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कविता

नमक
अनामिका


नमक दुख है धरती का और उसका स्वाद भी !

पृथ्वी का तीन भाग नमकीन पानी है

और आदमी का दिल नमक का पहाड़

कमजोर है दिल नमक का

कितनी जल्दी पसीज जाता है !

गड़ जाता है शर्म से

जब फेंकी जाती हैं थालियाँ

दाल में नमक कम या जरा तेज होने पर !


वो जो खड़े हैं न -

सरकारी दफ्तर -

शाही नमकदान हैं


बड़ी नफासत से छिड़क देते हैं हरदम

हमारे जले पर नमक !


जिनके चेहरे पर नमक है

पूछिए उन औरतों से -

कितना भारी पड़ता है उनको

उनके चेहरे का नमक !

जिन्हें नमक की कीमत करनी होती है अदा -

उन नमकहलालों से

रंज रखता है महासागर !

दुनिया में होने न दीं उन्होंने क्रांतियाँ,

रहम खा गए दुश्मनों पर !

गाँधी जी जानते थे नमक की कीमत

और अमरूदों वाली मुनिया भी !

दुनिया में कुछ और रहे-न-रहे -

रहेगा नमक -

ईश्वर के आँसू और आदमी का पसीना -

ये ही वो नमक है जिससे

थिराई रहेगी ये दुनिया।


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