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कविता

हर कोई खुद को मारने पर उतारू है
बाबुषा कोहली


कैसे कोई सत्तर दफा चढ़े-उतरे जो
उम्र की सारी बारिशें नमक के टीलों में बदल जाएँ
कैसे कोई सत्तर गुरियों की माला पिरोए
जो उम्र के सारे बसंत पानी की बूँदों में ढल जाए

ऊँची शाख से लिपटे रसीले अंगूरों के गुच्छे दरअसल बाग के माली की साजिश है
वो इने-गिने ही रास्ते हैं जिन पर साँसें सरपट दौड़ती हैं
मौत हजारों-हजार तरीके से अपनी ओर रिझाती है

तुम आओ और समंदर में जहर घोल दो
बादलों को एक खाली इंजेक्शन दे दो कि पानियों के बूते कोई बच न जाए
तुम आओ और आग को भस्म कर दो
एक-एक लौ का गला घोंट दो कि रूह की अगन कभी भड़कने न पाए
तुम आओ और आसमान को चाकू से गोद दो
तारों को मार कर जमीन में गाड़ दो कि दुआ में कभी कोई हाथ न उठने पाए
तुम आओ धरती के चेहरे पर तेजाब फेंक दो
उसका पेट गोलियों से दाग दो कि दोबारा कभी वो बच्चा न जन पाए
तुम आओ और हवा के सीने में खंजर घोंप दो
ऑक्सीजन कैद कर ताबूत में रख दो कि घिसटती हुई साँसों को कुछ तो सुकून आए

तुम आओ और बोजोन को अपनी मुट्ठी में मसल दो
कि दुनिया बचने की कोई गुंजाइश भी न बचे
वो इने-गिने ही रास्ते हैं जिन पर साँसें सरपट दौडती हैं
मौत हजारों-हजार तरीके से अपनी ओर बुलाती है

मैं भी मार्स पर लेटे-लेटे सारा अ-मंगल देखूँगी
साइंसदान सुर्ख रंग की कुछ तो भी वजह बताते हैं
एक रोज मेरे हाथ में भी एक धारदार ब्लेड था
और तुम ने कलाई पर आसमान बाँध दिया था
ढलती शामों की नसों में ओ पॉजिटिव चमकता है
मार्स की मिट्टी का रंग भी कुछ और गहराता जाता है

माना कि मेरी हथेली में मगरिब नहीं है
पर सूरज है कि उँगलियों के बीच की दरारों में डूब जाता है

तो फिर मैं क्यों कर जियूँ
कि जब गाय पॉलीथीन खाती है
मछली खाशाक खाती है
आदमी सूअर खाता है और औरत चबाती है अपना ही गुलाबी कलेजा

हर कोई खुद को मारने पर उतारू है


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