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आलोचना

आधुनिकता के अंतर्द्वंद्वों और ग्राह्यता की मौत
सत्यम कुमार सिंह


(शशिभूषण द्विवेदी की कहानी 'एक बूढ़े की मौत' पर एकाग्र)

शशिभूषण द्विवेदी की 'एक बूढ़े की मौत' अपने अंतःआख्यान में आधुनिकता से उपजे बहुत बृहद मूल्यों, उसकी पीड़ा और पुनः उसके पीड़ित रूपांतरण के अंत की कहानी है। कहानी अपने सतह के आख्यान में बहुत साधारणता से देश-काल में प्रवेश करती है। मसलन यह बीसवीं सदी से इक्कीसवीं सदी के संक्रमण के समय की कहानी है - "हालाँकि यह बीसवीं सदी का अंत था और सारा देश इक्कीसवीं सदी में जाने को तैयार था, तब भी सदी के अधिकतर बूढ़े अभी तक अट्ठारहवीं सदी के आगे नहीं बढ़ पाए थे।" यहाँ कहानी अपने अंतःआख्यान में यह स्पष्ट कर देती है कि जिस बूढ़े की मौत की यह कहानी है वह अट्ठारहवीं सदी का नहीं बल्कि "टिपिकल मॉडर्न" पात्र है और इक्कीसवीं सदी में इसे छोड़ सभी लोग इक्कीसवीं सदी में जाने को तैयार है - वो अट्ठारहवीं सदी के बूढ़े और तमाम बच्चे, स्त्री-पुरुष, युवा सभी। लेकिन केवल एक बूढ़ा है जिसकी मौत की वजह से वो इक्कीसवीं सदी में नहीं जाएगा या फिर इक्कीसवीं सदी की वजह से इस बूढ़े की मौत घटित होगी है। इसी द्वंद्व से कहानी आगे बढ़ती है। कई जगहों पर अस्तित्ववाद का स्पष्ट जिक्र आता है परंतु कहानी के शिल्प की यह विशिष्टता बन जाती है कि पात्र के माध्यम से न केवल यह कहलवाती है कि "फलाँ विचारक/लेखक ने भी यही कहा है बल्कि यह उस दर्शन के सामाजिक-संदर्भो को कहानी के परिस्थितियों, घटनाओं में पिरोती है।

"मैं मरने के लिए स्वतंत्र नहीं हूँ बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्ति हूँ जो मरता है" - ज्याँ पाल सार्त्र। शरीर भौतिक संसार का हिस्सा है लेकिन जब यह विचार का क्षेत्र हो जाता है तो वह अपने अस्तित्व और शारीरिक सीमाओं का अतिक्रमण कर बाह्य-जगत की आंतरिक संरचनाओं का केंद्र हो जाता है। दरअसल कहानी में जानकी बाबू की मौत भी अस्तित्व और शारीरिक सीमाओं के अतिक्रमण से उपजता हुआ एक 'मेटाफर' है जो आधुनिकता का उत्तर-काल या इक्कीसवीं सदी के शुरुआत के वक्त बाह्य जगत की आंतरिक संरचनाओं के केंद्र में था।

इस कहानी को तीन चरणों में बाँट सकते है। पहले हिस्से में पात्र परिचय है जिसमें एक बूढ़ा (जानकी बाबू) है जो बूढ़े की प्रचलित छवि के विपरीत "चुस्त-दुरुस्त... सूट-बूट की तमाम आधुनिकता से लैस सत्तर-पचहत्तर की उम्र में भी खासे जवान" दीखते हैं परंतु अपने विश्वासों, आस्था की व्यवस्था में खासे पारंपरिक थे। "विशुद्ध क्षत्रियों के सूर्यवंशी कुल में जन्मा... एक अविवाहित कुमार हूँ मैं!"

पात्र जानकी बाबू इसी आधुनिक और पारंपरिक मूल्यों के अंतरविरोधी संश्लिष्ट हैं। कहानी में लेखक प्रकट रूप में एक बूढ़े के मृत्यु पर कहानी लिखना चाहता है और कई बूढ़ों के जीवन पर शोध के दरम्यान ही लेखक का परिचय जानकी बाबू से होता है। एक रात जब लेखक उससे मिलने जाता है उस रात वह "परेशान, उत्साह, दुख, चिंतन" आदि में एक साथ थे और कुछ बात-चीत के बाद जानकी बाबू अपनी बात को समझाने के लिए अपनी डायरी देते हुए कहते हैं कि - "पढ़ लोगे तो समझोगे की यह बूढ़ा मरने को इतना उतावला क्यों है?" इसी रात जानकी बाबू की अज्ञात ढंग से मौत हो जाती है।

इसके बाद कहानी इस डायरी से शुरू होती है और इस "कहानी में थी एक क्रमवार डायरी"। इसे कहानी की केंद्रिका कह सकते हैं। इस डायरी से यह पता चलता है कि जानकी बाबू को सावित्री नामक वेश्या से प्रेम हुआ था और सावित्री के मर जाने के कई वर्षों बाद भी चंपा फुल या किसी भी रंग या गंध से जानकी बाबू को उनकी याद आ जाती है। डायरी के "पहले पेज पर 1997 की कोई तारीख थी लिखा था - आज अचानक सावित्री की याद आ गई। ...पास की झाड़ी में एक अकेला फूल पड़ा है... चंपा का। स्मृति पचास साल पहले घिसटती चली गई"। पचास साल पीछे यह केवल 1947 का समय नहीं है। इस काल परिवर्तन से देश परिवर्तन आसानी से रेखांकित हो सकता है। इस हिस्से का अंत सावित्री की मृत्यु तक रखा जा सकता है। सावित्री वेश्या थी किंतु कहानी में बहुत ही स्पष्टता और गुप्त वातावरण में यह दिखाया गया है कि वो क्रांतिकारियों से मिली हुई थी और उसकी मौत बम विस्फोट से होती है। जानकी बाबू को ताउम्र एक मिथक परेशान करता रहता है। मिथक में एक राक्षस है जो राजा की अतृप्त कामेच्छा से पैदा हुआ है और वह कभी भी कहीं भी पुनर्जीवित हो सकता है। जानकी बाबू की व्यथा का मूल कारण भी यही है। किंतु मौत के दिन जानकी बाबू को क्लोन के आविष्कार की सूचना भी मिलती है।

सावित्री की मौत ने जानकी बाबू को पागल बना दिया फिर वो क्रांतिकारी हो गए। गांधी जी से उनका मोहभंग हो चुका था। कहानी के इस आखिरी हिस्से में देश आजाद हो जाता है।

जानकी बाबू के अज्ञातवास में उनके आस-पास के लोग उन्हें सुभाष चंद्र बोस भी समझ बैठे थे और उनके इस भ्रम को लगभग मौन स्वीकृति देते हुए जानकी बाबू उनके बीच रहे। इस देश में बहुत सारे लोगों की यह आशावादिता अब भी बची हुई थी कि -"सुभाष बाबू सही समय पर सामने आएँगे और देश को अंग्रेजी पिट्ठुओं से बचाएँगे।"

कहते हैं जब वर्तमान से काम नहीं चलता तब अतीत के भूत को जगाया जाता है। सुभाष बाबू की उपस्थिति ऐसी ही है किंतु यहाँ कहानी के अंत में, जब जानकी बाबू की मृत्यु हो जाती है, सुभाष बाबू के आने का विश्वास भी खत्म होता है। यह एक खास विचारधारात्मक उक्ति प्रचलन में रही आई है कि 'विचार मर नहीं सकता' किंतु विचार को 'को-आप्ट' किया जा सकता है उसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। ठीक इसी तरह राष्ट्र के बारे में भी यह कहा जा सकता है कि संस्कृति और मूल्य 'इन्वेंट' (Invented) किए जा सकते हैं। तो इस कहानी में जानकी बाबू के मौत के साथ ही राष्ट्र निर्मिति के दौरान बने नायकों में से एक 'इनवेंटेड ट्रेडीशन'/आविष्कृत परंपरा का अंत भी होता है।

चिंतक एवं फ्रैंकफर्ट स्कूल के संस्थापक एडर्नो एवं होर्खाइमर ने एक पुस्तक लिखी थी - 'द डायलेक्टिक्स ऑफ एनलाइटेनमेंट'। पुस्तक नव-पूँजीवाद के कारणों के बीज को प्रबोधन काल में ही पकड़ने की कोशिश थी। जानकी बाबू ऐसे ही पारंपरिक चेतना और वैज्ञानिक चेतना के चयन की दुविधा के विचार सरणी में आते हैं। और इसके 'आद्य छवियों' के आदर्श पात्रों के नाम लेने हो तो कई उपन्यासों, कहानियों और सामाजिक-राजनैतिक व्यक्तित्व के नाम एक ही परेड में गुजर जाते है। राजाराम मोहन राय, भगत सिंह, देवदास, इसके अलावा अमिताभ घोष के उपन्यास में नील हालदार का पात्र सभी लगभग एक जैसे सामाजिक परिस्थिति के परिणाम से दीखते और इस कहानी में भी जानकी बाबू का चरित्र ऐसा ही किंतु अपने सामाजिक परिवेश निर्मिति में अव्यवस्थित सा है।

यूरोप में राष्ट्र उदय की विश्व युद्ध में परिणति और तीसरी दुनिया में राष्ट्रवादी रूपांतरण की पीड़ा को कहानी में सुबकते हुए सुना जा सकता है। साम्राज्यवादी परिवेश और चिंतन और तीसरी दुनिया में इसका रूपांतरण लगभग द्वीतीय विश्वयुद्ध (सुभाष बाबू के रूप में) की भेंट चढ़ जाता है।

जिस काल की यह कहानी है वो समय के ही निधन का वक्तव्य है। 'एंड ऑफ मैन', 'डेथ ऑफ रायटर-ऑथर', 'एंड ऑफ आयडियोलॉजी', 'एंड ऑफ हिस्ट्री-थिओरी', 'क्लैश ऑफ सिविलायजेशन?'अर्थात सभ्यताओं का अंत, और अंततः 'एंड ऑफ डेफिनेशन' प्रख्यात नव-साहित्यिक-सैद्धांतिक आलोचक होमी के. भाभा ने लिखा है -'साम्राज्यवादी फतेह की धूल के परिणामस्वरूप योरप की आंतरिक व्यवस्था में राष्ट्र-राज्यों का उदय हुआ' किंतु इस ओर सिद्धांतकारों का ध्यान कम ही गया कि द्वितीय विश्वयुद्ध दरअसल इसी राष्ट्र के उत्पत्ति का परिणाम था और इसके बाद ज्ञान और दर्शन में घोर निराशा की पीढ़ी का जन्म होता है।

आधुनिकता का प्रभाव कई बार ऐसे सामने प्रकट होता है जैसे वह समाज में सनातन है। इस कहानी में इसका अंतरद्वंद्व काफी स्पष्ट होता है और अधिकतर बार तो विरुद्धों के सामंजस्य की तरह। यथा - जानकी बाबू खुद गांधीवादी थे और उनका प्रेम सावित्री से होता है जो क्रांतिकारी या कहें की क्रांतिकारी की सहयोगी थी। और भी - गांधी / इरविन। मिथकीय राक्षस के पुनर्जीवन / क्लोन का आविष्कार। अतीत / भविष्य। प्रेम संगीत / युद्ध संगीत। कृष्ण / नीरो।

जानकी बाबू के ब्रह्मचर्य के टूटने का वही समय होता है जब इरविन का भारत आगमन होता है। १९२६ से १९३१ तक इरविन काल काफी उथल-पुथल भरा माना गया। जानकी बाबू के संभोग का वक्त वही है जब पूरा देश जोशो-खरोश से भरा था जिसकी परिणति गांधी-इरविन समझौते में होती है। कहानी में यह वाक्य इस पूरे परिस्थिति और राजनैतिक आग्रहों और दुराग्रहों को बहुत ही संजीदगी से प्रकट करता है - "सावित्री को बाँहों में लेकर जब मैंने उस विध्वंसक प्रक्रिया को जानना चाहा तो पाया कि मेरा गुस्सा नपुंसक है।" दरअसल लेखक उस राजनैतिक परिस्थिति की परिणामहीनता को ही नपुंसक की संज्ञा दे रहे है। कहानी से गुजरते हुए यह प्रश्न बना रहता है जो जानकी बाबू को जीवन भर परेशान भी रखता है - राक्षस के पुनर्जीवित हो जाने का। जिस दिन जानकी बाबू की मृत्यु होती उसी दिन जानकी बाबू को यह सूचना मिल गई थी कि अब मनुष्य अपनी प्रति-कृति प्रयोगशाला में स्वयं रच सकता है। जीवन भर जिसका खौफ रहा उसके यकीन में अब संदेह की कोई गुंजाइश नहीं बची। जानकी बाबू के मध्यकालीन स्वभाव किंतु उनके विज्ञान पर आस्था को तो प्रकट करता है साथ ही अतीत और भविष्य के इस अवचेतन के समागम में वर्तमान में किसी की मृत्यु तय होती है या कहें कि मृत्यु भी प्राकृतिक या भौतिक नहीं एक प्रयास या प्रविधि से पुष्ट होती दिखाई देती है जो पुनर्जन्म या आत्मा को मान्यता प्रदान कर सकता है। हाराकिरी इसी संभावना की ओर इशारा है।

लेकिन इस मनो-अवस्था तक पहुँचने की प्रक्रिया भी काफी विरोधाभासी रही। सावित्री के मृत्यु के बाद सरयु के किनारे जब जानकी बाबू को बाँसुरी की धुन बजाने वाली बुढ़िया मिलती है तब भी जानकी बाबू को अपना प्रेम (सावित्री) याद आता है। परंतु बाँसुरी की धुन में 'युद्ध का तुमुलघोष है' इसके बाद जानकी बाबू स्वयं इस धुन को साधने के पीछे दीवाने हो गए। कहानी में ऐसी आशंका जाहिर होती है जो प्रथम प्रेम के काल में योरप की परिस्थितियों में हुआ और मनुष्यता को द्वितीय विश्वयुद्ध और बमों के धमाके में धकेल दिया । ठीक वही 'युद्ध का तुमुलघोष' अब तीसरी दुनिया में प्रकट होने का भय है। किंतु यह इतना छलावे की तरह होगा कि उसके वाद्य माध्यम प्रेम के होंगे या ऐसी भ्रम-रंचना में यह सब होगा कि सुभाष बाबू के आने की आशावादिता की आवश्यकता ही नहीं है। विज्ञान और धर्मांधता के गठजोड़ से 'क्लोन' अब संभव है वो सौभाषिक कमियों का समाज नहीं बल्कि उसे विचार क्षेत्र से निकाल 'जीन-क्षेत्र' में ले आया गया है।


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