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कविता

किसी को इतने रतजगे न दो
बाबुषा कोहली


[ अत्तिला योजेफ* के लिए]

...और एक दिन अलसुबह वो बिस्तर से उठा
सूरज सही वक्त पर अटारी पर आ बैठा था
पर रात थी कि कमबख्त ! कटी ही नहीं थी
नींद ने एक बार फिर ऊँची आवाज में उसका नाम पुकारा
वो पुकारों को अनसुना करने के मानी जानता था
कि उसकी जेबें चीख बन चुकी अपनी ही कातर पुकारों से भरी पड़ी थीं

सिक्के खन् खन् टकराते थे और हुआ यूँ साहब कि बस ! जेब कट गई

उस रोज अलसुबह कच्ची नींद में उठा था वो
कि अब पक्की नींद के लिए कुछ जुगाड़ किया जाए
और जैसा कि खबर कहती है कि सूरज एकदम सही वक्त पर अटारी पर चढ़ आया था
पर हाय ! वो रात थी कि कटी ही नहीं थी
अपनी आत्मा के हजार टुकड़ों के मुकाबले उसने अपनी देह के सौ टुकड़े कर देना चुना
ता-उम्र अपनी पीठ पर अपने ही टुकड़े बाँध कर फिरता था
जिंदगी ने उसे पीठ के दर्द दिए थे
उसके मन पर चील-गिद्धों के नाखून ताजिंदगी रहे

उस रोज धरती को चूम कर वो गहरी नींद सो गया
लोरी जैसी होती है भाप-इंजन की खड़खड़ उसके लिए
जो एक अरसे से सोया न हो

आसमान कहता है कि किसी को इतने रतजगे न दो कि वो पक्की नींद का पता ढूँढ़े
आसमान के पास आँखें हैं पर हाथ नहीं
जख्मी गर्दन पर तमगे टाँगे गए
उसकी नींद की मिट्टी पर उगा दिए गए गुलाब के फूल

आखिर शांति और सन्नाटे में कोई तो फर्क होता है

दरअसल मेरे दोस्त !
सन्नाटे न तोड़े गए तो जम्हाई आती है
कि बत्तीस साल बहुत से सवालों की उम्र होती है

* हंगेरियन कवि अत्तिला योजेफ ने 32 वर्ष की उम्र में ट्रेन की पटरियों के नीचे आ कर आत्मघात कर लिया था।


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