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कविता

जनेऊ
हरिओम राजोरिया


अपने अहसास से ही खलल पैदा करता
मल-मूत्र के विसर्जन के वक्त
हरदम चढ़ा रहता कान पर
अपनी शुचिता के आतंक से धमकाता
नित नए भय के सृजन में संलग्न
यह जनेऊ ही है
या मेरा पीछा करता कोई आखेटक
सदियों से हूँ मैं इसके निशाने पर।

यह जनेऊ है या किसी जानकार का टोटका
जैसे जादू किया हो किसी ने
देह पर यह कैसा अपरिभाषित अनुशासन
अपनी सघनता से धुँधलका बनाता दृष्टि में
लगातार करता मस्तिष्क पर हमला
चेतना को कुंद और गति को करता मंथर।

एक बगल से होता हुआ
पहुँचता दूसरे कंधे पर
तिर्यक रेखा में काटता पीठ, छाती और पेट को
कसता और कसता जाता अपनी नागफाँस में
एक पूरी परंपरा को बोझा है जनेऊ
चौबीसों घंटों लटका हुआ छाती पर
रोम-रोम को झकझोरता
त्वचा में पैदा करता सिहरन।

तीन धागों से मिलकर बना है यह जनेऊ
पर अपने गठन में कैसा मजबूत
हाथों का पूरा जोर लगाकर भी
आसान नहीं इसे तोड़ पाना
फिर अकेला धागा भर नहीं है।


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