फरमान
इन्हें पकड़ो और बनो इनाम के हकदार

एक जानवर जो अपनी जैविक विकास यात्रा में
मनुष्य द्वारा इतना दौड़ाया गया
कि बैठना तक न सीख पाया
आज हो गया पूरी तरह बेकाम


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