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कविता

लोथ
हरिओम राजोरिया


रात कुछ जल्द ही सो गया
तो क्या देखता हूँ
मैं एक लोथ हुआ पड़ा हूँ
जमीन पर उघारा-पुघारा
जिस पर किसी की नजर ही नहीं
न कोई रोने वाला

शरीर में कंपन नहीं
बाहर-भीतर सब तरफ सन्नाटा
घना काला अंधकार
दूर-दूर तक फैल रहा अँधेरे का विस्तार
अँधेरे में टटोलती हें आँखें
और अपने शरीर को मृत हुआ पाता हूँ

अब कुछ सोच ही नहीं सकता
उठा नहीं सकता हवा में हाथ
पैर पर रेंगते चींटे को,
झटकार नहीं सकता
जल्द ही सड़न भर जाएगी मुझमें

फिर लग जाएँगी चीटियाँ
स्वप्न की स्मृति में करता हूँ मरण का स्मरण
एक हाथ से टटोलता हूँ दूसरे हाथ की नब्ज

धीरे-धीरे क्या देखता हूँ
मेरे आसपास पड़ी हैं और भी लोथें
पास ही रंगों से लिथड़ी एक चित्रकार की लोथ है
एक युवा कवि की लोथ को
गोद में लिए बैठी है एक बूढ़े आलोचक की लोथ
एक गेंहूँ बीनने वाली स्त्री की लोथ से
खेल रही हें गल्ला व्यापारियों के लड़के की लोथें
मंच से नेपथ्य में जाते एक अभिनेता की लोथ
सीढ़ियों के पास गिरी हुई पड़ी है

लोथ भले ही हो गया स्वप्न में
पर एक चेतना है जो कहीं बची है
चलती-फिरती लोथें सड़क पर दिखाई पड़ती हैं
होटलों पर बैठी हैं लोथें
झारे से जलेबियाँ निकाल रही है एक लोथ
एक कड़ाहे में तल रही है पोहा
लोथों की भीड़-भाड़ है दुकानों पर
सौदा कर रही हैं लोथें
एक लोथ कार दौड़ा रही है
पिछली सीट पर बैठी हैं तीन लोथें

स्वप्न में अपने ही घर का दरवाजा खटखटाता हूँ
और दरवाजे पर एक लोथ को खड़ा पाता हूँ -
''तुम्हारे घर में और कितनी लोथें हैं''
भागना चाहता हूँ पर कदम नहीं उठते
सामने खड़ी लोथ मुस्कुराती है -
''पहचाना नहीं! मैं वही
बीस साल पीछे छूट गई तुम्हारी प्रेमिका हूँ''
कुछ कह नहीं पाता घिघ्घी-सी बँध जाती है
वह हाथ पकड़ लेती हे मेरा -
''डरो नहीं! मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया है''

कुछ नए लड़कों की लोथों को देखता हूँ
मुझसे बहुत मिलते-जुलते हैं इनके चेहरे
जो पहले कठोर देह बनाने के लिए
हाथों से ईंटा फोड़ा करते थे
दीवारों पर मारा करते थे सिर
वे ऐसे सजीव-सुंदर पुतले थे
जिनकी बेहद चलायमान आँखें थीं
होंठ थे एकदम थरथराते हुए
पैरों के तलुवे खुजलाते रहते थे हर हमेशा
जो छलाँग लगाते-लगाते एक दिन
बीच धारा में गिरे और लोथ हो गए

इतनी सारी लोथों के बीच एक मैं हूँ
लोथों की इस दीर्घा में
रखी है मेरी भी एक कृति
कल रात ही तो लिखी थी मैंने एक कविता
जो कुछ-कुछ एक बयान जैसी थी
जिसमें एक लय सी थी कुछ न होने की
कहने का साहस था जब
इस तरह स्वप्न नहीं देखता था
रास्ता पूछने वालों से नहीं बोलता था झूठ
कि अभी जल्दी में हूँ और बाहर से आया हूँ
टालकर बचने के हुनर से था अछूता
कोई कवि जब कविता छोड़
करने लगे शब्दों की नक्काशी
तो वह लोथ ही हो जाता है
लिखते-लिखते आँख लग जाने का मतलब
कवि का लोथ हो जाना हे


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