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कविता

दिल्ली की रातें
शैलेंद्र कुमार शुक्ल


दिल्ली की रातें
रात नहीं
दिन भी नहीं हो सकतीं दिल्ली की रातें
भोर जैसा इन रातों में कुछ भी नहीं
इन रातों का अँधेरा
यमुना पार खड़ा है
बरसों से एक नाव के इंतजार में
और नदी काली होती जाती है

ऐसी ही एक रात के दायरे में
कोठारी हॉस्टल के गेट पर
इंतजार में खड़ा है दिल्ली का पहला दोस्त
कुँवर नारायण की कविता 'प्रेम रोग' के साथ
यह जानते हुए कि यह कविता का पुराना नाम है

दिल्ली कि रातें
कविता का पुराना नाम
शहर का पहला दोस्त

जैसे पीछे बहुत कुछ भूल आया हूँ
इस शहर मे भूल जाने के लिए
दिल्ली की दो रातों के बीच।


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