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कविता

दीपावली
हरिओम राजोरिया


एक

दीये बेच रहा है कोई
कोई बेच रहा है लक्ष्मीजी के पट
जो रूई के डले गले में लटकाए हैं
उनकी चीखो-पुकार से
हिल गई है छोटी बजरिआ
माटी की रंगीन गुजरिएँ सड़क पर सजाए
उकड़ूँ बैठे हैं कुम्हराने के लड़के
पत्थर फोड़ा पटाकों के ठेले
गुजर रहे हैं इन्हें ठेलते हुए
डंडियों पर लटकती फूलमालाओं के बीच से
निकलने का रास्ता बना रहे हैं ग्राहक
कैसी-कैसी आवाजें हैं यहाँ
कैसे-कैसे लोग
दीपावली की इस ढलती साँझ में
पूजा के शुभ महूर्त के नजदीक आते जाने से
मच रही है बाजार में हड़बड़ी
पर लक्ष्मी पूजा से विरक्त
कितने सारे लड़के
कितनी चीजें बेच रहे हैं यहाँ

दो

माथे पर हल्दी-चावल का तिलक धरे
उजले कपड़ों में गादी पर डटा
खीला और शकर की वरफी
बाँट रहा है एक साहूकार
चारों तरफ पटाखों का शोर है
रात धीरे-धीरे कुछ ठंडी हो रही है
दुकान की शटर खोले एक दूसरा सेठ
प्रसाद बाँट-बाँट कर थक गया
पर भीड़ है कि थम ही नहीं रही
इनकार में हिल रहा है उसका हाथ
'अब कुछ बचा नहीं'
चमचमाती दुकान की शटर
भीड़ के लिए नहीं
ये तो खुली है लक्ष्मी की अगवानी में
पर लोग हैं कि
लक्ष्मी का रास्ता रोके खड़े हैं


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