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आलोचना

धूमिल और स्त्री अर्थात् वक्त की चौकी पर बैठा अधेड़ मुंशी
शंभु गुप्त


काव्य-सृजन की प्रक्रिया में लिंग-भेद की भूमिका

कविता में स्त्री अमूमन इन तीन रूपों में आती देखी जाती है -

    1. कविता की मूल वस्तु, केंद्रीय कथ्य के रूप में।
         2. उपनिवेश/उपजीव्य के रूप में; और
         3. अप्रस्तुत-विधान के रूप में।

किंतु कविता में उपस्थित होने वाले इन तीनों रूपों पर चर्चा किए जाने से पहले जिस चीज पर हमारा ध्यान जाता है, या जाना चाहिए, वह यह है कि लिखने वाला कवि है या कवियित्री। यानी स्त्री है या पुरुष। काव्य-सृजन की प्रक्रिया में रचनाकार का लिंग- जिसे 'जेंडर' कहा जाता है - बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। यह बात कुछ लोगों को नागवार गुजर सकती है, लेकिन यह एक बहुत बड़ा सच है कि साहित्य-सृजन की प्रक्रिया में लिंग-भेद की अनिवार्य और अपरिहार्य भूमिका होती है। दलित साहित्य में जिस तरह से लंबे समय से यह बहस चल रही है कि दलित जाति में जन्मा व्यक्ति ही एक सही और प्रामाणिक और गतिशील दलित साहित्य लिख सकता है, वैसी बहस स्त्री-साहित्य में देखने को हालाँकि नहीं मिलती; यहाँ तक कि हिंदी में स्त्री-साहित्य जैसी कोई कोटि अभी तक बन नहीं पाई है। हिंदी की स्त्री लेखिकाएँ ही इसका सबसे ज्यादा विरोध करती देखी गई हैं। उनका कहना है कि लेखक लेखक होता है, स्त्री या पुरुष नहीं होता। जो हो। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लैंगिकता सृजनात्मक लेखन के स्वरूप-निर्धारण में सबसे ज्यादा विस्तृत और गहरी भूमिका निभाती है। यदि मुक्तिबोध का संदर्भ लिया जाए तो मुक्तिबोध जिसे कला का पहला और दूसरा क्षण कहते हैं, वे यहाँ सबसे ज्यादा सक्रिय रहते हैं। तीसरा क्षण एक जैसा हो सकता है, हालाँकि यहाँ भी लिंग (सेक्स) और जेंडर दोनों कहीं न कहीं सक्रिय रहते हैं। कविता की संरचना और अभिव्यक्ति दोनों स्तरों पर यह सक्रियता देखी जा सकती है। (द्रष्टव्य : गजानन माधव मुक्तिबोध; एक साहित्यिक की डायरी / भारतीय ज्ञानपीठ / में 'कला का तीसरा क्षण' शीर्षक लेख)।

दलित साहित्य में यह हो सकता है कि एक गैरदलित कायांतरण की प्रक्रिया से दलित-जीवन के अनुभवों से तादात्म्य स्थापित कर ले; हालाँकि दलित साहित्य की नई सौंदर्यशास्त्रीय अवधारणाएँ इसे असंभव मानती हैं। लेकिन फिर भी चूँकि एक दलित में और एक सवर्ण में जैविक रूप से कोई प्रभेद नहीं होता, सामाजिक प्रभेद ही होता है अतः जीवनानुभवों के किसी न किसी स्तर पर यह असंभवता संभवता में बदल सकती है। जिस किसी भी दिन अंबेडकर का सपना पूरा होगा और एक जाति-विहीन समाज बन सकेगा, उस दिन दलित साहित्य की बहुत सारी वर्तमान सौंदर्यशास्त्रीय अवधारणाएँ अप्रासंगिक हो जाएँगी। लेकिन कायांतरण का यह नियम स्त्रियों और पुरुषों पर किसी भी तरह लागू नहीं हो सकता क्योंकि जैविक विभेद वहाँ कायांतरण की इजाजत नहीं देता। कोई लिंग-परिवर्तन करा ले तो अलग बात है, हालाँकि वहाँ भी कायांतरण नहीं होता, मूलभूत रूप से जैविकता का ही परिवर्तन होता है। अतः जैविकता प्राथमिक तौर पर अनिवार्यतः वहाँ मौजूद है। जैविकता रचनाकार के जीवनानुभवों, रचनापरक प्राथमिकताओं, उसकी रचनाओं के वस्तु, दृष्टि और रचना तीनों ही स्तरों के स्वरूप-निर्धारण इत्यादि को एक निश्चित और विशिष्ट दिशा देने में अहम भूमिका निभाती देखी जाती है।

जैविकता और सामाजिकता की अनुपूरकता अर्थात् तू सारे जग से हारी!

यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि इस जैविकता के साथ सामाजिकता स्वभावतः और अनिवार्यतः नत्थी है। तकनीकी तरीके से इस बात को इस तरह कह सकते हैं कि स्त्री और पुरुष की अलग-अलग सामाजिकीकरण और सांस्कृतीकरण की प्रक्रिया और प्रविधियाँ इन दोनों की जैविकताओं को आधिभौतिकता प्रदान करती चलती हैं। जैविकता और सामाजिकता दोनों एक-दूसरे की अनुपूरक बनती चली जाती हैं। इन दोनों के बीच अंतर्क्रिया का सिलसिला चलता है और उसका स्वरूप अनादि, अनंत और अनित्य जैसा होता है। मूलतः वर्चस्व की वृत्ति स्त्री-पुरुष संबंधों की पहचान नहीं है, सह-अस्तित्व और सहकार ही उसके अंतर्वर्ती तत्व हैं। राज्य के अस्तित्व में आने के बाद वर्चस्व की प्रवृत्ति का आविर्भाव होता है और पितृसत्ता उभरकर सामने आती है। सरल शब्दों में कहें तो पुरुष का आधिपत्य और स्त्री की पराधीनता या पुरुष-आश्रितता पितृसत्ता का मूल है। परस्पर सहकार और सह-अस्तित्व के स्थान पर पराधीनता और पराश्रितता जैसे स्त्री-पुरुष संबंधों की स्वाभाविकता बनती चली गई। परस्पर सहकार और सह-अस्तित्व जैसी चीजें अब भी थीं पर पुरुष की शर्तों पर। जैविकता और सामाजिकता दोनों का स्त्री की इस पराधीनता में बराबर का हाथ रहा है, बल्कि विमर्शकारों का एक वर्ग ऐसा भी है जो यह मानता है कि जैविकता इसके असल मूल में है। इनका कहना है कि चूँकि स्त्री शारीरिक रूप से कमजोर और कोमल होती है, उसकी हड्डियाँ/मांसपेशियाँ अपेक्षाकृत कम मजबूत और कम कठोर होती हैं, उसकी दिनचर्या में ऐसे अनेकानेक क्षण आते हैं जब वह खुद को असहाय स्थिति में पाती है और किसी न किसी के सहारे की जरूरत उसे होती है (विशेषतः प्रजनन के प्रक्रम में) अतः उसका पुरुष से एक दर्जा नीचे रहना ही लाजिमी है। विमर्शकारों का यह वर्ग इस तरह जीन के आधार पर स्त्री की दोयमता को तर्कसंगत और स्वाभाविक ठहराता है। जैविकतामूलक यह अवधारणा सामाजिक रूप लेते-लेते इस कदर अलग-अलग स्तरों पर फलीभूत होने लगती है कि सहअस्तित्वमूलक परस्पर सहकार के स्त्री-पुरुष संबंधों के मूलाधार सिरे से गायब होने लग जाते हैं। सहअस्तित्वमूलक सहकार के मूलाधारों के गायब होते ही जो चीज उभरकर सामने आती है, वह है, यौनवाद, स्त्री को एक मनुय के सम्माननीय आसन से गिराकर एक मादा में तब्दील करते जाना, (यह आकस्मिक नहीं है कि धूमिल स्त्री के लिए ज्यादातर 'मादा' शाब्द का इस्तेमाल करते हैं।) उसे मात्र एक यौनिक देह के बतौर लेना, उसे 'अवयव की कोमलता लेकर' सारे जग से, हर तरह से हार जाने जैसी मनःस्थिति में जकड़ा घोषित करना। (द्रष्टव्य जयशंकर प्रसाद की कामायनी की यह प्रसिद्ध पंक्ति 'अवयव की कोमलता लेकर मैं सारे जग से हारी।')। सब जानते हैं कि यह सब पुरुष-एकाधिकार बल्कि सर्वाधिकार का मामला है, जिसमें स्त्री 'टेकेन फॉर ग्रांटेड' जैसी स्थिति से आगे नहीं जाने दी जाती। समाज में औसतन यही स्थिति हर तरफ देखी जाती है। इधर जब से सबाल्टर्न स्टडीज का दौर आया है और हाशिया के समाजों की तरफ लोगों का ध्यान गया है, तब भी स्त्री की स्थिति में कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। हाँ, इतना जरूर हुआ है कि स्त्रियों में अस्मिता-बोध, प्रतिरोध एवं वैकल्पिकता, संघर्षशीलता इत्यादि का पैमाना बढ़ा और बदला है, लेकिन हकीकत यह है कि जितना इजाफा इन चीजों में हुआ है, इसी के समानांतर पितृसत्ता और पुरुष-वर्चस्व के नए-नए प्रारूपों-प्रविधियों का आविष्कार और विस्तार भी निरंतर हुआ है। स्त्री-देह की ही बात करें तो स्त्री-मुक्ति के इस क्रांतिकारी प्रत्यय को कि 'यह मेरा शारीर है। इसके बारे में फैसला करने का अधिकार भी मुझे होना चाहिए।' को भाई लोग ले उड़े और कहा कि अच्छा ठीक है। इस पर तुम्हारा ही अधिकार है और रहेगा। बस तुम इतना और जोड़ दो कि यह मेरा शारीर है, इसका मैं जैसे चाहे इस्तेमाल करुँ। मनचाहा इस्तेमाल किए जाने की बात किसी ने कही नहीं थी, पर 1995 के बीजिंग के अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन की उक्त उद्घोषणा का यही अर्थ पुरुष-मानसिकता ने निकाला। भूमंडलीकरण के दौर में स्त्री के नए सिरे से एक उपभोग्य वस्तु में हद दर्जे तक बदल दिए जाने के पीछे उक्त घोषणा का लगभग यही निर्वचन रहा है।

हिंदी की नायकवादी प्रेम-कविताएँ और स्त्री

इधर हालाँकि यह हुआ है कि अब कोई कवि स्त्री-देह को धूमिल या राजकमल चौधरी या उन्हीं के जैसे किसी और कवि की तरह अप्रस्तुत-विधान का हिस्सा नहीं बना सकता लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि हिंदी के पुरुष कवियों में स्त्री का वह स्वतंत्र और स्वयं-सापेक्ष व्यक्तित्व-निरूपण बहुत ढूँढ़ने पर ही कहीं-कहीं और कभी-कभी ही मिलता है और वह भी आधा-अधूरा ही; जो स्त्री को उसका उपयुक्त दाय दिला सके। ज्यादातर कवि स्त्री को अपने स्वयं के पुरुष-संदर्भ में देखते पाए जाते हैं। यहाँ तक कि उनकी कथित प्रेम-कविताएँ भी ज्यादातर इकतरफा और आत्मास्फालनमूलक ही हैं। यह सचमुच अजीब है कि स्त्री यहाँ या तो 'साइलेंट' है या 'पैसिव' रूप में निबद्ध है। ऐक्टिव और लाउड केवल पुरुष है, जो कि 'नायक' की भूमिका में है। इन कविताओं में स्त्री केवल उपजीव्य रूप में सामने आती है। प्रेम के या और भी जो कोई हों, सर्वाधिकार पुरुष/नायक के पास सुरक्षित हैं। जैसे कि धूमिल की 'किस्सा जनतंत्र' शीर्षक कविता की ये आखिरी पंक्तियाँ हैं -

'ऐसी क्या हड़बड़ी कि जल्दी में पत्नी को
    चूमना -
    देखो, फिर भूल गया।'
    (कल सुनना मुझे, संस्करण 2003, वाणी, पृ. 53)।

धूमिल पर यह आरोप रहा है कि उसके यहाँ स्त्री एक मजाक का, गाली का या अवमानना का पात्र है। मजाक, गाली और अवमानना के मार्फत उसे वह अपमानित करता है और इस तरह अपनी हताशा, निराशा और हतवीर्यता की कुंठाओं का खुलासा करता है। स्त्री उसके और उसकी पीढ़ी के लिए अपनी कुंठाओं के निरसन के 'डंपिंग ग्राउंड' के बतौर काम में ली जाती है और बस। इसके आगे वहाँ स्त्री का कोई वजूद नहीं। यौन-बिंबों, प्रतीकों के अप्रस्तुत-विधान के बतौर स्त्री-शरीर वहाँ आता है, जो कि कविता की मूल वस्तु या केंद्रीय कथ्य नहीं बल्कि एक उदाहरण मात्र होता है और वह भी अपमानजनक। स्त्री-शरीर का इस तरह का उदाहरणात्मक उपस्थापन स्त्री के प्रति पुरुष-रचनाकार के यौनवादी रुझान के अलावा कुछ नहीं। लगभग हर आलोचक ने इसकी अभिव्याख्या लगभग इसी तरह की है जिसका परिणाम यह हुआ कि जहाँ कहीं धूमिल में स्त्री कविता की मूल या केंद्रीय वस्तु की तरह आती है, उसे भी इसी भदेस के खाते में डाल दिया गया। यह तो लगभग स्पष्ट है कि धूमिल ने, आज जिसे स्त्री-केंद्री कविताएँ कहा जाता है, वैसी कविताएँ नहीं लिखीं। यह उस समय संभव भी नहीं था। हाँ, यह जरूर है कि धूमिल जब कभी भी स्त्री को थोड़ा व्यक्ति-रूप में लेते हैं, तब-तब तो कम से कम सही ही वह यौनवाद के अंतर्गत नहीं आती। मुहावरा भी वहाँ यौनवादी नहीं होता। हालाँकि यह एक तथ्य है कि मुहावरे काव्याभिप्रेत या काव्य की अंतर्वस्तु भी नहीं होते। काव्य का अभिप्रेत या अंतर्वस्तु तो हालाँकि उस वक्तव्यात्मकता को भी नहीं माना जा सकता जिसे धूमिल कविता का पर्याय कहते हैं; चाहे वह कितनी भी सार्थक क्यों न हो। एक सार्थकतम वक्तव्य भी कम से कम कविता तभी बनता है, जब उसके अंतर्तम में जीवन धड़कता हो। वक्तव्यात्मकता भी कुल मिलाकर एक स्थापत्य या प्रविधि ही है जिसके मार्फत लेखक यथार्थ की सीढ़ियाँ फलाँगता है। आलोचना के मुहावरे में कहें तो वक्तव्यात्मकता यथार्थारोहण की एक भंगिमा है जिससे कवि अपने काव्याभिप्रेत के संकेत देते चलने का काम लेता है। वक्तव्य सिर्फ एक भंगिमा है, अभिप्रेत नहीं है। धूमिल जब यह कहते हैं कि ''एक सही कविता / पहले/एक सार्थक वक्तव्य होती है।'' (संसद से सड़क तक) तो इसका अर्थ संभवतः यही है कि कविता वक्तव्य नहीं, बल्कि उसका अगला चरण है। धूमिल के संदर्भ में ही यदि हम इस तथ्य की पड़ताल करें तो पाएँगे कि वक्तव्य मूल काव्याभिप्रेत तक पहुँचने का, काव्याभिप्रेत से ठीक पहले का सांकेतिक कदम है। जैसे कि यदि इसी बात को लिया जाए कि काव्यनायक घर से नौकरी पर निकलते वक्त फिर पत्नी को चूमना भूल गया तो पत्नी को चूमना यहाँ काव्याभिप्रेत नहीं है, हालाँकि यह जीवन का और दिनचर्या का एक बहुत ही स्वाभाविक और जरूरी हिस्सा है और इसके बिना जीवन जीवन नहीं, एक निरर्थक भागमभाग भले हो! तो, पत्नी को चूमने की स्वाभाविकता और जरूरत के अभाव के मार्फत धूमिल इस व्यवस्था में एक निम्न वित्तीय पति-पत्नी की दिनचर्या के व्यर्थता-बोध को सामने लाते हैं कि देखो, किस कदर इन स्त्री-पुरुषों की जिंदगी सुबह से लेकर रात तक केवल अनुत्पादक कार्यों में खप जाती है। पत्नी को चूमना यहाँ एक सांकेतिक भंगिमा है तो मूल काव्यवस्तु का एक अंगीभूत हिस्सा भी है बल्कि मूल काव्यवस्तु का हिस्सा ज्यादा है। पूरी कविता में भूख और हर तरह की अभावग्रस्तता का जो हैरतअंगेज ठसपन फैला है, उसमें प्रेम और दूसरी भावुकताओं के लिए कोई जगह ही नहीं बची रह गई है। इस गृहस्थी में बेतरह खटती इस स्त्री का ध्यान तो सारा इस गणित में लगा है कि इतनी कम रोटियों में सबका पेट आखिर कैसे भर पाएगा! इस स्थिति के बावजूद वह इस सहजता में है कि भावुकता के लिए थोड़ी जगह निकाल सके - ''वक्त घड़ी से निकलकर / अँगुली पर आ जाता है और जूता / पैरों में, एक दंत टूटी कंघी / बालों में गाने लगती है'' (कल सुनना मुझे, पृ. 53)। लेकिन जैसा कि मैंने कहा, इस सदिच्छा का यहाँ कोई अर्थ नहीं है क्योंकि इसमें कोई नवोन्मेष नहीं है, यह केवल एक ठस दुहराव-भर है। कवि का मूल संकेत शायद इस तरफ है कि हिंदुस्तान के इन भारी अभावग्रस्त निम्न वित्तीय तबकों की जिंदगी के रस-स्रोत पूरी तरह सूखते जा रहे हैं और उसकी संभावनाएँ संकटग्रस्त हैं। आगे इस पर हम और बात करेंगे।

धूमिल पर आरोप और धूमिल का बचाव अर्थात् अंतर्विरोध पर अंतर्विरोध

जैसा कि मैंने ऊपर कहा, धूमिल पर हिंदी-आलोचना का यह एक लगभग सुस्थिर आरोप है कि वह स्त्री-शरीर को, उसके अंग-प्रत्यंगों को अपनी कविता के अप्रस्तुत-विधान की तरह, बिंबों, प्रतीकों, उपमाओं, उदाहरणों की तरह इस्तेमाल करते हैं और इस तरह उसका न केवल अपमान करते हैं बल्कि उसकी एक गलत छवि भी पेश करते हैं। ऊपर इस बाबत और भी बातें कही गईं। यह भी कि यह एक मर्दवादी पुरुष-रचनाकार का अश्लील यौनवाद है जो स्त्री-देह को बींधकर तुट होता है। इस आरोप को और आगे फैलाते हुए आलोचकों द्वारा यह भी मंतव्य प्रकट किया गया कि धूमिल की काव्य भाषा मर्दवादी है और उसमें स्त्री इसी रूप में आ सकती थी; आदि-आदि।

इस संदर्भ में कुछ विद्वानों ने धूमिल का बचाव करने और इसकी कोई तर्क-संगति निकालने की कोशिश भी की। ऐसा अनेक लोगों ने किया। ये सारे अभिमत मिलकर भी धूमिल की विशिष्ट काव्यभाषा की उस विशिष्ट स्त्री-संदर्भी भंगिमा की अंदरूनी गाँठ को नहीं सुलझा पाते जो एक तरह की 'घुरगाँठ' ही है। कुछ लोग कहते हैं कि ''समकालीन जीवन की अव्यवस्था की वास्तविकता को पाठकों के गले उतारने के लिए जहाँ उसने राजनीतिक और सामाजिक जीवन के विद्रूप पक्ष को चुना वहीं यौन-जीवन के कुरूप को भी चुना। यदि यौन-जीवन की समस्याओं से घिरा चित्रित करना हो तो नारी को देवी बनाकर तो नहीं किया जा सकता।'' (गणेश तुलसी अटेकर, कठघरे का कवि 'धूमिल', पृ. 145)। इसी तरह रामकृपाल पांडेय ने लिखा कि ''धूमिल की कविताओं में यौन-जीवन के चित्र भी यत्र-तत्र मिलते हैं। उन चित्रों में वे चित्र अपने आसपास के जीवन और समाज से लिए गए हैं। समाज में यौन संबंधों की अनेक रूपता है। वहाँ अगर व्यभिचार का दलदल है तो प्यार-स्नेह की सरिता भी है, किंतु धूमिल ने चित्रण के लिए दलदल को ही चुना। लगता है कि धूमिल जीवन की विकृतियों को उघाड़कर फेंक देना चाहते हैं और अपना असंतोष-आक्रोश प्रकट करते हुए विद्रोह की आग भड़काना चाहते हैं। अतः यह समझ बैठना कि धूमिल को यौन-विकृतियाँ पसंद हैं - बहुत बड़ी भूल होगी। वस्तुतः उनके चित्रण के मूल में अस्वीकार का स्वर है, स्वीकार का नहीं। उन्होंने कहीं भी जीवन के उज्ज्वल पक्ष पर चोट नहीं की है, भले ही उसका चित्रण उन्होंने कम किया हो। प्रहार उन्होंने हमेशा कुत्सित और अस्वीकार्य पर ही किया है, सुंदर और स्वीकार्य पर नहीं, जो मूलतः एक विद्रोही व्यक्तित्व के कवि के लिए सर्वथा स्वाभाविक है।'' (आलोचना अंक 33, अप्रैल-जून 75, पृ. 77)।

इस मामले में पं. विद्यानिवास मिश्र का मत सबसे अलग और विचित्र है। उनका मानना है कि यह उसके गँवई या देहाती स्वभाव के चलते आया है। इस तरह की अभिव्यक्तियों पर ऐतराज करना शहरी चोंचलेबाजी है। दरअसल इस तरह वह स्त्री की गरिमा की ही रक्षा करना चाहता था। मिश्रजी ने धूमिल के तीसरे संग्रह 'सुदामा पाँड़े का प्रजातंत्र' (प्रथम संस्करण) की भूमिका में लिखा था - ''लोग मुझसे सवाल पूछते हैं कि धूमिल की कविता में यौन प्रतीकों का इस तरह इस्तेमाल क्या आवश्यक है, क्या उचित है? मैं एक ही उत्तर देता हूँ कि शायद धूमिल के गाँव वाले मन को बात सीधी तौर पर कहने के लिए लाचारी से इतना आक्रामक होना पड़ा है। मैं उनकी भाषा का न पक्षधर हूँ न स्त्री के शरीर का इस तरह भाषिक उपयोग करने को काव्योचित मानता हूँ, परंतु जो कवि फरेब से, हर एक तरह के फरेब से एकदम अफना गया हो वह शहरी नारी गरिमा के फरेब को भी दूर फेंक देता है, शायद उसका उत्साह विस्थापित है, पर उसका ईमान अपनी जगह पर है और यही बात हमारे लिए महत्वपूर्ण होनी चाहिए। धूमिल के काव्य में काम नहीं है, कामुकता के प्रति गहरी वितृष्णा है। वह पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' की तरह गरिमा के लिए ही कुछ तीखा होना चाहता है।'' (सुदामा पाँड़े का प्रजातंत्र, संस्करण 2001, वाणी, पृ. 12)। इससे पहले धूमिल के दूसरे संग्रह 'कल सुनना मुझे' (प्रथम संस्करण) की प्रस्तावना में उन्होंने यह भी लिखा था - ''जिन लोगों ने धूमिल की फोश भाषा का बहुत जिक्र किया, उन्हें ऊपर की पंक्तियाँ ध्यान से पढ़नी चाहिए। 'गाँव में कीर्तन'। दंतहीन शिशु की किलकारी (अत्यंत अहिंस्र उत्फुल्लता) ही धूमिल का वास्तविक चित्र है। यौन और ऊपर से बीभत्स लगने वाले बिंब, प्रतीक और सादृश्य विधान तो उनकी भाषा को चौखटा देने वाले हाशिया मात्र हैं। धूमिल मन से इतने स्वस्थ थे कि समूची सामाजिक व्यवस्था के अस्वास्थ्य को सह नहीं पाते थे।'' (कल सुनना मुझे, पृ. 09)।

इन तीनों अभिमतों से पहली बात जो निकलकर आती है, वह यह है कि धूमिल प्रतिक्रियावश ऐसा करते हैं। स्त्री के प्रति पुरुषवादी यौनवादी दृष्टि उनकी नहीं है, लेकिन चूँकि उन्हें अपने समकालीन राजनैतिक/कथित लोकतांत्रिक यथार्थ का चित्रण करना है और चूँकि यह राजनैतिक-लोकतांत्रिक यथार्थ एकदम और लगभग पूरी तरह अश्लील और बेहया हो आया है अतः इसके एकदम सटीक और सही-सही चित्रण के लिए यौनमूलक बिंबों, प्रतीकों, घटनाओं, उदाहरणों से बेहतर अप्रस्तुत और क्या होगा? इनसे दूसरी बात यह निकलकर आती है कि यौन-जीवन का विद्रूप राजनैतिक और सामाजिक विद्रूप की तरह ही उनकी काव्यवस्तु का अंगीभूत हिस्सा है और उसकी तरफ भी प्रमुखता से वे बराबर ध्यान देते चले हैं। और, तीसरी बात जो निकलकर आती है, वह यह कि धूमिल का कुल काव्योद्देश्य यह रहा है कि इस देश का हर तरह का विद्रूप खत्म हो और जीवन खुशहाल हो।

प्रस्तुत और अप्रस्तुत के बीच असंतुलन और असमानता

इन तीनों अभिप्रायों पर एक साथ विचार करने पर शिद्दत से यह महसूस हुए बिना नहीं रहता कि इन तीनों के बीच गहरे अंतर्विरोध हैं और इनमें से कई बातें एक-दूसरे को काटती चली हैं। जैसे यही कि अपने समकालीन राजनैतिक-सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्त करने के लिए; इस नाकस स्थिति में भी कि वह एकदम और लगभग पूरी तरह 'अश्लील' और बेहया हो आया हो; यह क्यों जरूरी है कि आप स्त्री-यौनिकता को ही अप्रस्तुत की तरह काम में लें? स्त्री-यौनिकता को अपनी कविता के अप्रस्तुत-विधान का हिस्सा बनाते ही कई पेचीदा और अशोभनीय सवाल एक साथ उठ खड़े हो सकते हैं। जैसे कि पहला तो यह कि स्त्री-यौनिकता को क्या आप मूलतः या आधारभूत रूप से एक अश्लीलता-भरा उपक्रम मानते हैं? क्या अश्लीलता या बेहयाई या चालूपन स्त्री-यौनिकता की अंतर्वस्तु है? क्या हम मूलभूत रूप से यह मानकर चलें कि स्त्रीत्व अश्लीलता, बेहयाई या चालूपन इत्यादि का पर्याय होता है? क्या यह धारणा इस बात की सूचना नहीं देती कि पुरुष-सत्ता का आत्मकेंद्री चालाक खेल इसके पीछे सक्रिय है और स्त्री संबंधी और बहुत सारे मिथों की तरह यह भी एक मिथ ही है, एक ऐसा मिथ, जिसके मार्फत स्त्री को कथित नैतिक-अनैतिक पैमाने से नियन्त्रित किया जा सके? आखिर स्त्री-यौनिकता किसी भी तरह के विद्रूप की तुलना का अप्रस्तुत कैसे हो सकता है? स्त्री-यौनिकता कोई पदार्थगत उपादान नहीं है, वह एक स्वतंत्र/स्वायत्त संवेदनात्मक जीवनोपागम है, जिसकी स्थिति संप्रभुता-संपन्नता की है; भला एक संप्रभु संवेदन को किसी और का उपजीव्य कैसे बनाया जा सकता है? अतः धूमिल के यहाँ पहली दिक्कत तो यही है कि प्रस्तुत और अप्रस्तुत के बीच असंतुलन और असमानता की स्थितियाँ हैं।

मर्दवादी आर्यसमाजी नैतिकता-बोध से घिरी हिंदी-आलोचना

चलिए, अगर यह मान भी लिया जाए कि यह कवि की अपनी स्वयंभवता है कि वह किसी भी उपागम को अप्रस्तुत की तरह स्तेमाल कर सकता है तो, स्त्री-यौनिकता को अप्रस्तुत की तरह इस्तेमाल करने पर दूसरा सवाल यह उठेगा कि क्या स्त्री-यौनिकता की दिशा या नियति राजनीति की तरह अश्लीलता और बेहयाई ही है? रामकृपाल पांडेय के ये तर्क बहुत ही निरर्थक, बोगस और गढ़े हुए हैं कि 'उन्होंने कहीं भी जीवन के उज्ज्वल पक्ष पर चोट नहीं की है' और 'प्रहार उन्होंने हमेशा कुत्सित और अस्वीकार्य पर ही किया है, सुंदर और स्वीकार्य पर नहीं'। यह ठीक है कि वास्तव में राजनीति और समाज की तरह स्त्री-यौनिकता भी विद्रूप की चपेट में उस समय थी लेकिन सवाल यह है कि स्त्री-यौनिकता के विद्रूप के लिए उत्तरदायी कौन था? धूमिल ने अपनी कविताओं में यौन-विद्रूप के जो बहुत-से दृश्य उकेरे हैं, जैसे यह कि ''हर लड़की तीसरे गर्भपात के बाद धर्मशाला हो जाती है'' (संसद से सड़क तक, राजकमल 2009, पृ. 07) या यह कि ''गलियों में नंगी घूमती हुई पागल औरत के 'गाभिन पेट'' (वही; पृ. 12) या यह कि ''उस महरी की तरह है, जो महाजन के साथ रात-भर सोने के लिए एक साड़ी पर राजी है'' (वही; पृ. 13) या यह कि ''अंधी लड़की की आँखों में उससे सहवास का सुख तलाशना'' (वही; पृ. 60) या यह कि ''हिजड़ों ने भाषण दिए लिंग-बोध पर, वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं आत्म-शोध पर प्रेम में असफल छात्राएँ अध्यापिकाएँ बन गयी हैं'' (कल सुनना मुझे, पृ. 63-64) या यह कि ''चुटकुलों-सी घूमती लड़कियों के स्तन'' (वही; पृ. 99) या यह कि ''औरत की लालची जाँघ'' (सुदामा पाँड़े का प्रजातंत्र, पृ. 12) या यह कि ''स्त्री-देह के अँधेरे में बिस्तर की अराजकता है। (वही; पृ. 130); आदि-आदि। ऐसे अनगिनत चित्र और दृश्यांश हैं, जिनमें इसी तरह की आप्त वाक्यात्मकता निहित है, एक ऐसी आप्त वाक्यात्मकता जो लगभग स्थिर है, जिसकी कोई दिशा नहीं है। इन स्थितियों की यह 'इन्हें उघाड़कर फेंक देना चाहते हैं और अपना असंतोष-आक्रोश प्रकट करते हुए विद्रोह की आग भड़काना चाहते हैं' यह लगभग सत्य से परे और कवि के प्रति किसी सम्मोहपूर्ण आग्रहवश दिया हुआ अभिमत ही ज्यादा लगता है। यह रामकृपाल पांडेय की खामखयाली ही है कि 'प्रहार उन्होंने हमेशा कुत्सित और अस्वीकार्य पर ही किया है, सुंदर और स्वीकार्य पर नहीं, जो मूलतः एक विद्रोही व्यक्तित्व के कवि के लिए सर्वथा स्वाभाविक है।' इस वक्तव्य पर विचार किया जाए तो यह देखकर हैरत होती है कि हिंदी-आलोचना जेंडर और स्त्री की यौनिकता के मामले में किस कदर मर्दवादी आर्यसमाजी नैतिकता-बोध से घिरी हुई है। क्या यहाँ पूछा जा सकता है कि यौन संबंधों की अनेकरूपता के अंतर्गत 'व्यभिचार का दलदल' और 'प्यार-स्नेह की सरिता' की पहचान और परिभाषा भला क्या है? 'व्यभिचार' और 'प्यार-स्नेह' इन दोनों प्रत्ययों की स्त्री-दृष्टि के हिसाब से कैसी और क्या व्याख्या की जानी चाहिए? जहाँ पत्नी पति के लिए 'टेकेन फॉर ग्रांटेड' है, उस तथाकथित दांपत्य में स्त्री के हिस्से में कौन-सा प्यार और स्नेह सचमुच में आता है? (बलात्कार को कोई प्यार कहे तो यह एक अलग बात है।) जिसे हम प्यार-स्नेह कहते हैं, जिसे कि आलोचक लोग 'जीवन का उज्ज्वल पक्ष' कहकर 'सुंदर और स्वीकार्य' बताते हैं, जैसे कि धूमिल की इन पंक्तियों में उसके दर्शन हों कि ''पत्नी की आँखें आँखें नहीं/हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं'' (सुदामा पाँड़े का प्रजातंत्र, पृ. 46) या इनमें कि -

तुम्हारी अँगुलियाँ जैसे कविता की
     गतिशील पंक्तियाँ हैं
      तुम्हारी आँखें कविता की गंभीर
     किंतु कोमल कल्पना है
     तुम्हारा चेहरा
     जैसे कविता की
     जमीन है
     तुम एक सुंदर और सार्थक
     कविता हो मेरे लिए। (वही; पृ. 120)।

स्त्री! तू देह से बढ़कर कुछ नहीं!

क्या सचमुच इस भावाभिव्यक्ति में पत्नी के लिए कोई बराबर की जगह है? क्या पत्नी की वास्तविक निगाह में इन पंक्तियों में उसके जीवन का कोई उज्ज्वल पक्ष और सुंदरता निहित है? संभवतः नहीं, क्योंकि वस्तुतः यहाँ वह एक आत्मसंपन्न व्यक्ति इकाई है ही नहीं। उसकी हैसियत सिर्फ इतनी है कि जैसे कि एक प्रसिद्ध हिंदी-फिल्म का एक बहुत ही प्रसिद्ध रोमांटिक गीत है कि 'कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है कि... तुम्हें बनाया गया है मेरे लिए'! केंद्र या नायक की भूमिका में पुरुष/पति है और चूँकि उसे नायक बनना है, अपना वजूद खड़ा करना है अतः सहारे के लिए लीजिए, यह स्त्री मौजूद है! इस स्त्री की औकात सिर्फ इतनी है कि यह आपको थामे खड़ी रहे और इसकी हर चीज आपकी तुटि और सफलता के लिए हो। और वह भी किस रूप में? इसकी आँखें, इसकी अँगुलियाँ, इसका चेहरा, इसके हाथ; आदि-आदि और बस! आत्मा नाम की चीज तो जैसे इसके है ही नहीं। जो कुछ है, यह मादा शरीर है और इसके आकर्षक अंग-प्रत्यंग हैं। देखा जा सकता है कि यह प्रेम है या देह का यौनिक आख्यान! निश्चय ही यह एक तथ्य है कि स्त्री-पुरुष प्रेम में देह एक अनिवार्य उपादान है। खुद धूमिल इसी कविता की शुरुआत में हालाँकि यह कहते ही तो हैं कि -

देह तो आत्मा तक जाने के लिए सुरंग है
रास्ता है। (वही)।

लेकिन सवाल यही है कि यह आत्मा किसकी है? कौन किसकी आत्मा तक पहुँच रहा है? स्त्री की आत्मा न जाने यहाँ कहाँ है? हो सकता है, वह पुरुष की आत्मा में विलयित हो गई हो! प्रेम की और खास तौर से स्त्री की सार्थकता इसी में तो है कि वह अपना शरीर-मन-प्राण सब पुरुष को सौंप दे और खुद...? उसके खुद का भला क्या है! वह खुद न जाने क्या, कहाँ है, कवि को नहीं पता! धूमिल अपनी एक कविता में यह स्वीकार करते हैं कि स्त्री कुल मिलाकर एक देह ही तो है - ''(औरत : आँचल है, / जैसा कि लोग कहते हैं - स्नेह है,/किंतु मुझे लगता है - / इन दोनों से बढ़कर / औरत एक देह है)'' (कल सुनना मुझे, पृ. 81)। हालाँकि यह कहते हुए वे एक अफसोस जैसी स्थिति में खुद को पाते हैं - ''मेरे सामने / तुम सूर्य नमस्कार की मुद्रा में / खड़ी हो, / और मैं लज्जित-सा तुम्हें / चुप-चाप देख रहा हूँ'' (वही)।

दरअसल धूमिल में स्त्री को लेकर कई सारी दुविधाएँ और अंतर्विरोध पाए जाते हैं। ये दुविधाएँ और अंतर्विरोध संभवतः उनके समकालीन वैश्विक विमर्शों के प्रभावों और मूल देशज सांस्कारिकता के बीच के अंतर्विरोध हैं। तीसरी चीज उस समय के राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य और प्रतिरोध की गतिविधियों के बीच के द्वंद्व हैं। ये तीनों चीजें मिलकर एक अजीब-सा रसायन तैयार करती हैं जिसमें सब-कुछ गड्डमड्ड है और एक चीज दूसरी को काटने से नहीं चूकती। यहाँ कुछ भी सुनिश्चित और एकतान नहीं है और धूप-छाया का-सा खेल चलता रहता देखा जा सकता है। इस अनिश्चय और अनिर्दिष्टता की सबसे ज्यादा गाज स्त्री पर पड़ती है। इतिहास गवाह है कि ऐसे अराजक और दिशाहीन समय में यौनिकता और देहवाद एकदम सतह पर आ जाते हैं और स्त्री खामखाँ इनकी चपेट में ले ली जाती है। पुरुष-सत्ता को अपनी सार्थकता और सफलता इसी में दिखने लगती हैं कि स्त्री को उसकी यौनिकता के आधार पर ही पहचाना जाए!

लोहिया का सैक्सिस्ट सांगरूपक : 'दिल्ली जो देहली भी कहलाती है'

यह सारी प्रक्रिया इतने अचेत भाव से चलती है कि अच्छे-अच्छे दृष्टिवान लोग भी गच्चा खा जाते हैं और उन्हें यह होश ही नहीं रहता कि वे क्या कर रहे हैं! जैसे राममनोहर लोहिया के बारे में क्या कोई यह सोच सकता है कि जबकि वे अपने समय के जाने-माने स्त्री-मुक्ति-समर्थक रहे, अपनी भाषा को यौनवादी होने से नहीं बचा सके। राममनोहर लोहिया का एक लेख है, 'दिल्ली जो देहली भी कहलाती है'। इस लेख में वे दिल्ली शहर के लगभग हजार साल के इतिहास पर इस दृष्टि से विचार करते हैं कि किस तरह दिल्ली को हर आने वाले विजेता ने जीता, नए सिरे से बसाया, बनाया, उजाड़ा और किस तरह यह दिल्ली अपने ही रहवासियों/जनता से कटी-कटी रही आई। आज भी (यानी 1959 में भी, जब यह लेख उन्होंने लिखा था) यह जनता से ज्यादा अपने पर राज करने वालों की अपनी है। इस विचार-निदर्शन में कहीं कोई गड़बड़ नहीं है। लोहिया ने दिल्ली के असल यथार्थ को ही यहाँ उजागर किया है। लेकिन इस यथार्थ की अभिव्यक्ति जिस रूपकात्मकता के साथ उन्होंने की है, वह हैरतअंगेज है। यह रूपकात्मकता इतनी सघन और लंबी खींचकर ले जाई गई है कि धीरे-धीरे लगने लगता है कि लेखक को प्रस्तुत से ज्यादा अप्रस्तुत में आनंद आ रहा है। दिल्ली का रूपायन करते-करते लोहिया न जाने किस हरजाई वेश्या का चरित्रांकन करने लग जाते हैं - ''दुनिया की तमाम राजधानियों में दिल्ली सबसे प्यारी और हसीन कुलटा है। उसने अभी तक किसी वफादार प्रेमी के आगे आत्मसमर्पण नहीं किया है। उसे हमेशा ही क्रूर शासकों ने अपने अधीन किया जिन्हें उसने सभ्य, सुसंस्कृत और क्लीव बनाने की कोशिश की। ...दिल्ली का कभी कोई पति नहीं रहा। उसने प्रेमी भी नहीं बनाया। ...वह विश्व की निष्ठावान और अडिग वेश्या बनी रही जो नए क्रूर शासक को जिसने उसे अपने कब्जे में किया, सुसभ्य बनाने और उसे निस्तेज करने का प्रयास करती रही। उसका हुस्न विस्मयकारी और शुद्ध कपट से भरा है। उसके पास दिल नाम की चीज बिल्कुल नहीं है और वह सिर्फ खूबसूरती तथा सलीके के लिए जीती है और यद्यपि उसमें प्रेमिका, विवाहिता तथा छिनाल के कुछ-कुछ गुण मिल जाएँगे, उसने अपनी विशुद्ध धूर्तता से उन सबको दबा दिया है। ...दिल्ली ने पीछे हटने को कला बना लिया है। उसने विजेताओं के लिए अपनी छातियाँ खोल दी हैं, इस उम्मीद में कि उन्हें प्रेम के जाल में फाँसकर अंततः पालतू बनाया जा सकता है। उसकी छातियों में कभी उन्मादक सुंदरता रही होगी। ...दिल्ली ने अपनी छातियों को विजेताओं के लिए खोला किंतु अक्सर उसका तत्काल उपयोग नहीं हुआ। तैमूर और नादिरशाह ने उसे दागों से कुरूप बना दिया। ...यह दुष्ट बूढ़ी औरत कुमारी से भी ज्यादा खूबसूरत है। ...वह इस बात पर खुश होती है कि आज की जनता जो इतनी गरीब है कि इस आधुनिक शैली को नहीं अपना सकती, उन विदेशी शैली के आलीशान भवनों से दूर रहेगी जिनमें वह बिना बाधा के, विदेशी शैली के देशी दरबारियों के साथ अभिसार कर सकती है। वह इस अभिसार को देश का धार्मिक कर्तव्य भी कह सकती है जिसमें जनता रूपी वैध पति से खर्चीला अलगाव भी सम्मिलित है ताकि देश आधुनिक बन जाए।'' (राममनोहर लोहिया रचनावली, भाग-8, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लि. नई दिल्ली (प्र. सं. 2008), पृ. 184-196।)।

यह इतना लंबा उद्धरण इसलिए दिया गया कि रूपक पूरा का पूरा आ सके। यह दरअसल सांगरूपक है। कोई यह न समझे कि सांगरूपक सिर्फ काव्य की बपौती है, गद्य में भी यह आ सकता है और बाकायदा आ सकता है। और जब लोहिया जैसे रणबाँकुरे हों तो बात ही क्या! रूपक तो उनके आगे पानी माँगता दिखाई देगा! देखा जा सकता है कि लेखक का ध्यान प्रस्तुत से ज्यादा अप्रस्तुत के पूर्ण निरूपण पर है। हो सकता है कि दिल्ली के इतिहास से जुड़ी कोई बात यहाँ लेखक से छूट गई हो लेकिन इतना गारंटी से कहा जा सकता है कि जिससे उसका रूपक बिठाया गया है उससे जुड़ी कोई बात लेखक ने नहीं छोड़ी है। दिल्ली ही नहीं, इस लेख में लोहियाजी दुनिया के और भी कई राजधानी-शहरों का इसी तरह के उपमान-विधान के साथ वर्णन करते हैं। जैसे कि पेरिस : ''निस्संदेह, पेरिस दुनिया की प्रेयसी है। उसके प्रेमी स्थायी हैं जिन्हें वह बदलती नहीं। किंतु यह प्रेमी, फ्रांसीसी, उसकी विवाहेतर मौज-मस्ती से आँखें फेर लेता है या मुस्करा भर देता है। वह वफादार है लेकिन मौज-मस्ती की शौकीन है, आग और पानी का मेल; कुछ ऐसा जो दिल को मरोड़ देकर ताजा कर देता है लेकिन उसे सुस्त नहीं पड़ने देता।'' (वही)। इसी तरह वाशिंगटन, टोक्यो, दमिश्क, लंदन इत्यादि का वर्णन वे करते हैं। इनमें से कोई 'संगमरमर की शुद्धता वाली विवाहिता' है, कोई 'ईमानदार और मेहनती छिनालें', किसी 'की छाती बहुत चौड़ी है' जो बेहिसाब 'सुगठित और ऐंद्रिक सुंदरता लिए हुए है।' (वही)।

रचना का सृजन ही नहीं , अधिगम भी मर्दवादी

जरा सोचा जाए कि यह सब पढ़ते हुए पाठक पर क्या बीतती रही होगी? क्या पाठक का ध्यान दिल्ली या किसी और शहर के इतिहास या भूगोल पर टिक पाता है? पहले-पहल आखिर वह किस चीज को ग्रहण करता है? निश्चय ही मूल विषय से ज्यादा उसका ध्यान रूपक पर अटका रह जाता है। यहाँ भी लैंगिक विभेद से पाठकों का अभिग्रहण/अधिगम भिन्न-भिन्न हो सकता है। हो सकता है, पुरुष पाठकों को इसमें मजा आने लगे। प्रतीत यही होता है कि इस तरह की विचाराभिव्यक्तियाँ यह सोचते हुए ही संभव होती हैं कि पुरुष-पाठक ही इन्हें पढ़ेगा। पढ़ेगा और आनंद लेगा! दरअसल इस तरह की संरचना के पीछे, जाने-अनजाने लेखक इसी धारणा से संचालित होता है कि उसके पाठक सिर्फ पुरुष हैं। और पुरुष भी कैसे? वे, जिन्हें इस तरह की यौनिकता में रस आता है! क्योंकि स्त्रियाँ तो इसे पढ़ते ही या तो आग-बबूला हो जाएँगी या शर्म या आत्मग्लानि से उनका माथा झुक जाएगा। संभवतः कोई भी स्त्री इस तरह अपना वस्तुकरण बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। इसका एक उदाहरण लगभग तीन साल पहले 3 से 7 अक्टूबर 2010 को शिमला के भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की 'रीडिंग लोहिया' वर्कशाप में दिखाई दिया जब ''डा. राममनोहर लोहिया की रचनाओं पर हो रही बहस के दौरान कुमकुम यादव ने सवाल उठाया कि शहरों पर लिखे अपने आलेख में लोहिया जैसा स्त्री-मुक्ति का समर्थक इस कदर सैक्सिस्ट भाषा का इस्तेमाल क्यों कर रहा है?'' (अभयकुमार दुबे, 'पटरी से उतरी हुई औरतों का यूटोपिया' शीर्षक लेख, प्रतिमान समय समाज संस्कृति, प्रवेशांक, जन.-जून 2013, पृ. 406)। (कुमकुम यादव दिल्ली के एक कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाती हैं और लोहिया की अध्येता हैं। उन्होंने लोहिया की अनेक रचनाओं का हिंदी से अँग्रेजी में अनुवाद किया है। वे लोहिया के स्त्री-मुक्ति संबंधी विचारों की प्रशंसक हैं और इस संबंध में उन्होंने काफी-कुछ लिखा भी है। (द्रष्टव्य, 'इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली, वॉ. एक्स.एल.वी. नं. 48, नवं. 27-दिसं. 03, 2010 में पृ. 107-112 पर उनका लेख 'द्रोपदी ऑर सावित्री : लोहिया'ज फैमिनिस्ट रीडिंग ऑव् माइथॉलॉजी'। लेकिन लोहिया की इस तरह की भाषा पर उन्हें भी ऐतराज है।)

सेक्सिज्म भाषा के ढाँचे में नहीं , तत्वतः लेखक के अंतर्मन में होता है

देखने की बात यहाँ यह है कि लोहिया ऐसा तब लिख रहे हैं जब कि स्वदेशी भाषा (हिंदी) और संस्कृति से उन्हें बेइंतहा प्यार है और किसी भी हद तक वे उसके समर्थक हैं। उनका तर्क है कि दिल्ली जो ''विश्व-इतिहास की अत्यंत हृदयहीन वेश्या'' बनी है तो ''इसका सबसे बड़ा कारण भाषा की शक्ति रहा है। किसी भी राजधानी ने इतने लंबे समय तक विदेशी और सामंती भाषा में काम नहीं किया है। ...वेश्या आम जनता से एक हद तक ही संबंध रखना चाहती थी और इसलिए उसने अपना काम ऐसी भाषा में चलाया जिसे जनता नहीं समझती थी।'' (राममनोहर लोहिया रचनावली, भाग-8, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लि. नई दिल्ली (प्र. सं. 2008), पृ. 194)। अंतर्वस्तु के लिहाज से तो लोहिया यहाँ एकदम चौकस हैं। लेकिन जो उपमान-विधान उन्होंने बनाया है, वह बेहद आपत्तिजनक है। क्या किसी और उपमान द्वारा यह बात नहीं कही जा सकती थी? और फिर यह भी क्या जरूरी है कि बात को किसी अप्रस्तुत-विधान में ही कहा जाए? बात को सीधे-सीधे वर्णनात्मक या अनलंकृत तरीके से भी तो कहा जा सकता है। यह कथित काव्यात्मकता जबर्दस्ती घुसेड़ने की जरूरत भला क्या है? जो हो। लेकिन लोहिया यहाँ पकड़े जाते हैं। एक और बात जो संज्ञान में आती है वह यह है कि लोहिया जब कि स्वदेशी और आम जनता की भाषा में यह सब लिख रहे थे तो स्वदेशी भाषा से काम लेने पर भी यह सैक्सिस्ट उपमान-विधान कहाँ से चला आया? क्या सैक्सिज्म स्वदेशी भाषा की अंतस्संरचना में निहित है? आखिर अनजाने या अचेत भाव से ही सही, पुरुष लेखक की रचनाओं में यह यौनवाद आता कैसे है? क्या यह यों ही स्वभावतः चला आता है? क्या हमारी भाषा की संरचना ही पक्षपातपूर्ण है? अभयकुमार दुबे ने अपने उसी लेख में एक जगह लिखा है ''(क्योंकि उसका मैस्क्युलिन जेंडराइजेशन या मर्दानाकरण पहले ही हो चुका है) ...स्त्री के पक्ष में सोचते और लिखते समय भी अगर सतर्क न रहा जाए तो मर्दाने लिंग में ढली भाषा ही स्वाभाविक रूप से प्रकट होती है।'' (वही, पृ. 405 एवं 406)। मेरा खयाल है कि सारा का सारा दोष भाषा के मत्थे मँढ़ देना एक उचित तार्किकता नहीं है। यह ठीक है कि भाषा मूलतः मर्दाने लिंग में ढली है, वह स्त्री के प्रति दुराग्रहों से भरी है लेकिन यह भी देखा ही तो जाता है कि इसी भाषा में अनेकानेक पुरुष-लेखकों ने स्त्री को पूरा सम्मान और स्पेस देते हुए अपनी रचनाएँ लिखी हैं। निश्चय ही यहाँ उन्हें बेहद सतर्क रहना पड़ा होगा और कोई वैकल्पिक जेंडर-न्यूट्रल या जेंडर समानतामूलक भाषा विकसित की होगी। इसका एक अर्थ यह भी है कि दरअसल सैक्सिज्म व्यक्ति के अंतर्मन में निहित होता है। मर्दाने लिंग में ढली भाषा तभी उसे स्वाभाविक लगेगी, जब वह खुद मर्दाना यौन-मानसिकता में ढला होगा। सैक्सिज्म की जड़ इसी मानसिकता में धँसी होती है। किसी की भाषा तभी सैक्सिस्ट होती है जब उसकी मानसिकता पर सैक्स हावी हो। अतः यह कतई नहीं माना जा सकता कि कोई पुरुष है तो वह स्त्री के प्रति यौनवादी होगा ही और कोई स्त्री है तो वह पुरुष के प्रति यौनवादी होगी ही। इसे इस तरह सामान्यीकृत नहीं किया जा सकता। देखना यह होगा कि अपनी वस्तु, अंतर्वस्तु और अभिव्यक्ति तीनों में वह जेंडर के हिसाब से सतर्क और समतामूलकतावादी है या नहीं! क्या लोहिया मर्दाना यौन-मानसिकता में ढले थे? जो हो।

वक्त की चौकी पर बैठा (और निष्क्रिय) अधेड़ मुंशी

इस सैद्धांतिकी के आलोक में धूमिल की कविता पर विचार करने पर हम पाते हैं कि उनमें बहुत सारी चीजें गड्डमड्ड हैं। वे, जैसा कि कहा गया, अपनी वस्तु और अंतर्वस्तु की अभिव्यक्ति के लिए स्त्री-देह के अंगों, उसकी जैविक कार्य-प्रणाली, विभिन्न गतिविधियों इत्यादि को उपमान के रूप में स्तेमाल करते हैं और उन्हें लगता है कि ऐसा करके वे अपनी बात ज्यादा प्रभावशाली ढंग से कह पा रहे हैं। धूमिल के इस विशिष्ट शिल्प-विधान के उत्स पर बात की जाए तो इसका असल स्रोत वही है जिसकी ओर विद्यानिवास मिश्र ने संकेत किया था; जिसका कि ऊपर उल्लेख किया गया; हालाँकि एकदम उस अर्थ में नहीं, जिसका तर्क उन्होंने दिया है। विद्यानिवास मिश्र का तर्क था कि ''...धूमिल के गाँव वाले मन को बात सीधी तौर पर कहने के लिए लाचारी से इतना आक्रामक होना पड़ा है। ...जो कवि फरेब से, हर तरह के फरेब से एकदम अफना गया हो वह शहरी नारी गरिमा के फरेब को भी दूर फेंक देता है''। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया, विद्यानिवासजी का कहना था कि ''शायद उसका उत्साह विस्थापित है'' लेकिन उनका यह भी कहना था कि ''उसका ईमान अपनी जगह पर है''। (सुदामा पाँड़े का प्रजातंत्र, पृ. 12)। इस तर्क-शृंखला पर विचार किया जाए तो एक अजीबोगरीब विमर्श पैदा होने लगता है। विद्यानिवास यह तो मानते हैं कि यह नारी-गरिमा के खिलाफ बात है। लेकिन साथ ही यह भी जोड़ देते हैं कि शहरी नारी ही इस तरह की बातों पर उज्र करती है, देहाती औरतों को इससे कोई परेशानी नहीं है। विद्यानिवासजी का आखिर मंतव्य क्या है? क्या वे यह कहना चाहते हैं कि इस तरह की बातों पर ऐतराज करना एक तरह का फरेब है और चूँकि देहाती स्त्रियाँ तो सीधी-सादी होती हैं, फरेब शहरी औरतों का ही चरित्रोपलक्षण है अतः वे ही इन पर आपत्ति करती देखी जाती हैं? यानी कि यह जो धूमिल या कोई भी लेखक स्त्री को अपनी अंतर्वस्तु के उपनिवेश या उपमान या अप्रस्तुत-विधान के रूप में स्तेमाल करता है, वह शहरी स्त्रियों को ही चुभता है, ग्रामीण स्त्रियाँ तो यह सब न तो जानती हैं और जानती भी हों तो उनके लिए यह कोई आपत्ति या आश्चर्यजनक बात नहीं है, यह लगभग उनके रोजमर्रा जिंदगी का हिस्सा है, अत्यंत स्वाभाविक और सहज उपक्रम है! विद्यानिवास मिश्र के विषय में यह कहा जाता है कि वे अत्यंत ही लोकवादी थे, लोक/ग्राम्य जीवन में उनकी आत्मा बसती थी। पता नहीं यह कैसा लोकवाद है जो स्त्री को इस कदर डि-ग्रेड करके चलता है। और फिर यह मानना कि धूमिल या किसी और ने जो किया, वह उसकी गरिमा के खिलाफ नहीं है और वह उसे सह्य है, पूरी तरह पुरुष-मन की गढ़ंत है। स्त्री के बारे में यह पुरुष-मानसिकता का इकतरफा फैसला है। चूँकि गाँव में अभी भी, और आज से चालीस साल पहले तो - जब धूमिल यह सब लिख रहे थे - और भी ज्यादा सामंती माहौल था अतः स्त्री के पास चुप रहने के अलावा और क्या चारा था! इस चुप्पी को उसकी स्वीकृति और यहाँ तक कि गरिमा कहकर परिभाषित करना हद दर्जे की चालाकी (अगर कोई 'धूर्तता' शब्द को गैर-साहित्यिक मानने पर कटिबद्ध न हो तो दरअसल धूर्तता) है। विद्यानिवास मिश्र की यह तार्किकता धूमिल को कठघरे से निकालने के बजाय और गहरे उसमें धँसा देती है। हो सकता है, धूमिल का ईमान अपनी जगह पर हो और इसके महत्व से किसी को इनकार भला क्यों होगा? लेकिन एक ईमान की आड़ में दूसरी बेईमानी करने की इजाजत तो किसी को नहीं दी जा सकती। जिस तरह से धूमिल स्त्री को लाते हैं, उसके आधार पर निर्विवाद रूप से यह कैसे कहा जा सकता है कि धूमिल के काव्य में काम नहीं है, या कामुकता के प्रति वितृष्णा है? स्त्री संबंधी यौन-बिंब क्या काम-भावना के बिना आ सकते हैं। ऊपर लोहिया के संदर्भ से यह स्पष्ट किया गया कि इस तरह के बिंब या प्रतीक या उपमान तभी आते हैं जब मन पर सैक्सिज्म हावी होता है। जब मन में स्त्री को लेकर लगभग इसी तरह का चिंतन-अनुचिंतन चलता रहता है। ग्रामीण सांस्कारिकता के साथ तो इस मामले में और भी दिक्कत है क्योंकि उसमें सामंती तत्व किसी न किसी रूप में लगातार मौजूद रहते हैं। विद्यानिवास जी कहते हैं कि यह कवि फरेब से, हर तरह के फरेब से अफना गया था इसलिए लाचारी में आक्रामक हुआ। लेकिन आक्रामक होने के लिए स्त्री का इस तरह यौनवादी इस्तेमाल क्यों? क्या इसलिए कि वह उस समय इस स्थिति में नहीं थी कि आपकी कलम पकड़ सके और कहीं मिल जाएँ तो आपका भी वही हाल करे जो इधर कुछ स्त्री को निशाना बनाने वाले लेखकों का हुआ। यहाँ नाम लेने की जरूरत नहीं है, उनसे सब परिचित हैं। आज तो हालत यह है कि अभी म.गां.अं. हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के 'हिंदी का दूसरा समय' (01-05 फरवरी 2013) के मीडिया वाले सारांश सत्र में एक वक्ता ने जब धूमिल के इस जुमले का किसी प्रसंग में इस्तेमाल किया कि 'जिसकी पूँछ उठाई, वही मादा निकला' (''मैंने जिसकी पूँछ उठायी है उसको मादा पाया है।'' - संसद से सड़क तक, पृ. 126) तो विरोध की ऐसी लहर उठी कि वक्ता को तत्काल अपने शब्द वापस लेने पड़े। आज धूमिल की कैसी भी पुनर्व्याख्या कर ली जाए, यह कलंक उन पर लगेगा ही। और फिर उस समय भी क्या और दूसरे कवि नहीं थे, जो फरेब से एकदम अफना गए थे; जैसे कि मुक्तिबोध या रघुवीर सहाय या और बहुत-से अन्य कवि, जिनके यथार्थानुभवों में कई समानताएँ भी हैं, जैसे कि 'पटकथा' का यह अंश, जिसकी तुलना मुक्तिबोध की कविता 'अँधेरे में' (मुक्तिबोध, 'चाँद का मुँह टेढ़ा है'/भारतीय ज्ञानपीठ) के प्रोसेशन में शामिल विभिन्न सत्तोन्मुख षड्यंत्रकारियों से की जा सकती है : ''वे सब के सब तिजोरियों के दुभाशिये हैं। / वे वकील हैं। वैज्ञानिक हैं। / अध्यापक हैं। नेता हैं। दार्शनिक / हैं। लेखक हैं। कवि हैं। कलाकार हैं। / यानी कि - / कानून की भाषा बोलता हुआ / अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।'' (वही); इन लोगों का उपमान-विधान स्त्री के यौनिक इस्तेमाल से कैसे बचा? क्या इनके सामने भी एकदम वही परिदृश्य नहीं था? आखिर धूमिल और उनके जैसे कुछ और कवियों को ही स्त्री-देह इतना परेशान क्यों किए थी? इसका उत्तर सिवाय इसके और क्या हो सकता है कि यह दरअसल स्त्री के बाबत हमारी कुल मानसिकता से ही तय होता है कि हमारे लिखे में वह कैसे आएगी और आएगी भी या नहीं? आलोचकों ने धूमिल का बचाव करते हुए और उनकी दूसरी-दूसरी कविताओं का हवाला देते हुए यह सिद्ध करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है कि स्त्री के प्रति धूमिल की दृष्टि वस्तुवादी नहीं है, उनका यह कथन कि औरत एक देह है, ''उपभोक्तावादी सोच से अलग है। जहाँ स्त्री-शरीर एक माल है, वस्तु अथवा माल बेचने का औजार'' (श्रीराम त्रिपाठी, धूमिल और परवर्ती जनवादी कविता, रंगद्वार प्रकाशन अहमदाबाद / द्वितीय संस्करण, 2002, पृ. 66)। इस संदर्भ में धूमिल की 'नौ मादा कविताएँ' शृंखला की आठवीं कविता 'स्त्री' का हवाला दिया गया है, जिसमें कथित तौर पर धूमिल विज्ञापन में स्त्री के इस्तेमाल पर टिप्पणी करते हैं। (वही; पृ. 67)। यह तो किसी हद तक ठीक है। लेकिन इससे पहले की इन आप्तवाक्यमूलक पंक्तियों की व्याख्या कैसे की जाएगी जिनमें धूमिल वक्तव्य देते हैं कि -

मुझे पता है
स्त्री -
देह के अँधेरे में
बिस्तर की
अराजकता है।
(सुदामा पाँड़े का प्रजातंत्र, पृ. 130)।

क्या यह वक्तव्य स्त्री के बारे में किसी पुरुष का इकतरफा अभिमत नहीं है? यह ठीक है कि इस तरह के विचार-निर्णय के मूल में कवि का आम तौर पर अनुभव किया हुआ यथार्थ और उसका सामान्य पर्यवेक्षण होता है लेकिन देखने की बात यही तो होती है कि कवि अनुभव की हुई बातों को ज्यों का त्यों उल्था कर दे रहा है या उसमें अपनी अंतर्दृटि के कुछ सूत्र भी मिलाकर उसे कोई संभावनाशील मोड़ दे दे रहा है या नहीं। कवि की अंतर्दृटि की पहचान और परीक्षा दरअसल इसी बिंदु पर होती है कि यथार्थ को कोई नया अग्रगामी आयाम वह दे रहा है या नहीं? इस दृष्टि से धूमिल पर विचार करते हैं तो और भी ज्यादा निराशा होती है क्योंकि प्रतीत यह होता है कि धूमिल समकालीन राजनीति, राज्य-व्यवस्था, उससे जुड़े लोगों, उनकी गतिविधियों और इस सबसे बने परिदृश्य की घनघोर आलोचना करते हैं, उस पर बहुत ही तीखी, चुनौतीपूर्ण और काटकर रख देने वाली टिप्पणियाँ करते हैं, लेकिन खुद कहीं किसी अँधेरे में खड़े कहीं से रोशनी चले आने का इंतजार-भर करते रहते हैं और इस पर तुर्रा यह कि इसे वह 'सहज' होना भी कहते हैं -

मैं यहाँ, इस अँधेरे में खड़ा हूँ।

यहीं,

मेरे देश ने

मुझे रोशनी देने को कहा है। (सुदामा पाँड़े का प्रजातंत्र, पृ. 61-62)।

देखा जा सकता है कि देश यहाँ किस तरह अमूर्तता ग्रहण करता जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि एक व्यक्ति/कवि के तौर पर धूमिल यहाँ व्यवस्था का दंश झेलने को तत्पर हैं लेकिन जबकि आप एक चेतना-संपन्न कवि हैं, लोग आपकी तरफ एक अंतर्दृटि के लिए टकटकी लगाए खड़े हैं; आप इससे आगे बढ़ने का हौसला ही नहीं दिखाते -

वक्त की चौकी पर बैठे हुए अधेड़

मुंशी की तरह

मैं अपने बहते हुए खून में

तुम्हारे दाँतों की रपट पढ़ता हूँ। (वही, 62)।

भगत सिंह पैदा तो हो , लेकिन पड़ोसी के घर में!

धूमिल की विशेषता यह है कि वे जो कुछ देखते हैं, उसे अंदर तक अनुभव करते हैं। उनके आत्मानुभव और यथार्थ की वास्तविकता लगभग एक है, उसमें कोई विभेद नहीं है। यथार्थ की वास्तविकता और उसके उनके अनुभव के बीच कोई तीसरी चीज नहीं है। इसीलिए दरअसल ऐसा हुआ है कि वे आम को आम और चाकू को चाकू कह सके हैं। आम को आम और चाकू को चाकू कह सकना एक कवि की सबसे बड़ी सहजता कही जा सकती है -

मैं चाहता हूँ मैं वह सब कुछ

अनुभव करूँ जो कुछ देखता हूँ।

मैं साहस नहीं चाहता

मैं सहज होना चाहता हूँ

ताकि आम को आम

और चाकू को चाकू कह सकूँ! (वही, 61)।

आम को आम और चाकू को चाकू कह सकना उस समय आसान नहीं था और समय की यह एक भारी जरूरत थी। यह एक चुनौती थी जिसे धूमिल ने न केवल स्वीकार किया बल्कि उसे एक उल्लेखनीय मुकाम तक पहुँचाया भी। लेकिन कवि की सहजता के अंतर्गत यह भी आता है और नहीं आता तो आना चाहिए कि उसके पास आने वाले समय का, समय की संभावनाओं का एक नक्शा/ब्लू प्रिंट भी हो। धूमिल यहाँ मात खाते हैं। वे लगभग इस शैली में बात करते हैं कि भगत सिंह पैदा तो हो, लेकिन मेरे नहीं, पड़ोसी के घर में! वे खुद कुछ पहल करने की स्थिति में नहीं हैं, सिर्फ दूसरों को ललकारने में उनकी शक्ति लगी रहती है-

...अपनी दुविधाओं में

लहूलुहान एक गद्दीनशीन औरत

टाँगों में धमाका दबाए बैठी है

और सारा हिंदुस्तान

जबड़े में भिंची हुई

कलेजी की तरह बमक रहा है

क्या तुम निहत्थे हो? (वही, 68)।

जैविक तत्ववाद का जबर्दस्त अभ्यास अर्थात् धूमिल का सैक्सिस्ट देहाती माइंड-सैट

इस कविता में धूमिल नक्सलवाद के न केवल समर्थक/सिंपैथाइजर, बल्कि एक निगूढ़ प्रवक्ता की तरह पेश आते हैं। बाद की उनकी बहुत-सी कविताओं में उनका यह रूप हमें देखने को मिलता है। आलोचकों ने उनके इस पक्ष की सराहना भी खूब की है। लेकिन मेरा ऐसा खयाल है कि धूमिल में नक्सलवाद एक आवेगी वैचारिकता की तरह आयत्त होता है। मूलतः वैचारिकता आवेगी नहीं होती, उसका स्वरूप चिंतनपरक और दर्शनात्मक ही होता है। लेकिन धूमिल चूँकि आधारभूत रूप से एक आवेगी कवि हैं अतः अन्य विचारों के साथ नक्सलवाद भी एक आवेग की तरह ही उनकी कविताओं में आता है। यह आवेगशीलता बहुत आकर्षक और टटकी है तो इसके कई पार्श्व ऐसे भी हैं जो सारे किए-कराए पर पानी फेर देते हैं। जैसे कि यदि इसी अंश में देखा जाए तो जिस 'औरत' का जिक्र यहाँ किया गया है, वह औरत बाद में है, एक डरा हुआ तानाशाह पहले, बल्कि मूलतः है। यह कोई पुरुष भी हो सकता था। जिस औरत का जिक्र यहाँ है, वह अपने औरतपन से काफी पहले पीछा छुड़ा चुकी थी और अब वह सिर्फ एक शाासक-वर्ग की नेता थी। भारतीय राजनीति का यह समय बहुत ही नाकस रहा है। लोकतंत्र के संसाधनों से ही लोकतंत्र के संसाधनों को ही जिस तरह से नेस्तनाबूद किया गया, वह अपने-आप में एक हौलनाक परिदृश्य था। इस स्थिति पर हिंदी के उस समय के बहुत-सारे कवियों-लेखकों ने कलम चलाई। बाबा नागार्जुन की कविताएँ इस संदर्भ में याद की जा सकती हैं। लेकिन धूमिल 'औरत टाँगों में धमाका दबाए बैठी है' जैसा सैक्सिस्ट बिंब लाकर सारा ध्यान दूसरी जगह भटका देते हैं। पाठक चाहे स्त्री हो या पुरुष, उसका ध्यान सबसे पहले इसी जगह जाता है और अटका रह जाता है। 'सारा हिंदुस्तान जबड़े में भिंची हुई कलेजी' के बिंब में जो तेजी, तुर्शी और प्रहारात्मकता थी, उसे इस यौनवादी बिंब ने मटियामेट कर दिया और पाठक भौंचक देखता रह जाता है कि कवि ने आखिर यह किया क्या? इसके अलावा एक बात यह भी उसके दिमाग में आती है कि नक्सलवाद की कवि की यह कैसी समझ है कि वह एक राजनीतिक तानाशाह को जैविक तत्ववाद की निगाह से देख रहा है! धूमिल इस जैविक तत्ववाद के इतने ज्यादा अभ्यस्त हैं कि लगभग हर जगह यह एक स्वाभाविक संस्कार की तरह उनके सिर चढ़कर बोलने लगता है। यह दरअसल स्त्री के प्रति एक खास किस्म का देहाती 'माइंड-सेट' है, जो सैक्सिस्ट है, सैक्स से शुुरू होकर सैक्स पर ही खत्म होता है। यहाँ यह सवाल नहीं है कि जैसा कि विद्यानिवासजी ने बहस उठाई थी कि धूमिल के काव्य में काम है कि नहीं है या कामुकता के प्रति वितृष्णा है या नहीं है। हो सकता है कि वहाँ काम न हो, कामुकता के प्रति गहरी वितृष्णा हो; लेकिन ऐसा भला कैसे हो सकता है कि आप लगातार यौन-प्रतीक और बिंब लाएँ और कहें कि नहीं, कामुकता से इसका कोई लेना-देना नहीं। हो सकता है कि आपका न हो, लेकिन पाठक तो पाठ और भाषा से ही आप तक पहुँचेगा, क्या आप उसे मना करने आएँगे कि भाई, इसका यह अर्थ मत लेना जो यहाँ निकल रहा है, बल्कि मैं बताउँगा कि क्या अर्थ लेना है! लेकिन यह सब दरअसल एक खामखयाली है। असल बात यह है कि कवि खुद यह चाहता है कि इसका यही अर्थ लिया जाए! वह स्वयं यथार्थ को इस तरह पेश कर रहा है कि वह इतना ही अश्लील और भदेस है, जितना उसका यह उपमान! इस पर ऊपर हमने बात की। यानी कि कवि मूलतः यह मानता है कि स्त्री पर्याय है यौन का और यौन का अर्थ है, अश्लीलता! इस तरह दुनिया-भर का सारा बोझ आप औरत के कंधों पर डाल देते हैं और उस पर अबोधता यह कि आप कहते हैं कि मैं तो कामुकता से कोसों दूर हूँ। होंगे आप दूर, व्यक्तिगत तौर पर आप काम से परहेज भी करते होंगे लेकिन आपका अंतर्मन तो वहीं चक्कर काटता रहता है, जब भी आप कुछ लिखने का मन बनाते हैं, आपका यह अंतर्मन आपकी अभिव्यक्ति पर कब्जा कर लेता है। धूमिल का यह दरअसल सबसे बड़ा अंतर्विरोध है कि वे खुद कामुकता से बहुत-बहुत दूर हैं लेकिन उनकी कविता बरबस इसी में अपनी सार्थकता तलाशती है। निश्चय ही, जैसा कि मैंने कहा, यथार्थ-निरूपण की कवि की क्षमता में कहीं कोई कमी नहीं है, पर यह यथार्थ विरूपित और अन्यथाकृत होकर पाठक तक पहुँचता है। जहाँ धूमिल स्त्री को उपमान की तरह नहीं लाते, उसका वस्तुकरण नहीं करते, उसे एक जीते-जागते अस्तित्ववान व्यक्ति के रूप में/मुख्य विषयवस्तु के रूप में लाते हैं, वहाँ वे बहुत ही संयत और दृष्टि-संपन्न रूप में सामने आते हैं।

धूमिल की काव्य-प्रविधि अर्थात् प्रकरी-पताका रूप में स्त्री

धूमिल के पास ऐसी बहुत-सी कविताएँ हैं, जिनमें स्त्री एक स्वायत्त काव्यवस्तु के रूप में आती है। धूमिल ने आधारभूत रूप में भी इस काव्यवस्तु को लिया है और इस पर केंद्रित कुछ स्वतंत्र कविताएँ लिखी हैं। इसके अलावा अन्य विषय-संदर्भ-केंद्री कविताओं में भी प्रसंगवश इस मुद्दे को लिया है और नायाब टिप्पणियाँ की हैं। इनमें एक अतिमहत्वपूर्ण विषय तो यही है कि भारतीय-विशेषतः हिंदू-समाज में औरत की वास्तविक स्थिति क्या व कैसी है। इस मामले में धूमिल एकदम बेबाक और दो-टूक हैं। इस मामले में वे किसी को नहीं बख्शते; यहाँ तक कि खुद को भी, अपने कथित पुरखों को भी, समाज के ठेकेदारों को भी। 'नौ मादा कविताएँ' की पाँचवीं कड़ी 'पाँचवें पुरखे की कथा' में वे लिखते हैं -

उनके लिए पूजा-पाठ :

केवल ढकोसला था

ऐसे अहिंसक कि -

उनकी बंदूक में

बया का घोंसला था

ऐसे थे संयमी कि -

औरत जो एक बार

जाँघ से उतर गई

उनके लिए मर गई

चतुरी चमार की

लटुरी पतौह को (सुदामा पाँड़े का प्रजातंत्र, पृ. 124)।

यहाँ जाति और जेंडर के अंतर्संबंध देखे जा सकते हैं, जहाँ दलित जातियों की स्त्रियाँ सदियों से कथित उच्च वर्ण-विशेषतः ब्राह्मण-के पुरुषों के निशाने पर रहती आई हैं। इसी तरह वर्ग और जेंडर के अंतर्संबंधों का खुलासा इन पंक्तियों में होता है -

यह जानकर कि तुम्हारी मातृभाषा

उस महरी की तरह है, जो

महाजन के साथ रात-भर

सोने के लिए

एक साड़ी पर राजी है (संसद से सड़क तक, पृ. 13)।

यहाँ बेशक धूमिल उपमान-विधान में सैक्सिस्ट हैं और व्यंग्य की उनकी धार नैगेटिव है क्योंकि यह महरी एक साड़ी के एवज में यह सब करने के लिए खुद राजी नहीं है, उसके सामने ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न की गई हैं कि ऐसा करने के लिए वह विवश है। कोई भी स्त्री यदि उसके सामने कोई और विकल्प होता है तो इस विकल्प को कदापि नहीं चुनती। वह खुद राजी है, यह कहने का अर्थ तो यह होता है कि इस तरह बिक जाना स्त्री-मात्र की आम प्रवृत्ति है और वह मूलभूत रूप से ऐसी होती है। धूमिल अन्यत्र कहीं ऐसा कहते भी हैं। बावजूद इस सब के यह बिंब - जिसे कि यहाँ उपमान के रूप में लाया गया है - महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय इसलिए है कि इसके मार्फत धूमिल अपने अनजाने स्त्री-संबंधी एक भीषण यथार्थ को उजागर कर सके हैं। जैसी कि धूमिल की काव्य-प्रविधि है, स्त्री का यह यथार्थ उनका मूल कथ्य नहीं है, यह एक प्रकरी-पताका ही है, लेकिन जिस रूप में भी है, वस्तुगत रूप से हमारे काम का है।

धूमिल का प्रिय विषय : दांपत्य अर्थात् अतृप्त यौन-संवेदना का परावर्तन

आम हिंदू दांपत्य पर धूमिल की काव्यात्मक टिप्पणियाँ इतनी मारक और काटकर रख देने वाली हैं कि ताज्जुब होता है कि यह कवि इन अनुभवों को कहाँ से लाया! हो सकता है, इनमें उनके अपने व्यक्तिगत जीवनानुभव भी शामिल हों। और न भी हों तो इतना तो निश्चित है कि कवि की पर्यवेक्षण-शक्ति इतनी तीव्र और मर्मभेदी है कि वह सिर्फ असलियत को निकालकर बाहर लाती है। हिंदी के आम कवि की तरह दांपत्य के इर्द-गिर्द वह कोई ग्लैमर - जिसे दरअसल घटाटोप कहना चाहिए -, नहीं बुनता बल्कि इतने निर्मम और बेलौस तरीके से उसे तार-तार करता है कि सहसा विश्वास नहीं होता कि अपने स्थापत्य में स्त्री को खिलौने की तरह बरतता यह कवि उसके प्रति हद दर्जे तक सहानुभूतिशील भी है। उसका लगभग यह स्पष्ट और अंतिम निष्कर्ष है कि भारतीय दांपत्य-व्यवस्था में स्त्री के लिए कोई स्वतंत्र-स्वायत्त स्पेस नहीं है। विद्यानिवास मिश्र की तरह उनके बारे में यह कतई नहीं कहा जा सकता कि धूमिल के काव्य में काम नहीं है या कामुकता के प्रति गहरी वितृष्णा है। धूमिल के काव्य में काम-भावना है और बहुत ही सघन और प्रकट रूप में है। कामुकता - दरअसल इसे यौनिकता कहना चाहिए - भी खूब है। हाँ, कह सकते हैं कि लंपटता नहीं है। नारी की गरिमा जैसे मुहावरे का यहाँ कोई अर्थ नहीं है बल्कि यह वस्तुस्थिति को बरगलाने/अन्यथाकृत करने का एक उपागम है। इसके पीछे मर्दवादी मानसिकता की बू आती है। जो हो। हमें कहना यहाँ यह है कि धूमिल दांपत्य में स्त्री की दोयम दर्जे की स्थिति से बेहद चिंतित और परेशान दिखाई देते हैं। वे बार-बार यह दिखाते हैं कि समाज ने औरत की यह क्या हालत कर रखी है कि न वह इधर की है न उधर की। न उसे एक पत्नी के रूप में ही ठीक से रहने दिया गया है, न एक माँ के रूप में ही। एक स्त्री के रूप में तो खैर ठीक से रहने का सवाल ही कहाँ उठता है! हर तरफ से जिंदगी-भर वह बेहद दबाव में रहती आती है।

धूमिल ने स्त्री को जो अपने अप्रस्तुत-विधान के एक अवयव के रूप में लिया है तो इसकी एक ध्वनि यह भी है कि भारतीय समाज में औरत की हैसियत एक 'अप्रस्तुत' की तरह ही है, वह समाज का केंद्रीय संदर्भ नहीं है, मुख्यधारा में नहीं है। ध्यान रहे कि हम कविता में एक अप्रस्तुत की तरह स्त्री के इस्तेमाल के औचित्य पर विचार नहीं कर रहे हैं, सिर्फ धूमिल के संदर्भ में उसकी कैफियत की संभावनाओं पर बात कर रहे हैं। धूमिल को यह दुनिया जैसी मिली, उसमें उसने कोई तब्दीली नहीं की, तब्दीली करने की इच्छा उसकी रही होगी लेकिन उसने खुद को इस पर रिएक्ट करने, इसकी लानत-मलामत करने, इसकी बखिया उधेड़ने तक सीमित रखा; यह ऊपर हम कह चुके हैं। यह काम भी हालाँकि कोई कम महत्व का नहीं था। यह काम समय की जरूरत थी। धूमिल की उल्लेखनीयता यह है कि उसने इसे एक ऐसी ऊँचाई तक पहुँचाया कि बहुत-सारे कवि स्वतः उसके आगे फीके पड़ गए। 'आलोचनात्मक यथार्थवाद' धूमिल की सीमा भी रही और शक्ति भी। इसका कारण शायद यह रहा हो कि एक गजब तटस्थता या कहें कि यथातथता धूमिल में पाई जाती है जो पर्यवेक्षणात्मक आनुभविकता से आगे उन्हें नहीं बढ़ने देती। संभवतः इसीलिए ज्यादातर वे गुस्से, तानाकशी, लानत भेजने, चोट पहुँचाने जैसी मानसिकता में देखे जाते हैं। इसका काव्यात्मक प्रतिफल यह हुआ कि यथार्थ बहुविध और बहुआयामी रूप में उभरकर सामने आया। वस्तुस्थिति बहुत मारक और लगभग संहारक प्ररूप में नमूदार हुई। जैसे कि शायद ही किसी हिंदी-कवि के यहाँ ऐसी पंक्तियाँ मिलेंगी -

नेकर में नाड़े-सी पड़ी हुई पत्नी का प्यार

रिश्तों की तगार में ऊँघती हुई

एक खास और घरेलू किस्म की थू

आक् ! (सुदामा पाँड़े का प्रजातंत्र, पृ. 26)।

धूमिल बहुत निर्मम तरीके से एक परंपरागत समाज में पति-पत्नी के कथित प्यार की वास्तविक अंदरूनी तहों को खोलते हैं और देखते हैं कि प्यार के नाम पर वहाँ केवल स्त्री का उपनिवेशीकरण है -

प्यार -

मैं। सुनता हूँ खून में

अंधाकूप का साइरन अपनी शिराओं में

सुनता हूँ मगर नहीं जानता -

यह साइरन

अंधाकूप खुलने का है या शुरू

होने का। मैं प्यार को नहीं जानता।

सिर्फ जानता हूँ कि हम दोनों

ज्यादातर चुप हैं या जब भी हम बोलते हैं

मेरे शब्द तुम्हारे शब्दों को

ढक लेते हैं। (वही, पृ. 128)।

यह कितना विचित्र है कि भारतीय - विशेषतः देहाती - परिदृश्य में पति-पत्नी का प्यार इकतरफा क्रिया है। कुछ इस तरह का दृश्य है कि स्त्री यहाँ अकर्मक क्रिया की तरह है। वह ऐक्टिव नहीं पैसिव रूप में ही है। सक्रियता सिर्फ पुरुष के हिस्से में है। जरा सोचा जाए कि कालांतर में इस इकतरफापन के क्या-क्या नतीजे सामने आ सकते हैं? इसके कम से कम चार नतीजे तो खुद धूमिल ने ही गिनाए हैं, जो उनकी 'गृहस्थी : चार आयाम' कविता में निबद्ध हैं। इनमें पहले दो आयाम तो ये हैं -

1. स्त्री का उसकी भावनाओं, संवेदनाओं, अंतरात्मा से रहित होकर केवल एक देह में तब्दील हो आना (कल सुनना मुझे, पृ. 81),

2. स्त्री का धीरे-धीरे सारी क्रिया के प्रति उदासीन और रुचिहीनता की स्थिति में पहुँच जाना। (वही)।

और बाकी के दो आयाम ये -

3. पुरुष का भी इस स्थिति से संक्रमित हो आना; दोनों के बीच एक बेहिसाब ठसपन पैदा हो आना (रात की प्रतीक्षा में / हमने सारा दिन गुजार दिया है / और अब जब कि रात / आ चुकी है / हम इस गहरे सन्नाटे में / बीमार बिस्तर के सिरहाने बैठकर / किसी स्वस्थ क्षण की / प्रतीक्षा कर रहे हैं) (वही, पृ. 81-82) और;

4. पति-पत्नी का पूरी तरह एक यौन-मशीन में बदल जाना (न मैंने / न तुमने / ये सभी बच्चे / हमारी मुलाकातों ने जने हैं / हम दोनों तो केवल / इन अबोध जन्मों के / माध्यम बने हैं।) (वही, पृ. 82)।

इसकी एक पाँचवीं स्थिति और है - जिंदगी से यौनिकता का हमेशा-हमेशा के लिए तिरोहित हो जाना - ''अंत में हमने तय किया अपनी टाँगें / अबारीक नहीं करेंगे हम अपनी / दिनचर्या में अपने बिस्तर की / सेहत के लिए / प्रार्थना करेंगे / चमड़े की जिल्द में बँधी हुई अपनी मुहब्बत / का मजा / रोजमर्रा के खर्च में जमा करते हुए।'' (सुदामा पाँड़े का प्रजातंत्र, पृ. 131)। कोई चाहे तो कह सकता है कि यह प्यार का उदात्तीकरण है या देह की भौतिकता से उठकर जिंदगी की आधिभौतिक व्यापकता में उसका रवाँ हो जाना है! जो लोग इस तरह का भ्रम पाले हुए हैं, उन्हें यह वैचारिकता मुबारक। लेकिन हकीकत यह है कि यह दांपत्य का पूरी तरह असफल हो जाना है, इसके अलावा कुछ नहीं। क्योंकि यौनिकता एक ऐसी मूलाधार-भूमि है, जिस पर दांपत्य टिका होता है। इस जमीन के तिड़कने का अर्थ है, भवन का भरभराकर गिर जाना; हम चाहे उसे कितना भी अन्यथागत रूप में व्याख्यायित करते जाएँ! यह देखकर दुखद आश्चर्य होता है कि परंपरागत समाजों में दांपत्य के बिखरने की यह प्रक्रिया विवाह के दिन से ही शुरू हो जाती है। धूमिल की 'नौ मादा कविताएँ' की सातवीं कड़ी 'प्यार' का यह अंश देखा जाए -''मैं / छोटी-छोटी सुविधाओं के मोर्चों पर / मारा गया / कुल का एक बटा सात / ब्याह के दिन मारा गया मैं / मेरी सुहागरात / उस सितारे की चीख थी / जो सागर में चमकी और बिना किसी / भाषा के बुझ गई।'' (वही, पृ. 128-29)।

यह सचमुच कितना विचित्र है कि जिस देश में दांपत्य को इस कदर महिमामंडित किया गया हो कि वह सात जन्मों का बंधन तक कह दिया गया हो, वहाँ पहले ही जनम में पति-पत्नी की यह हालत है! दरअसल सात जन्मों वाली बाध्यता केवल स्त्री के लिए थी, पुरुष के लिए नहीं। और स्त्री की हालत तो हमने देखी ही। पुरुष की स्थिति भी उससे कुछ ज्यादा बेहतर नहीं है। सामाजिक रूप से वर्चस्व के बावजूद पुरुष की यह हालत है! दरअसल दांपत्य की गाड़ी समानता, संवेदनशीलता और इन दोनों से पैदा सहअस्तित्व से चलती है। परंपरागत सामाजिकीकरण और सांस्कृतीकरण की प्रथा इसे सामंती संबंधों में बदल देती है। यह प्रथा हमारे अनजाने हमारे अंदर प्रवेश करती है और सारा गुड़-गोबर कर देती है। धूमिल ने हिंदी-कविता में संभवतः पहली बार इस यथार्थ को इस गहराई से पकड़ा। मेरा अनुमान है कि धूमिल के यहाँ यौन प्रतीकों, बिंबों इत्यादि का जो इतना घटाटोप छाया है, इसी अतृप्त यौन-संवेदना का परावर्तन (पर्वर्जन) है। अन्याब्दों में इसे यौन-कुंठा भी कहा जा सकता है। एक तरह से धूमिल खुद दांपत्य में घुसी सामंती सांस्कारिकता से क्षुब्ध दिखाई देते हैं।

नक्सलवादी आंदोलन में भाग लेती स्त्रियों के बहाने कुछ गतिशील विचार

यह एक सुखद आश्चर्य ही है कि धूमिल अपनी काव्य-यात्रा के क्रम में ही अपनी इस कुंठा को काबू में करते हैं और नक्सलवादी आंदोलन में भाग लेती आदिवासी या और दूसरी स्त्रियों के बहाने स्त्री के प्रति अपने गतिशील विचारों को प्रकाश में लाते हैं। अब यह जाँचने या मापने का साहित्येतर कोई पैमाना हमारे पास नहीं है कि सचमुच धूमिल अपनी कुंठाओं से उबर पाए थे या नहीं या नक्सलवाद जैसा डि-क्लास वे हो पाए थे कि नहीं? हिंदी में एक अजीब स्थिति यह पाई जाती है कि आप मंच पर अच्छा-अच्छा बोलते चलिए, अच्छी-अच्छी धाँसू क्रांतिकारी कविताएँ लिखते चलिए, जुलूसों में गला फाड़-फाड़कर नारे लगाते चलिए लेकिन जब कतल की रात आए तो चुपचाप अपने दड़बे में घुस जाइए या आप लाख ढूँढ़ने पर भी कहीं न मिलें तो अगले दिन पता चले कि आप तो दूसरे शिविर में अपने कुछ सजातियों के साथ बैठे चमगोइयाँ करते देखे गए थे! अमूमन यह देखने-सुनने में आया है कि वे लोग जिन्होंने स्त्री की स्वतंत्रता, स्वायत्तता, आत्मनिर्भरता इत्यादि पर शानदार कविताएँ लिखी हैं, लेख लिखे हैं, घर पहुँचते ही शराब या शक के नशे में पत्नी को पीटते-प्रताड़ित करते पाए गए हैं। स्त्री व्यावहारिक तौर पर कभी भी स्वतंत्रता-योग्य उन्हें नहीं लगी! अपने मर्दवाद को वे कभी भी जीत नहीं पाए। साहित्य ही नहीं प्रायः हर कला-क्षेत्र में ऐसी विभूतियाँ देखने को मिलेंगी। प्रसिद्ध कथाकार सुधा अरोड़ा ने अपने एक लेख 'कलाकार के सौ गुनाह माफ हैं' (आम औरत : जिंदा सवाल; सामयिक प्रकाशन, न.दि. 2009; पृ.129-132) में नामजद रूप से उदाहरण सहित इसके ब्यौरे दिए हैं। और कुछ नहीं तो चुप्पी और उपेक्षा-अवहेलना की हिंसा से तो आप उसे काबू में कर ही सकते हैं। 'सेंस ऑफ नॉन बिलांगिंग' और 'चुप्पी की हिंसा' एक ऐसा हथियार है, जिससे अच्छी से अच्छी पढ़ी-लिखी, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और दमदार महिला को भी आप नाकों चने चबवा सकते हैं। या तो वह आपसे पीछा छुड़ाकर भाग जाए या आपकी बाँदी बन जाए; दोनों स्थितियों में आपका ही आपका फायदा है। (द्रष्टव्य, सुधा अरोड़ा का 'जिसके निशान नहीं दिखते... मानसिक प्रताड़ना के खिलाफ' शीर्षक लेख, वही, पृ. 147-65)। मुझे नहीं मालूम कि धूमिल ऐसे थे कि नहीं, उनकी कविताओं से तो यही लगता है कि स्त्री की इस दोयमता से वे बहुत परेशान थे और उनका विचार था कि स्त्री अपनी मादा सीमाओं और असुरक्षा-बोध से ऊपर उठ ले तो उसके सामने एक नई और बेहतर दुनिया खुल सकती है। जैसे कि कुमारी रोशनारा बेगम की आत्म कुर्बानी के वाकये पर लिखी अपनी कविता 'आतिश के अनार-सी वह लड़की' में एक जगह वे लिखते हैं -

मुमकिन था यह भी कि अपने देशवासियों की गरीबी से

साढ़े तीन हाथ अलग हटकर

एक लड़की अपने प्रेमी का सिर छाती पर रखकर

सो रहती देह के अँधेरे में

अपनी समझ और अपने सपनों के बीच

... ... ...

मुमकिन यह भी था कि थोड़ी-सी मेहँदी और

एक अदद ओढ़नी का लोभ

लाल तिकोने के खिलाफ बोलता जिहाद

और अपने 'वैनिटी बैग' में छोड़कर बच्चों की एक लंबी फेहरिस्त

एक दिन चुपचाप कब्र में सो जाती हौवा की इनकलाबी औलाद

(कल सुनना मुझे, पृ. 58)।

इन पंक्तियों के बीच यह अंश और आता है - ''मैं उसे कुछ भी न कहता सिर्फ कविता का दरवाजा / उसके लिए बंद रहता लेकिन क्या समय भी उसे / यूँ ही छोड़ देता? / वह उसके चुंबन के साथ बारूद से जले हुए गोश्त का / एक सड़ा हुआ टुकड़ा जोड़ देता / और हवा में टाँग देता उसके लिए / एक असंसदीय शब्द - नीच !'' (वही)। यानी कि जिसका जूता उसी का सिर! समय यानी कि समाज और उसकी परंपरा। पहले तो स्त्री को यही उसका कर्तव्य-कर्म और आदर्श बता-बताकर यहीं तक सीमित कर दिया कि वह सिंगारदान, आईने, केश-सज्जा यानी कि देह-केंद्रिकता में फँसी रहे (वही, पृ. 59), और फिर इसी देह-केंद्रिकता के आधार पर उसका अवमाननीकरण (डि-ग्रेडेशन)! यह हमारे यहाँ ही है कि पहले तो स्त्री को उसकी दैहिकता में गौरवान्वित और महिमामंडित किया और फिर उसी देह के चलते उसका उपनिवेशीकरण हुआ! धूमिल की एक और कविता है - 'कल'। इस कविता में वे इस प्रक्रिया पर इस तरह प्रकाश डालते हैं - ''कल तुम जमीन पर पड़ी होगी और बसंत पेड़ पर होगा / नीमतल्ला, बेलियाघाट, जोड़बगान / फूलों की मृत्यु से उदास फूलदान / और उगलदान में कोई फर्क नहीं होगा।'' (वही, पृ. 78)। फूलदान से उगलदान बन जाना; कुल यही नियति भारतीय समाज ने स्त्री को दी है। धूमिल कथित तौर पर इसका निषेध करते हैं और एक ज्यादा खुला आसमान उसके लिए उपस्थित घोषित करते हैं। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि अब जनता को ही नहीं कविता को भी अपनी मुक्ति का एक शानदार रास्ता मिल गया है -

जैसे वह आदिवासी औरत झाड़ी की ओट से

जलते हुए झोंपड़ों को देखती उतरती चली गई

वो जंगली ढलान -

जहाँ फौरी कार्रवाई के लिए हमलावर दस्ता

पेटियाँ कस रहा था।

... ... ...

...इसके बाद

तुम जानते ही हो शब्दास्त्र बन गए हैं

और अगवा बंदूक की निशानदेही पर

कविता ने ढूँढ़ लिया है अपनी मुक्ति का रास्ता

दुश्मन की छाती के खून भरे छेद से ।

(सुदामा पाँड़े का प्रजातंत्र, पृ. 76-77)

वामपंथी विचार का आवश्यक चरण : जेंडर-संवेदनशीलता

यह तो ठीक है। लेकिन रोशनआरा बेगम के लिए लिखी कविता में धूमिल आदतन फिर कुछ ऐसे भाषा-प्रयोगों से बच नहीं पाए हैं, जो स्त्री के प्रति पुरुष की एक खास मानसिकता से पैदा होते हैं। जैसे यह कि ''बाबुल के देश का चुटिहल धड़कता हुआ टुकड़ा था सीने में'' (कल सुनना मुझे, पृ. 57) या जैसे यह कि ''एक हाथ जो नाजुक जरूर था'' (वही) या यह कि ''और लोग चकित थे देखकर कि एक नन्हा गुलाब'' (वही, पृ. 58) या यह कि ''बीस सेबों की मिठास से भरा हुआ यौवन'' (वही, पृ. 59)। ये शब्द-प्रयोग उसी जैविक तत्ववाद के प्रतीक हैं, जिसका यहाँ ऊपर हमने जिक्र किया और जिससे धूमिल जीवन-भर मुक्त नहीं हो पाए। संभवतः जिस माहौल में वे थे, इनसे मुक्त हो सकते नहीं थे। जहाँ तक सतर्क रहे आने (अ.कु.दु.) की बात है तो कम से कम धूमिल से तो यह उम्मीद करना बेकार है। यहाँ ध्यान देने की बात एक यह भी है कि यदि नक्सलवाद या (मोटे तौर पर) वामपंथी विचारधारा को मात्र लबादे या दिखावटी आवेग की तरह ओढ़ा न जाए और सचमुच में इसे आत्मसात किया जाए तो इस आत्मसातीरण की प्रक्रिया का एक आवश्यक चरण है - जेंडर-सेंसिटाइजेशन यानी जेंडर-सचेतनता या संवेदनशीलता। नक्सलवादी संदर्भों पर कविता लिखते समय भी यदि कोई भाषा के मर्दवादी ढाँचे के प्रति सतर्क नहीं है तो इसका सिवाय इसके और क्या अर्थ हो सकता है कि कवि अपने स्वयं के कठघरों से मुक्त नहीं हो पाया है और उसकी यह काव्यगत वैचारिकता सिर्फ एक शाब्दिक कलाकारी है। यह बात धूमिल ही नहीं, हिंदी के और भी कई नामचीन कवियों के बाबत जाँचने योग्य है।


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हिंदी समय में शंभु गुप्त की रचनाएँ