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कविता

टुनई काका
शैलेंद्र कुमार शुक्ल


टुनई काका गाय-भैंस की चरवाही में
रखते थे मशगूल अपने आप को
खरिया-खुरपा,
बंदर-छाप तमाखू के साथ चूने की गोली
और बीड़ी-माचिस लुंगी की गुलेट मे रख कर
हार-पात घूमा करते थे टुनई काका
                  लोग कहते थे बड़ा औगुनी है टुनइया !

जाड़े-पाले की ठंड में रात-रात जाग कर अपने
गेंहूँ-मटर के खेतों की सिचौनी करते थे टुनई काका
आधी रात में भी ट्यूवेल-बोर के 15 फीट
गहरे गड्ढे में पट्टा चढ़ाने पैठ जाते थे टुनई काका
                   लोग कहते थे बड़ा हिम्मती है टुनइया !

'बेला का गौना', 'ऊदल का ब्याह', 'माड़ौ की लड़ाई'
कजरी, चइता, सरिया, सोहर और न जाने क्या-क्या गाते थे टुनई काका
मेला-मिसरिख में सलीमा और नौटंकी
रात-रात भर देखा करते थे टुनई काका
लेकिन भोर भए घर भाग आते थे टुनई काका
                  दादा कहते थे बड़ा मिजाजी है टुनइया !

इस साल पहले सूखा फिर बाढ़ ने सब चौपट कर दिया
गाँव-घर में त्राहि-त्राहि मची है बड़े दुखी हैं टुनई काका
अब दिल्ली जा रहें हैं बनिज कमाने टुनई काका
आँसू भरी आँखों से गाँव की ओर मुड़-मुड़ कर देखते हैं टुनई काका
                   लोग कहते हैं बेईमान नहीं है टुनइया !


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