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कविता

कूड़ा बीनते बच्चे
अनामिका


उन्हें हमेशा जल्दी रहती है

उनके पेट में चूहे कूदते हैं

और खून में दौड़ती है गिलहरी !


बड़े-बड़े डग भरते

चलते हैं वे तो

उनका ढीला-ढाला कुर्ता

तन जाता है फूलकर उनके पीछे

जैसे कि हो पाल कश्ती का !


बोरियों में टनन-टनन गाती हुई

रम की बोतलें

उनकी झुकी पीठ की रीढ़ से

कभी-कभी कहती हैं -

"कैसी हो ?, "कैसा है मंडी का हाल ?"


बढ़ते-बढ़ते

चले जाते हैं वे

पाताल तक

और वहाँ लग्गी लगाकर

बैंगन तोड़ने वाले

बौनों के वास्ते

बना देते हैं

माचिस के खाली डिब्बों के

छोटे-छोटे कई घर

खुद तो वे कहीं नहीं रहते,

पर उन्हें पता है घर का मतलब !


वे देखते हैं कि अक्सर

चींटे भी कूड़े के ठोंगों से पेड़ा खुरचकर

ले जाते हैं अपने घर !

ईश्वर अपना चश्मा पोंछता है -

सिगरेट की पन्नी उनसे ही लेकर।


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