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कविता

प्रेम नहीं, प्रेम
शैलेंद्र कुमार शुक्ल


प्रेम सिर्फ प्रेम नहीं होता
उसकी होती है एक
हरी-भरी फसल

फसल सिर्फ फसल नहीं होती
उसमें होती हैं किसान की आँखें

आँखें...
आँखों में पानी होता है
जिसे सूरज गर्म करता है
हवा उड़ाती है
पानी न होने पर धरती बंजर हो जाती है

लेकिन
बंजर सिर्फ बंजर नहीं होता
मेरी दोस्त !


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