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कविता

मोहक झूठ
हरिओम राजोरिया


फर्राटे से बोलते थे इन्हें बड़े आदमी
अत्याचारी सीना तानकर
साहूकार करते थे दबी जुबान में इस्तेमाल
उपदेशक अपने प्रवचनों में
वे जो बड़े दयालु थे
मारक ढंग से करते थे इनका प्रयोग
पर जो बोलते थे पेट की खातिर
पकड़े जाने पर हाकिम
उतार लिया करते थे उनकी गर्दनें

दिवास्वप्नों के वाहक थे मोहक झूठ
सिखाते थे भक्ति का पाठ
पाप से मुक्ति के नाम पर इन्हें
बोला जाता था आतताइयों के समर्थन में
दमन के सबसे धारदार
औजार हुआ करते थे ये झूठ

काव्यात्मकता और गूढ़ शब्दावली के चलते
उन्हें पहचान पाना थोड़ा मुश्किल था
पर ये अभी भी सुरक्षित और संरक्षित थे
स्मृति-ग्रंथों और संहिताओं में
पुजारियों और देवताओं के अवमूल्यन के बाद
धर्म की सियासत में
हो रहा था इनका अब भी इस्तेमाल।


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