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कविता

तीसरी मंजिल
हरिओम राजोरिया


घर की तीसरी मंजिल पर खड़ा हूँ
क्या-क्या दिखाई नहीं पड़ता यहाँ से
दूर तक जातीं रेल की पटरियाँ
गल्ला-मंडी का नया फाटक
सोने की पन्नी से मढ़ीं गुरुद्वारे की गुम्मदें
पछाड़ीखेड़ा तालाब की पार
औंर सड़कों पर
खिलोंनों सी भागतीं मोटर-गाड़ियाँ

जमीन और जड़ों से ऊपर हवा में
आकृतियाँ छोटी-छोटी दीखती हैं
सब दीखता है यहाँ से
पीछे छूट गया बचपन, बेकारी के दिन
पैसे की लगातार तेज होती जकड़न
फूँक-फूँककर पाँव धरने की समझ
बच्चों का जगमगाता भविष्य
और ऊलजलूल सामान से अटाटूट भरा घर

एक-एक ईंट जोड़ते हुए तय किया
मैंने यह तीसरी मंजिल तक का सफर
अहंकार करने के लिए
क्या इतना काफी नहीं ?


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