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कविता

दुर्गा
हरिओम राजोरिया


एक आवाज दूसरी आवाज को दबा रही है
एक शोर दब रहा है दूसरे शोर के नीचे
जय-जयकारों सू गूँज रही हैं दिशाएँ
भीड़ से अट गई हैं बदहाल सड़कें
उठ रहे हैं धूल के बवंडर
और जगह-जगह जगमग-जगमग करती
गली-गली में विहँस रही है दुर्गा ।

एक दुर्गा भीमकाय
लाल-लाल आँखें लिए
कस्बे के आढ़तियों की ओट लिए खड़ी है
तमाम अस्त्र-शस्त्रों से लैस
अपनी भव्यता में पैदा करती चकाचौंध
एक दुर्गा खड़ी है
सटोरियों की अवैध कमाई के दम पर
सबसे अधिक हाथों वाली दुर्गा है विधायक की
दुबली-पतली साँवली लड़की सी
कुकरी-कुकरी सी एक दुर्गा खड़ी है चमराने में
घर की पुरानी चादरों तले खड़ी
सबसे छोटी दुर्गा है कुम्हराने के बच्चों की।

अस्पताल के अहाते में भी है एक दुर्गा
एक दुर्गा खड़ी है डाक खाने से चिपककर
बिजलीघर वालों की भजन मंडली के साथ
एक दुर्गा जम गई है
स्टेट बैंक के गलियारे में
बस स्टैंड पर नंगे पाँव खड़े हैं परिवहन कर्मी
और ऊँचे मकान पर
पानी की टंकी से होड़ लेती
मंद-मंद मुस्काती खड़ी है एक दुर्गा।

कहीं बबर शेर पर
कहीं डायनासोर पर
कहीं खून से सना सिर हाथ में लिए
कहीं लुप-लुप करते
रंगीन बल्बों के बीच दमकती
असुरों का वध करने को आतुर
कहीं गुस्से से लपलपाती जीभ।

कहीं गली के मुहाने पर
कहीं सड़क के किनारे से
चौराहे-चौराहे पर रास्ता रोके खड़ी है दुर्गा।


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