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कविता

निवेदन
हरिओम राजोरिया


कटखने कुत्ते की तरह
झिड़कारते क्यों हो बार-बार
मान्यवर
तनिक बगैर झुँझलाए
एक मनुष्य की तरह सुन लें हमारा निवेदन
हमारा इतना भर निवेदन है
कि हमारे निवेदन को आप
एक निवेदन की तरह ले लें

हम झुक-झुक कर दोहरे हुए जाते हैं
और आप हैं कि नाराज ही बने रहते हैं
हम अपमानित होकर खाँसते हैं
खाँसते-खाँसते करते हैं मुस्कुराने का अभ्यास
कुछ नहीं कर सकते आपका
इसलिए एक निवेदन ही करते हैं
निवेदन है कि निवेदन कुछ है नहीं
निवेदन तो एक शब्द भर है
जैसे कि 'दयालु' एक शब्द है
जो बार-बार आता है हमारे निवेदनों में
दयालु होने का अर्थ दयालु होना तो नहीं
वैसे ही हमारा निवेदन भी
निवेदन नहीं है आपके लिए
हमारा निवेदन तो एक चलताऊ चुटकुला है।
श्रीमन उवाच!

आप कहाँ देख रहे हैं श्रीमन!
हमारी तरफ
उनकी तरफ
या वहाँ
जहाँ कोई देख ही नहीं रहा
सच-सच बताएँ श्रीमन!
बैठे रहे?
खड़े हो जाएँ?
खुश रहें ?
उदासी में डूब जाएँ ?

देश में क्या-क्या नहीं हो रहा
सब तरफ विकास ही विकास है
प्रजातंत्र होने के यही तो मजे हैं
जनता की आँख आपको देखे
आपकी आँख जनता को देखे
दोनों एक दूसरे से मुँह चुराएँ

जो लगे हैं रोटी के रोजगार में
आजतक रोटी से ही वंचित हैं
उम्मीदों की डोर से बँधे
कार के काले शीशों को देखते हैं
घोड़ा गाड़ियों के जाने के बाद
आप उड़ने लगे चील गाड़ियों में
एक साथ चलने का जो कहा था
कब से खड़े हैं इंतजार में
साथ-साथ भले न सही
कुछ देर के लिए ही
हमारे साथ खड़े हो लें सरकार !

एक नजर हम पर हो श्रीमन!
गाड़ी की चाल में
लाएँ थोड़ा सा ठहराव
झंडियाँ लिए खड़ा है सैलाब
आदमी न सही
वोटर तो हैं
खाँस लें, खंखार लें
दो शब्द कह दें श्रीमुख से
बोले हैं! बोलेंगे! होंठ जो हिले हैं!
जय! जय! जय!
जय हो! जय हो! जन का हो बंटाढार
अब श्रीमन करते हें उवाच -

''हेलो ऽऽ हेलो ऽऽ
कृपया, शांत हो जाएँ!
सबको मिलेगा पूड़ी और साग
बच्चों को दो-दो केले अलग से
हँसे, खेलें, खिलखिलाएँ!
तिरंगा फहराएँ!
राष्ट्रगान गाएँ!
जल ही जीवन है
अपना पानी स्वयं बचाएँ
हमारे सामने नहीं
नतमस्तक हों राष्ट्र के सामने
एक ही नस्ल के मूर्खों को
बार-बार चुनते रहें
न देखें, न पूछें
राष्ट्रहित में कुछ करें
भले आपस में ही लड़ मरें
जात की हद में रहें
पीत वस्त्र धारण करें
नारियल फोड़े, अगरबत्तियाँ जलाएँ
जल हाथ में लेकर
करें पुष्प अर्पण
अब आचमन करें
भुखमरी से लड़ने के लिए
लें ग्यारह रुपये का संकल्प
यज्ञ में दें आहुति
मुखारविंद को अब उस तरफ कर लें
हमारे रास्ते में कभी न आएँ!


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