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कविता

बाबा का समय
शैलेंद्र कुमार शुक्ल


बाबा के न रहने के बाद
लाठी का कद सिर्फ
डंडे भर रह गया है
लेकिन लाठी को डंडा कहने में उन्हें संकोच होता है
बाबा के हाथ में लाठी देखी थी जिसने

बाबा के न रहने के बाद
दो-दो भादों पड़े एक साथ
उन कलमुँही रातों को मैंने रोते हुए देखा है

निबिया की छाँहीं कुछ सिमट सी गई है
कि गुमसुम खड़ा है दरख्त
पागलों की तरह मुँह लटकाए
अपने पतझार होने के इंतजार में
बाबा के न रहने के बाद

तरवाहे तरे
खूँटी में टँगा है बाबा का लाल कुर्ता
आले में रखी है बाबा के जूतों की जोड़ी
सुरमदनी पड़ी है लुढ़कती हुई
बूढ़ी आँखों का स्पर्श पाने के लिए
तिदवारी के सामने पसरा पड़ा है
फूटी खपरैल से गिरा हुआ धूप का एक छोटा टुकड़ा
जैसे पूछ रहा हो घर के लोगों से
क्या बुढ़ऊ नहीं रहे !
बाबा के न रहने के पहले ही
नहीं रहे थे बाबा के तेलियाए सींगों वाले बैल
अब वह लढ़ी भी नहीं थी
जिसकी चंदोई में बांधा करते थे बाबा
लाल-हरी रस्सियाँ
उन दिनों की एक फटी हुई पखारी पड़ी है
भुसौरी के कोने में
कि पड़ी है एक जाजिम
और गलीचा
धूल-माटी को समेटे उन दिनों की

बाबा के न रहने के बाद
पड़ा है बाबा के जमाने का समय
बैलों के खाली पड़े मुसिक्के चढ़ाए हुए
खारे में अपने जिस्म को कसे हुए
सफरे पर सिमटा पड़ा है बाबा के जमाने का समय
बाबा के न रहने के बाद।


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