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कविता

पहली पेंशन
अनामिका


श्रीमती कार्लेकर

अपनी पहली पेंशन लेकर

जब घर लौटीं -

सारी निलंबित इच्छाएँ

अपना दावा पेश करने लगीं।

जहाँ जो भी टोकरी उठाई

उसके नीचे छोटी चुहियों-सी

दबी-पड़ी दीख गईं कितनी इच्छाएँ !

श्रीमती कार्लेकर उलझन में पड़ीं

क्या-क्या खरीदें, किससे कैसे निबटें !

सूझा नहीं कुछ तो झाड़न उठाई

झाड़ आईं सब टोकरियाँ बाहर

चूहेदानी में इच्छाएँ फँसाईं

(हुलर-मुलर सारी इच्छाएँ)

और कहा कार्लेकर साहब से -

"चलो जरा, गंगा नहा आएँ !"


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