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कविता

हँसोड़ा
हरिओम राजोरिया


बहुत लोग उसे नमस्कार करते हैं
अच्छे-अच्छे उसका लिहाज करते हैं
वह भी अकेलेपन से डरता है
दिन भर अपनों से घिरा रहता है

वह हर मसले पर बात कर सकता है
किसी के भी कंधे पर हाथ धर सकता है
दिन भर भागा-भागा फिरता है
इसे ही अपना काम कहता है
हाथ मिलाता है, इठलाता है
हर फिक्र को धूल में उड़ाता है

सब चुपके-चुपके कहते हैं
उसने तो घर बना लिया
चुपके-चुपके कहते हैं
अब वह बेवजह मुस्कुराता है
किसी भी कोने में थूक देता है
जहाँ मन करता है मूत देता हे

फूँक-फूँक कर चलना उसने छोड़ दिया
गए गुजरों से उसने मिलना छोड़ दिया
लंबी चादर ओढ़कर सेाता है
हर चिंता को छोड़कर सोता है

वह आदमियों से नहीं ईश्वर से डरता है
इस लोकतांत्रिक व्यवस्था पर
अकेले में हँसता है


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