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कविता

यात्रा
बाबुषा कोहली


चलने से पहले मैंने अपनी जेबों में
कुछ स्वप्न भर लिए थे
उन दिनों मेरी आँखों में सूरज का ताप था
चमकीले स्वप्न मेरी आँखें तकते सूरजमुखी

कदमों के नीचे लेटी हुई सड़क
मुझसे ज्यादा चलती थी
एक रोज वह किसी उफनती नदी की तरह
इस ग्रह के बाँध तोड़ बाहर निकल गई

अंतरिक्ष एक खरब साल से सूखा पड़ा है

वह कैसा दौर था जब
पाँव हृदय बन जाना चाहते थे
हृदय बन जाना चाहता था आँखें
आँखें बन जाना चाहती थीं स्वप्न
स्वप्न बन जाना चाहते थे पंख

सड़कें जीवित होती हैं और भूखी भी
लाशें खाती हैं लहू पीती हैं
पैंतीस साल की औरत-सी आकर्षक और जानलेवा होती हैं
सड़कों की रगों में दौड़ते हैं इलेक्ट्रान और प्रोटौन
सड़कें स्वप्न को पछाड़ देती हैं रेस में अक्सर
ये सड़कें आदमखोर होती हैं

सूरज के सातों घोड़े दौड़ते हैं आकाश भर
सूरज टस से मस नहीं होता
जलते हुए चलने का भ्रम पैदा करता है

जीवन विरोधाभासों का अद्भुत म्यूजियम है
जहाँ ठहरा हुआ सूरज जीवित है
और लगातार चलने वाले पाँव सुन्न पड़ जाते हैं

सड़क पर कथाएँ फैली पडी हैं
और जहाँ-तहाँ बिखरे पड़े हैं टूटे रंगीन पंख
बलि माँगती सड़कों के सामने रीढ़ की हड्डी लचीली हो जाती है
बहुत पहले किसी भले आदमी ने बताया था
सूरजमुखी का रस घाव भर देता है
जेबें टटोलीं - हाथ आए लिसलिसे केंचुए और कछुए
ढीठ कदम घिसटते हैं पर सड़कों से पराजित नहीं होना चाहते

मोड़ का बुजुर्ग बरगद 'हिस्टीरिया' का शिकार लगता है
पागलों-सा राह चलते लोगों को पुकारता है
यह चेतावनी का बरगद है
यह बोध का बरगद है

एक दिन लहूलुहान कदमों का मस्तिष्क से संवाद टूटा

वहाँ से सब दिखता है - ऐसा सुना था
ठहरा हुआ सूरज बरगद से छन कर बरसते हुए कहता है -
हजार सालों का धुँधलका छँट जाएगा

दूर चौराहे पर माइकेल एंजेलो दिखता है
जो अपने ही कंधो पर 'द लास्ट जजमेंट' टाँगे चला आ रहा है

मृत्यु तराजू उठाने के पहले आँखों पर काली पट्टी बाँधती है
सारे सत्य कसाई की तरह बेरहम होते हैं
किसी की अर्थी कोई नहीं ढोता
यहाँ तक कि अर्थ भी खुद ही ढोते हैं अपनी अर्थी

सड़क कितनी भी कच्ची हो, चला जा सकता है
स्वयं तक पहुँचने की सड़क दुरूह है

अंतरिक्ष को भिगोती सड़क
सिकुड़ कर मेरे कदमों तले आ गई है
रेखाएँ हथेलियाँ लाँघ माथे तक जा पहुँची हैं
और माथा पार कर धीरे धीरे अंतरिक्ष की ओर बढ़ रही हैं
टूटने वाले तारे की विलीन होती पूँछ
मेरी हथेलियों की रेखाएँ ही हैं


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