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कविता

पठार
हरिओम राजोरिया


मैं अच्छे लोगों के बीच रहता हूँ
अच्छी नौकरी है मेरी
अच्छी-अच्छी आदतें पाल ली हैं मैंने
मुझे सुंदर पत्नी अच्छे दहेज के साथ मिली है
मेरे सुंदर-सुंदर दो बच्चे हैं
अच्छे से चल रहा है जीवन
बढ़ता ही जा रहा है ईश्वर में विश्वास

अतीत को रौंदता हुआ आगे निकल आया
पुराने चेहरे छूटते चले गए पीछे
इसलिए जब मुझे पता चला
वह एक दुर्घटना में मारा गया
तो रात नशे में बड़बड़ाता रहा देर तक
दिनभर की दिशाहीन भागमभाग के बाद
रात नशे में ही याद कर पाता हूँ किसी को
वैसे भी जो बुरी खबरें हैं
देर तक टिक नहीं पाती जेहन में
शुरुआत में ही मैंने कहा
मेरी अच्छी नौकरी है
मेरे सुंदर-सुंदर दो बच्चे हैं

बड़ी देर से लगी उसकी खबर
देर क्या कहिए पूरे महीना भर बाद
मर चुका था वह या कि थे ऐसे ही हालात
कि मर ही जाना चाहिए था उसे बहुत पहले
वह जो था उसका कोई नाम भी रहा होगा
पर वह एक 'वह' की तरह
पड़ हुआ था स्मृति के किसी कोने में
किस्सा कुछ यूँ है कि पिछले पच्चीस सालों से
वह कोयला चुराने का काम करता था
रेल विभाग की कोयला चोरी
होती है एक सामूहिक कर्म
जिसे पूरी सामूहिकता के साथ
वह कर रहा था पिछले पच्चीस सालों से
इसी काम के दरम्यान एक दिन
कोयले के बड़े ढेले की तरह
वह फिसला मालगाड़ी से
और पटरियों पर पड़ी गिट्टी से टकराकर
तरबूज सा फट गया उसका सिर

जो मरते हैं मालगाड़ियों से फिसलकर
लावारिस दर्ज होते हैं दस्तावेजों में
अखबारों में कहाँ छपते हैं उनके फोटो ?
इधर मैं जिस मुकाम पर पहुँचा हूँ
उस खुशहाल संसार में
कहाँ थी ऐसे कोयला चोरों को कोई जगह
वह जरूरत के लिए
जरूरी चीज चुराते हुए मरा था
पर कहते हुए झिझक सी होती है आज
कि कभी बड़ा जिगरी हुआ करता था
जिगरी ऐसा कि मौका आने पर
कुछ भी कर गुजर जाए
मरने मिटने की बात अब क्या करूँ
जबकि वह तो मिट ही चुका था

वह था बड़ा फुर्तीला, बिलकुल चीते जैसा
बंदर की तरह पेड़ों पर चढ़ सकता था
ऊँचे मचान से कूद सकता था बिल्ले की तरह
हवा के तेज झोकों के बीच, उसी ने सिखलाया
सलीके से बीड़ी सुलगाना
दाँतों के बीच उँगली फँसा
मैंने सीखा उसी से लंबी सीटी बजाना

हम मरघट की पठार पर
किया करते दौड़ने का अभ्यास
हम सबमें सबसे तेज धावक था वो
अगर कहीं निकल भागे
तो उसे पकड़ पाना असंभव सा था
और यही वे गुण थे
जो उसे एक सफल चोर बना सके
कम नहीं होते पच्चीस साल
चोरी-चकारी के काम में तो वैसे भी
कौन तय कर पाता है इतना लंबा सफर

उसकी मिचमिची आँखों में एक रहस्यमय उदासी थी
स्कूल के एक वाकए को छोड़ उसे कभी
भयभीत होते नहीं देखा किसी ने
हॉकी के खेल में तो वह पूरा ही उस्ताद था
फिरकनी से चलते उसके नंगे पैर
गेंद लेकर जब वह गोल की तरफ भागता
तो बाजार के लड़के कसते फब्तियाँ
देखो! देखो! वह रहा फटी निक्कर वाला ध्यानचंद
ध्यानचंद तो वह नहीं ही था
ध्यानचंद हो भी नहीं सकता था वह

सरकारी स्कूल में था बड़ा मैदान
सरकारी स्कूल में ही थीं वे हॉकियाँ
जो देर अबेर हाथ लगती थीं कभी
तो उन्हें मशालों की तरह लहराते हुए
हम भागते थे मैदान की ओर
ऐसे ही खेल-खेल में जब पहली दफा हम जीते
और उसने अकेले ही किए तीन गोल
तो कागज की प्लेटों में बाँटे गए गोल बिस्कुट
उन दिनों बड़ी बात थी यह हम सबके लिए
यह सम्मान जब मिला और सब एक साथ
कागज की प्लेटों में खा रहे थे गोल-गोल बिस्कुट
तो मिश्रा हेड मास्टर साहब उसे रूल से धकियाते हुए
कमरे से बाहर ले गए
दूर मैदान में खजूर के पेड़ के नीचे
उसके हाथों पर गिराए गए गोल बिस्कुट
तब पहली बार भयभीत होते देखा गया उसे
उसकी मिचमिची आँखों में घृणा की काली परत थी

वही जिसका अब तो नाम भी याद नहीं
वही जो चीते सा फुर्तीला था
और बिल्ले की तरह
कूद सकता था ऊँचे मचान से
वही जिसे धकियाया गया था रूल से
वही जो फिर नहीं लौटा कभी मैदान में

फिर एक दिन सुना कि वह बेवजह ही
भिड़ गया बाजार के लड़कों से
बाजार के लड़के जो देखने में थे बड़े चुलबुले
पर भीतर थे बहुत पिलपिले
बिलकुल भी टिक न सके उसके सामने

अंततः हुआ यह कि वह चोर साबित हो गया
मिश्रा हेड मास्टर साहब के साथ-साथ
और भी गुरुजनों ने की तस्दीक
कि वह चोर ही हो सकता है
उसे चोर ही होना चाहिए
वह है भी तो चोर जात का ही
तब वह एक रुपया चालीस पैसा छीनने के एवज में
भेज दिया गया बच्चों के जेल में

वह तो चला गया बाल सुधार गृह
और हम बस्ती के सब लड़के
उसके बिना रह गए अकेले
फिर वह लौटा तो मालगाड़ी पर जाने लगा
धीरे-धीरे हम भी उसे भूलने लगे
भूलते-भूलते उसका नाम भी भूल गए
उसका चेहरा गायब हो गया आँखों से
गोल बिस्कुट ही बचे रह गए स्मृति में


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