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संस्मरण

एक पुलिस अधिकारी के संस्मरण
महेश चंद्र द्विवेदी

अनुक्रम

अनुक्रम चूज योर टाइम ऐण्ड प्लेस     आगे

'आई डोंट मीन दैट यू शुड बिकम ब्रह्मचारीज, बट चूज योर टाइम एंड प्लेस' - नेशनल एकेडेमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन, मसूरी के डाइरेक्टर श्री दत्त वर्ष 1963 के फाउंडेशनल कोर्स के समापन भाषण में प्रोबेशनरों को अंतिम उपदेश देते हुए बोल रहे थे। केंद्रीय सरकार की सभी प्रथम श्रेणी की सेवाओं के नवचयनित अधिकारियों को ओ. ऐल. क्यू. एंड के. (ऑफीसर लाइक क्वालिटीज ऐण्ड नॉलिज) सिखाने हेतु यह कोर्स आई.ए.एस. अधिकारियों के प्रशिक्षण हेतु स्थापित इस एकेडेमी में प्रतिवर्ष की भाँति आयोजित हुआ था। मैं आई.पी.एस. सेवा का अधिकारी भी इन्हीं प्रोबेशनरों में एक था। फ़ाउंडेशनल कोर्स पाँच माह का था जिसे पूरा करने के बाद आई.ए.एस. प्रोबेशनर वहीं अपना वर्ष भर का प्रशिक्षण पूरा करते थे और अन्य सेवाओं के प्रोबेशनर्स अपनी-अपनी एकेडेमी में चले जाते थे। इस कोर्स का पाठ्यक्रम हमें भारतीय संविधान, विधान, नागरिकता, इतिहास तथा भारत की सामाजिक, राजनैतिक, प्रशासनिक एवं आर्थिक परिस्थितियों से अवगत कराने एवं उनके प्रति सम्वेदनशील बनाने के श्लाघनीय उद्येश्य से तैयार किया गया था परंतु इस एकेडेमी का प्रशासनिक नियंत्रण पूर्णतः आई.ए.एस. अधिकारियों के हाथ में था और एकेडेमी का वातावरण पूर्णतः आई.ए.एस.-मय था, जिसके कारण हम संविधान और समाज के प्रति कम और जीवन जीने की साहबी कला के प्रति अधिक संवेदनशील हो रहे थे। श्री दत्त की उपर्युक्त अंतिम शिक्षा फाउंडशनल कोर्स में हमें प्राप्त शिक्षा का निचोड़ थी। अतः उनकी ब्रह्मचारी न बन जाने की बात से मेरे जवां दिल में गुदगुदी तो हुई, परंतु कोई आश्चर्य नहीं हुआ।

11 जुलाई, 1963 की भीगी-सी शाम को जब मैं एकेडेमी ज्वाइन करने गया था, तो अँगरेजी जमाने के भव्य शार्लविल भवन, जिसमें आजकल एकेडेमी चल रही है, के गेट पर अँगरेजी शराब की एक बड़ी-सी दुकान देखकर मुझ जैसे ग्रामीण अंचल से आए नवजवान को कुछ अजीब-सा लगा था - विशेषतः इसलिए कि वहाँ वही एकमात्र दुकान थी, अन्य किसी वस्तु की दुकान नहीं थी। बाद में ज्ञात हुआ कि चूँकि एकेडेमी से मसूरी का बाजा़र दो किलोमीटर दूर था, अतः आई.ए.एस. प्रोबेबेशनरों के समुचित प्रशिक्षण में सुविधा हेतु मधुशाला का प्रबंध एकेडेमी के गेट पर ही करा दिया गया था। चाहे अप्रत्यक्ष रूप से ही हो, मद्यपान की कला में वांछनीय प्रशिक्षण एवं प्रोत्साहन एकेडेमी के प्रशासनिक अधिकारी आई.ए.एस. प्रोबेशनरों को देते रहते थे। उदाहरणार्थ एक दिन एक आई.ए.एस. प्रोबेशनर इस मधुशाला पर ब्लैक नाइट की बोतल खरीद रहा था कि तभी एक डिप्टी डाइरेक्टर महोदय ने वहाँ प्रवेश किया। चूँकि यह प्रोबेशनर बिहार के एक गाँव का मूल निवासी था, अतः डिप्टी डाइरेक्टर महोदय को देखकर वह कुछ झिझका। यह भाँपकर डिप्टी डाइरेक्टर महोदय अवलिम्ब उसे आश्वस्त करते हुए बोल पड़े, 'ओह कम आन, आई ऐम आल्सो गोइंग टु बाई वन'

मैंने आई.ए.एस. एकेडेमी के प्रशासकों में आई.ए.एस. प्रोबेशनरों को ब्रह्मचारी न बनने देने एवं इस विषय में उनके प्रति दिलखोल दरियादिली दिखाने में कभी कोई कमी नहीं पाई। रेलवे एकांट्स सेवा की एक महिला प्रोबेशनर काफी बिंदास थी। एक शाम चार आई.ए.एस. प्रोबेशनरों ने उसे डिनर पर निमंत्रित कर खूब पी और पिलाई। फिर सहारा देकर एक के कमरे में ले जाकर उसकी ऐसी दशा कर दी कि वह कुछ दिन तक अपने कमरे में पड़ी रही और लगभग एक माह तक तकिए के सहारे ही कक्षा में बैठ पाती थी। उन्हीं आई.ए.एस. प्रोबशनरों में से एक उस महिला प्रोबेशनर का तकिया उसके कमरे से क्लासरूम तक उसके साथ-साथ लाता था और वापस ले जाता था। घटना के तथ्य एकेडेमी में सबको ज्ञात हो गए थे, परंतु प्रशासनिक अधिकारियों ने संबंधित प्रोबेशनरों को मात्र यह सलाह देकर मामला रफा-दफा कर दिया था - 'चूज बियरेबुल नम्बर'

इस घटना के पहले भी हम लोगों ने सुन रखा था कि मेरे बैच के पूर्वगामी बैच के एक आई.ए.एस. प्रोबेशनर ने शार्लविल भवन के पीछे की पहाड़ी पर रहने वाले एक पहाड़ी व्यक्ति की तेरह-चौदह वर्ष की कन्या के साथ जबरदस्ती कर दी थी, तो तत्कालीन डाइरेक्टर महोदय ने एकेडेमी की, अपनी एवं कन्या की इज्जत का 'खयाल' कर उस प्रोबेशनर को 'चूज प्रॉपर एज' की सलाह देकर मामले को ठंडा कर दिया था।

इस एकेडेमी की एक अन्य विषय में भी विशेष प्रशंसा करनी होगी कि यह भारत के भविष्य के शासकों में देश के नागरिकों एवं शासन की अन्य सेवाओं के प्रति 'सही' दृष्टिकोण उत्पन्न करने में बिल्कुल नहीं चूकती है। मैं इस एकेडेमी के स्टेपुल्टन नामक हॉस्टल के कमरा नम्बर आठ में रहता था और उसी कमरे में आडिट एंड एकाउंट्स सर्विस का बागची नामक प्रोबेशनर मेरा रूम पार्टनर था। चूँकि इस होस्टल की बिल्डिंग पुरानी थी और रखरखाव निम्नस्तरीय था, अतः इसके सभी कमरे आई.ए.एस. के अलावा अन्य सेवाओं के प्रोबेशनरों केा ही आवंटित किए गए थे। लगभग दो माह के प्रशिक्षण के बाद मेरा रूम-पार्टनर बागची आई.ए.एस. में ले लिया गया क्योंकि आई.ए.एस. में चयनित एक अभ्यर्थी ने सर्विस ज्वाइन नहीं की थी। उसे तुरंत हैपी वैली, जो सर्वोत्तम होस्टल था, में कमरा आवंटित कर दिया गया। इस प्रोबेशनर ने बाद में एक दिन मुझे बताया, 'महेश! यू नो व्हाट दे (प्रशासक) टेल दी आई.ए.एस. प्रोबेशनर्स प्रायवेट्ली - 'रिमेम्बर, यू आर देयर टु रूल दी कंट्री व्हाइल ऑल अदर्स आर टु सर्व'।' मुझे अपनी इस सेवक की स्थिति का सही ज्ञान फांउंडेशनल कोर्स के मस्ती भरे दिनों के समाप्त होने पर सेंट्रल पुलिस ट्रेनिंग कालिज, माउंट आबू आने पर ज्ञात हुआ, जहाँ कालिज तथा मेस में शराब और लड़की का मेन्शन करना तक मना था तथा आबू पहाड़ की हाड़तोड़ सर्दी में प्रातः साढ़े पाँच बजे परेड पर प्रस्थान करना पड़ता था और रात्रि में डिनर के समय तक एक अधिकारी हमें उचित व्यवहार सिखाने एवं हमारे आचरण पर निगाह रखने हेतु हमारे साथ रहता था।

परंतु यह न बताकर कि नेशनल एकेडेमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन, मसूरी में गुजरे मेरे दिन मेरे जीवन के कतिपय सबसे मजेदार दिनों में से थे, एकेडेमी के प्रति कृतज्ञता के ज्ञापन के सुअवसर से मैं चूकना नहीं चाहता हूँ।


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