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निबंध

काव्य-प्रक्रिया पर कुछ टीपें
एकांत श्रीवास्तव


एक फूल का नाम
( कविता का शीर्षक)

सारसों को तो पता तक नहीं था
कि नीचे रहते हैं लोग
जो उन्हें कहते हैं सारस।
- केदारनाथ सिंह

क्या कविताओं को पता होगा कि लिखी जाने के बाद कवियों और पाठकों के समाज में उन्हें कविता कहकर पुकारा जाता है। यह भी कि उनके अलग-अलग नाम होते हैं। बिना नाम की कोई नदी नहीं होती और न बिना नाम का कोई फूल। मनुष्यों को, पक्षियों को, वृक्षों और फूलों को हम उनके नाम से पहचानते हैं। शीर्षक भी कविता की एक सुविधाजनक पहचान के लिए आवश्यक है। सिर्फ धड़ से एक प्रतिमा अधूरी है। सिर उसे संपूर्णता देता है। बिना नाम के बच्चों को पुकारना कठिन होगा। यह अजीब लगेगा और असुविधाजनक भी।

कविता का शीर्षक कैसा होना चाहिए ? होना भी चाहिए या नहीं ? क्या कविता को कोई शीर्षक देना औपचारिकता मात्र है ? आखिर एक कवि कविता के शीर्षक मात्र से क्या कहना चाहता है ? क्या शीर्षक से उस कविता की भीतरी दुनिया की एक झलक नहीं मिलनी चाहिए ? मुझे लगता है कि ये कुछ प्रश्न हैं जो कविता लिख लेने के बाद या कभी-कभी पहले भी एक कवि को परेशान करते रहते हैं। देश-विदेश के कवियों को पढ़ते हुए हम पाते हैं कि कभी-कभी शीर्षक कविता की मूल वस्तु को स्पष्ट करते हैं। कभी वे कविता में वर्णित चरित्र के नाम पर आधारित होते हैं। कभी वे कविता की कोई चमकदार, अर्थगर्भा या मार्मिक पंक्ति उठाकर रख दिए जाते हैं। कुछ कविताएँ चुनौती की तरह हमारे सामने आती हैं और उन्हें कोई शीर्षक दे पाने में हम स्वयं को असहाय पाते हैं। वे दिनों तक हमारी डायरी के पन्नों में उदास पड़ी रहती हैं - अपने नामकरण संस्कार की प्रतीक्षा में।

'मुझे पुकारती हुई पुकार' (मुक्तिबोध) एक ऐसा शीर्षक है जो अक्सर उस मोड़ पर याद आता है जहाँ हम चौंककर पलटते हैं कि जैसे किसी ने हमें पुकारा हो। यह बचपन में सुनी हुई माँ की पुकार हो सकती है जो हमारे भीतर गूँजती रहती है। यह प्रतिरोध के लिए बुलाती हुई पुकार हो सकती है या हमारे ही भीतर से उठती हुई एक नैतिक और पवित्र पुकार - हमें तमाम अनैतिक कार्यों से रोकती हुई। एक शीर्षक कविता पढ़ने से पहले ही हमें कितने-कितने भाव-धरातलों पर ले जा सकता है ! और कविता पढ़ने के बाद एक नई पुकार से हमारा सामना होता है - वह पुकार जो हमें सँवारने आती है - हमारे भीतर साहस और प्रेरणा जगाने - प्रभात भैरवी की तरह।

'बादल को घिरते देखा है', 'सतपुड़ा के घने जंगल,' 'चंद्रगहना से लौटती बेर', 'ताप के ताए हुए दिन', 'टूटी हुई बिखरी हुई' - कुछ ऐसे शीर्षक हैं जो कविता के प्रति एक सम्मोहन पैदा करते हैं और अपने पाठ के लिए व्यग्र भी। 'कुएँ में डूबी नन्हीं बच्ची, (लोर्का) अपने शीर्षक में ही त्रासद और मार्मिक है। 'यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश' (नवारुण भट्टाचार्य) एक जलती हुई जमीन के बीचों-बीच हमें खड़ा कर देता है तो 'आएँगे दिन कविताओं के' (मारिना त्स्वेतायेवा) गहरी आस्था से हमें परिपूर्ण कर जाता है।

'कितनी नावों में कितनी बार', 'बनपाँखी सुनो', 'जंगल का दर्द', 'जमीन पक रही है', 'चैत की लाल टहनी', 'बची हुई पृथ्वी', 'दूर से अपना घर देखना चाहिए', 'पिता के जूते', 'दुनिया रोज बनती है', 'पुल पर पानी', 'समुद्र पर हो रही है बारिश', 'पहाड़ पर लालटेन', 'अपनी केवल धार', 'मिट्टी का चेहरा', 'सात भाइयों के बीच चंपा' - ये शीर्षक खिड़कियों की तरह हमारे सामने खुलते हैं जिनसे एक दूसरी दुनिया की झलक दिखाई पड़ती है। कोई शीर्षक अर्थगर्भा हो सकता है, कोई कर्णप्रिय और प्रियदर्शी। कोई लोकमाटी की गंध से सराबोर और कोई अपनी भीतरी दुनिया के रक्त और कीचड़ में लिथड़कर हाँफता हुआ। एक कवि को हर समय ऐसे शीर्षक की तलाश रहती है जो तीर की तरह आए और हमारी सुकून-भरी नींद में बिंध जाए या 'अर्द्धरात्रि में एक पक्षी की आवाज' (ओसिप मंदेलश्ताम) की तरह सुनाई दे। वह 'बाँस का पुल' (सर्वेश्वर) की तरह तेज अंधड़ में थरथराता हुआ शीर्षक हो या 'राम की शक्तिपूजा' की तरह 'कोदंड मुष्ठि खर रुधिर स्राव' से लथ-पथ।

कविताएँ हमारी डायरी के पन्नों में दिनों तक उदास पड़ी रहती हैं - अपने नामकरण संस्कार की प्रतीक्षा में।

शिखर तक तीखी चढ़ाई
(कविता का आरंभ)

एक महान सभ्यता की तरह कभी कविता का आरंभ हुआ था - क्रौंच-वध की पीड़ा से - वियोगी होगा पहला कवि। सभ्यता का आरंभ जीवन का आरंभ था और कविता का आरंभ जीवन को सुंदर बनाने के स्वप्न के आरंभ का पर्याय था। तब से आज तक मनुष्य की साँस की तरह, उसकी भूख-प्यास और नींद की तरह कविता चलती रही है - अनवरत - एक युग से दूसरे युग तक - आदमी की कहानी कहती हुई।

लेकिन यहाँ मेरा आशय उन कुछ शब्दों या पंक्तियों के आरंभ से है जिनसे कविता शुरू होती है। 'एक समय की बात है' या 'एक था राजा' जैसी कोई भी पंक्ति आज कविता के आरंभ में कवि की मदद नहीं कर सकती। अक्सर कविता एक उलझी हुई गुत्थी की तरह एक अरसे तक हमारे भीतर घूमती रहती है और अचानक कभी कोई स्मृति, कोई अनुभव, कोई घटना, कोई गुस्सा या कोई प्रेम हमारी मदद करता है। तब उसका सिरा हमारी पकड़ में आता है। जैसे-जैसे गुत्थी सुलझती जाती है, कागज पर रचना बनती जाती है। बन जाने के बाद हम उसे कुछ संदेह से देखते हैं - तो यह कविता है। कुछ उलझे हुए, धुँधले से बिंब दिमाग में घूमते रहते हैं। कुछ शब्द लगातार गूँजते रहते हैं। कभी एक वाक्य सुनाई पड़ता है, कभी दूसरा। किस बिंब या शब्द या वाक्य से कविता आरंभ की जाए - यह कठिन समस्या एक कवि के सामने रहती है।

कभी-कभी कुछ वाक्य लिखकर हम चौंक जाते हैं कि इनसे तो कविता का अंत होना था। फिर से आरंभ की ओर जाया जाता है - फ्लैशबैक की तरह। कोई कविता एक लांग शॉट की तरह शुरू होती है, कोई कविता इतिवृत्तात्मकता के साथ आरंभ होती है तो कोई किसी मार्मिक कथन से। उपदेश या वक्तव्य से किसी कविता का आरंभ नहीं होना चाहिए - यदि कोई विवशता न हो तो। एक कवि को क्या अधिकार है कि कविता के नाम पर वह पाठक के मन में ऊब पैदा करे या उसे नसीहत दे?

कविता के आरंभ में कुछ वाक्य बुनियाद की तरह होते हैं जिन पर पूरा स्थापत्य खड़ा होता है। एक चालाक या भूल-भुलैया जैसा आरंभ पाठकों में ऊब और आलोचकों में क्रोध पैदा कर सकता है। जब जीवन बहुत व्यस्त और बहुत दौड़-भागवाला हो तब मैं किसी कविता के आरंभिक कुछ वाक्य पढ़ता हूँ। ये कुछ वाक्य ही मुझे पूरी कविता को पढ़ने के लिए या उसे वहीं छोड़ देने के लिए बाध्य करते हैं। क्या यह एक कवि या उसकी कविता के साथ अन्याय है ? शायद नहीं। हम चावल के केवल कुछ दाने देखकर उसके पकने का अनुमान लगाते हैं। एक कवि को अपनी प्रतिभा आरंभिक कुछ वाक्यों में ही प्रमाणित करनी होगी। इससे अधिक छूट उसे नहीं दी जा सकती। कविता का प्रथम पैरा या अंश भाव, भाषा, शिल्प की दृष्टि से इतना सुगठित और प्रभावकारी हो कि पाठक अपना समय इस कविता से भरना या आबाद करना पसंद करे।

या वर्षों के लंबे संघर्ष से कवि को पाठक का वह भरोसा हासिल करना होगा कि उसे लगे कि कविता उसे कुछ दे सकती है - एक स्मृति, एक स्वप्न या जीवन को जीने का साहस। फिर आरंभ कैसा भी हो - कितना भी अँधेरा या ऊबड़-खाबड़ - कविता उसे आमंत्रित करेगी।

अधित्यका में पड़ाव
(कविता का मध्य)

कविता के मध्य की तुलना उस खुले मैदान या पठार से की जा सकती है जहाँ हवाएँ निर्बाध बहती हैं और जहाँ एक कवि को कुछ भी करने की छूट है - कुछ भी लेकिन वस्तु की परिधि में। कविता के आरंभ में उसे एक कुशल नट की तरह एक तनी हुई रस्सी पर चलना होता है - जरा-सी भी चूक जानलेवा और घातक हो सकती है। आरंभ के बाद यहाँ वह कुछ राहत की साँस लेता है। यहाँ वह एक तकलीफदेह आरोह के बाद सम पर आता है और शुरू होता है विषयवस्तु का पोस्टमार्टम। कविता के औजार बहुत सूक्ष्म होते हैं - एक घड़ीसाज के औजारों की तरह। घड़ीसाज जिस घड़ी की मरम्मत करता है - वहाँ केवल एक समय दिखाई देता है जो वर्तमान है। लेकिन कविता की घड़ी का पेंडुलम समय के तीन ध्रुवों पर एक साथ अपने घंटे बजाता है। स्मृति और स्वप्न के बीच कविता वर्तमान होती है।

कोई विषय जो रोजमर्रा के जीवन में उपेक्षित था - धूल-धूसरित और कांतिहीन - वह कविता में आकर एक नई दीप्ति के साथ चमकने लगता है। कवि यहाँ उसे कई कोणों से देखता है। कविता का पूरा शरीर यहीं निर्मित होता है - निस्संदेह हृदय और आत्मा के साथ। मूर्तिकार जिस तरह मूर्ति बनाता है, ठीक उसी तरह कवि को यहाँ कविता बनानी है। कवि की ठोंक-पीट प्रत्यक्षतः सुनाई नहीं पड़ती - दो शब्दों के बीच कहीं यह छुपी रहती है। कविता अगर चरित्र पर है तो उस चरित्र के व्यक्तित्व का पुनर्निमाण होता है - जैसा वह है और जैसा उसे होना चाहिए। उस चरित्र का व्यक्ति, व्यक्ति से उठकर समष्टि में सम्मिलित हो जाता है। यहाँ बिंबों और प्रतीकों के माध्यम से प्रायः कवि वस्तुओं को एक सामाजिक संदर्भ देता है।

कविता के इस हिस्से में विश्लेषण हो सकता है, वर्णन हो सकता है, संवाद हो सकता है, बहस हो सकती है - कुछ भी - जो वस्तु के लिए, कवि-अभिप्राय की अभिव्यक्ति के लिए अभीष्ट। कवि पाठक को अपने साथ एक मोड़ तक ले जाता है। फिर पलटकर उससे कहता है - यहाँ से देखो। किसी नई दुनिया की तरफ नहीं बल्कि उसी पुरानी और जानी-पहचानी दुनिया की तरफ वह इंगित करता है और सचमुच वही दुनिया एक दूसरी दुनिया की तरह दिखाई देती है। यह मोड़ मायावी है या यह कविता का जादू है। कविता हमें एक नई दृष्टि देती है जो सजल है और मानवीय।

वस्तु के प्रति एक संपूर्ण कवि-व्यवहार से कविता यहाँ आकार लेती है।

ढलान पर पानी
(कविता का अंत)

यह आरोह का शीर्ष है। फिर अवरोह। यहाँ कवि से उम्मीद की जाती है कि उसका स्वर निर्णायक हो। पत्थरों की कोख से निकली हुई पहाड़ी नदी मैदानों में बहती हुई यहाँ अपना डेल्टा बनाती है। एक बीज ने फूल तक यात्रा कर ली है। अब उसे फल में बदलना है। धान पक चुका है। लुवाई का बखत आ गया है। कविता का अंत दरअसल कवि की उस पीड़ा का अंत है जो काव्यानुभव के साथ आरंभ हुई थी। परदा गिरनेवाला है। कलाकार को उस बीज भाव को संपूर्णता में अपने चेहरे पर प्रकट करना है जो काव्य का मूल है। विचार की तेज लपट वहाँ दिखाई देनी चाहिए। दर्शक चेहरे पर हर्ष का भाव लिए उठे या विषाद का - कला सार्थक होगी। यदि मस्तिष्क का एक तार भी झंकृत हुआ तो कला सार्थक होगी। दर्शक एक प्रश्न, एक अकुलाहट लिए भी यदि लौटता है तो यह कला की सार्थकता है लेकिन तालियों की गड़गड़ाहट की जगह यदि हॉल में सन्नाटा हो तब ? क्या यह कला की विफलता है ? अगर कोई कविता अंत में थोड़ा-सा पछतावा भी छोड़ जाती है, कोई प्रश्न या थोड़ा-सा गुस्सा, थोड़ा-सा प्रेम या कोई संकल्प, एक दृष्टि या व्यवस्था के षड्यंत्र की समझ - तो कहा जा सकता है कि उसका होना एक अर्थ रखता है।

कविता के अंत में यह कतई जरूरी नहीं कि कवि यहाँ अपने समय और समाज के बारे में कोई टिप्पणी करे या कोई दो-टूक फैसला वह दे। कवि एक साधारण मनुष्य है। अधिक से अधिक एक संवेदनशील बौद्धिक नागरिक। वह न तो मसीहा है, न ईश्वर। उससे अधिक उम्मीदें मत कीजिए। हो सकता है कि अंत में समाधान या उत्तर की बजाय वह कोई प्रश्न करे - सिर्फ प्रश्न - जो कविता की समाप्ति के बाद रिक्त बचे स्थान पर गूँजता रहे। जो हवा में टँगा रहे अपने एक अदद प्रश्नचिह्न के साथ - एक अरसे तक - उत्तर की प्रतीक्षा में या गूँजता रहे वह हमारे मस्तिष्क में, हमारे एकांत में - बार-बार हमें उत्तर के लिए बाध्य करता हुआ। 'कविता के प्रश्न अंततः सभ्यता के प्रश्न होते हैं' और उनका उत्तर उतना आसान नहीं जितना प्रायः समझ लिया जाता है। जिस दिन ये प्रश्न सुलझ जाएँगे, हमारी सभ्यता और हमारे समाज की बहुत-सी बुनियादी समस्याएँ भी सुलझ जाएँगी।

शब्द की कोई जाति नहीं होती। कविता जाति के विरुद्ध प्रश्न करती है। शब्द का कोई तथाकथित धर्म नहीं होता। कविता इस 'धर्म' के विरुद्ध प्रश्न करती है। शब्द समान अधिकारों से संपन्न रचना के अदद नागरिक होते हैं। कविता विषमता के विरुद्ध प्रश्न करती है। कहीं मंदिर ढहाया जाता है, कहीं मस्जिद तो कविता प्रश्न करती है। स्त्रियाँ जलाई जाती हैं तो कविता प्रश्न करती है। बच्चे भूखे सो जाते हैं तो कविता प्रश्न करती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बाढ़ में लघु उद्योग डूबने लगते हैं तो कविता प्रश्न करती है। बाजार से लोग खाली जेबें लिए लौट आते हैं तो कविता प्रश्न करती है। एक देश की जनता युद्ध में झोंक दी जाती है तो कविता प्रश्न करती है। भूकंप में, बाढ़ में, अकाल में, सूखे में कविता प्रश्न करती है। आजादी के पचास से अधिक वर्षों के बाद भी गाँव की हालत बद से बदतर क्यों है - कविता प्रश्न करती है। कविता भूख, गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी के बीच खड़ी होती है और प्रश्न करती है। ये प्रश्न विकट हैं और केवल एक कवि से इनके उत्तरों की उम्मीद व्यर्थ है।

लोग प्रायः कविता के सुखांत की उम्मीद करते हैं जबकि एक कवि अपनी कविता को एक त्रासद अंत देने के लिए अभिशप्त है। कविता एक स्वप्न की तरह अंत में आकर टूटने लगती है। यह शायद मनुष्य-समाज का स्वप्न है जो आजादी की पचासवीं वर्षगाँठ के समारोह में काँच की तरह गिरकर टूट गया है। पाठक को अब यहाँ केवल किरचें बटोरनी हैं और अपनी उँगलियाँ लहूलुहान कर लेनी हैं। अंत में आकर एक कविता के हाथ प्रायः खाली हैं। अपने पाठक को देने के लिए उसके पास कुछ भी शेष नहीं। अधिक से अधिक इतना हो सकता है कि कविता समाप्त करते-करते आपको उस पक्षी की आवाज सुनाई पड़े जो बचपन में कभी आम की टहनियों में छुपकर बोल रहा था और आप तुरंत एक जरूरी पत्र लिखने बैठ जाएँ - अधूरे पड़े कामों की चिंता में।

वस्तु की लोकतांत्रिकता

        कभी मुक्तिबोध ने लिखा था -
        एक पैर रखता हूँ
        कि सौ राहें फूटतीं
        व मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ

इन पंक्तियों को लिखे अड़तीस से अधिक वर्ष बीत चुके हैं लेकिन एक कवि के लिए ये पंक्तियाँ आज भी कितनी सच हैं ! एक कवि के पैर रखते ही सौ राहें फूटती हैं और वह उन सब रास्तों से गुजरना चाहता है। विषयों की कमी नहीं है। उसे 'कदम-कदम पर चौराहे मिलते हैं बाँहें फैलाए।' एक कवि के लिए इस संसार का कोई भी प्रदेश वर्जित नहीं है बल्कि वर्जित प्रदेश के लिए कविता के दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं। इस दरवाजे से कोई भी भीतर आ सकता है - धूप, हवा, पानी, पक्षी या एक टूटा हुआ पत्ता। इस दरवाजे से एक मनुष्य भीतर आता है। उसका नाम मनु भी हो सकता है। कविता इस धरती के प्रथम मनुष्य से लेकर अब तक के मनुष्य-समाज का अद्यतन लेखा-जोखा है। एक नगर में बम गिराकर उसे नष्ट कर दिया जाता है। कुछ वर्षों के बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है लेकिन कविता के शब्दों में शताब्दियों तक एक थरथराहट बनी रहती है। वह एक प्राचीन और पवित्र नदी की तरह हम तक पहुँचती है लेकिन अपने जल को दूषित होने से रोक नहीं पाती। कविता बहुत कम मनुष्य में बहुत अधिक मनुष्य को बचाए रखने का प्रयत्न करती है।

अतः कविता की विषय-वस्तु की कोई अंतिम परिधि नहीं है। वह अनंतिम है। उसकी बाँहें सब कुछ समेट लेने के लिए खुली हुई हैं - मनुष्य का गुस्सा, उसका प्रेम, उसके स्वप्न, उसकी भूख-प्यास, नींद और थकान, उसका साहस और उसका संघर्ष - सब कुछ यहाँ दर्ज होता चलता है।

आज कविता का वस्तु-संसार स्थानीय क्या अपनी राष्ट्रीय सीमाएँ पार कर चुका है। उसका परिदृश्य वैश्विक है। समाज का विकास होता गया है मगर उसी समाज में रहनेवाला मनुष्य अभी अविकसित है। वह एक विकसित समाज का अविकसित नागरिक है। यह त्रासदी है, विडंबना है। यह एक संपन्न समाज की विपन्नता है। आधुनिक विकास की चकाचौंध में मनुष्य - साधारण मनुष्य - भौतिक और नैतिक दोनों दृष्टियों से विपन्न होता चला गया है। मनुष्य और समाज के विकास का यह अंतर्विरोध संभवतः आज की कविता का केंद्रीय विषय है।

कविता यदि सामाजिक वस्तु भी है तो निस्संदेह उसकी वस्तु का दायरा बहुत विस्तृत होगा। उसकी विषयवस्तु में जन-विरोधी तंत्र का पर्दाफाश भी शामिल है और जनसमूह की ताकत की अभिव्यक्ति भी। वहाँ रात के अँधेरे में लैंपपोस्ट की धुँधली रोशनी में खड़ी एक वेश्या की व्यग्रता भी दर्ज है जो ग्राहक का इंतजार कर रही है और सुबह के धुँधलके में काम पर जाते बच्चों की तकलीफ भी। वह घर-परिवार की उस रागात्मक ऊर्जा को भी वाणी देती है जो हमारे संबंधों का आधार है। जंगल में लकड़ियाँ चुनती स्त्रियों और फैक्टरी में काम करते श्रमिकों के पसीने की टपकती बूँदों से एक कविता का विषय-संसार संपन्न होता है। इस संसार में कहीं एक माँ की पुकार सुनाई देती है तो कहीं प्रेम करती एक स्त्री की गुनगुनाहट। यहाँ काम से लौटे पिता की चप्पलें एक कोने में पड़ी मिलेंगी और चूल्हे पर खदबदाते अन्न की महक से गमकता एक घर आपको मिलेगा। कुएँ में बाल्टी के गिरने की पहली छपाक और जलपाँखियों की चोंच से थरथराता जल, एक मरते हुए व्यक्ति की आखिरी इच्छा, एक सुहागन का दिप-दिप सिंदूर, एक बच्चे की किलकारी, हत्यारों की आहटें, राजनेताओं के षड्यंत्र, बमों के धमाके, युद्ध की तैयारियाँ, दंगों में उजड़ते नगर, आगजनी में जलती बस्तियाँ, घर-गाँव से निर्वासित जन - इन सबसे भरा-पूरा संसार कविता का प्रामाणिक संसार माना जा सकता है।

इस तरह कविता सभ्यता के केंद्र से धन को खारिज कर वहाँ मनुष्य और उसकी मनुष्यता को स्थापित करने का प्रयत्न करती है। यह प्रयत्न शुभ है और नैतिक। इसी प्रयत्न में हमारी पृथ्वी का मंगल निहित है। यह प्रथम शर्त है, एक सच्ची कविता अपनी वस्तु में लोकतांत्रिक हो।

देह जो आत्मा से दीप्त है

भाषा का कोई धर्म नहीं होता। वह जहाँ बोली जाती है, वहाँ के लोक-रंग में रँग जाती है - यह देखे बिना कि उसे बोलनेवालों की जाति क्या है। वह अपनी प्रकृति में ही धर्म और जाति निरपेक्ष होती है। मनुष्यता ही भाषा का धर्म है। यह लोभ-लाभ की राजनीति है जो अपने हित के लिए भाषा के जल को प्रदूषित करती है।

क्या रचना में भाषा का कोई धर्म हो सकता है ? यदि हाँ, तो वह वस्तु को उसकी संपूर्णता में एक ईमानदार पारदर्शिता के साथ अभिव्यक्त करना हो सकता है। एक नए कवि की पहचान उसकी भाषा से होती है कि वह कहाँ से चलकर आ रहा है - किस अंचल से - वहाँ की भाषा, वहाँ की बोली-बानी के शब्द, मुहावरे आदि उसकी कविता में दिखाई दें - यह उम्मीद की जाती है। किताबी भाषा में लोक की साँस उखड़ती जाती है। पिछले कुछ वर्षों की हिंदी कविता में लोक तो आया है लेकिन लोकभाषा उस तरह से नहीं आ पाई। लोकभाषा के कुछ शब्दों को जरूर प्रवेश मिला - कविता की दुनिया में - संभवतः पहली बार।

एक गढ़ी हुई, नकली और किताबी भाषा काव्य-वस्तु को नष्ट कर सकती है। बोलचाल की और सीधे लोक से उठाई गई प्राणवान भाषा में ही वस्तु के जीवित रहने की संभावना निहित है। यद्यपि यह कार्य कठिन है। हर कवि इसे अपनी तरह से साधने का प्रयत्न करता है। बिंब और प्रतीक बहुत दूर तक कविता की भाषा को एक परिपक्वता और एक काव्यात्मकता प्रदान करते हैं। क्या हर बार हर बात अभिधा में ही कही जा सकती है ? यह उस वस्तु की माँग पर निर्भर करता है। कभी-कभी लक्षणा और व्यंजना की मार अधिक घातक हो सकती है ? बिंब हमारे दैनंदिन संसार और प्रकृति को कविता में मूर्त और सजीव करते हैं। भाषा देह होती हुई भी केवल देह नहीं है। वह काव्यात्मा से दीप्त और प्राणवान है। बिंबों और प्रतीकों के माध्यम से वह उस 'स्नेह-निर्झर' को बचाए रखने का प्रयत्न करती है जिसके बह जाने के बाद उसके 'रेत ज्यों तन' रह जाने की आशंका है।

मैं जोखिम उठाकर यह कहने को तैयार हूँ कि कविता प्रथमतः (अंततः न सही) भाषा का चमत्कार है। वस्तु की पक्षधरता, मार्मिकता और ईमानदारी अनिवार्य है मगर पर्याप्त नहीं। इसी बिना पर हर रचना कविता नहीं मानी जा सकती। वह भाषा है जो रचना की काव्यात्मकता को बनाए रखती है और उसे कविता का दर्जा प्रदान करती है। एक दुखी मनुष्य - जो कवि नहीं है - अपनी तकलीफ को अधिक मार्मिकता और ईमानदारी से व्यक्त कर सकता है लेकिन उसकी अभिव्यक्ति कविता नहीं बन सकती। इस अभिव्यक्ति को कविता बनने के लिए एक समर्थ काव्य-भाषा की जरूरत पड़ेगी। कविता के इतिहास में और उसकी दीर्घ परंपरा में इसके पर्याप्त प्रमाण हैं कि जब-जब कोई भाषा अपने जन के संघर्ष और उसकी आकांक्षा को व्यक्त करने में असमर्थ साबित हुई है, कविता उसे केंचुल की तरह छोड़कर आगे बढ़ गई है। भाषा अपनी प्रकृति में धर्म और जाति निरपेक्ष ही नहीं, बल्कि जनतांत्रिक भी होती है। दरबारों में उसकी साँस घुटने लगती है। जीवन का लोक उसे पसंद आता है, आभिजात्य नहीं।

आज की कविता की भाषा बस की धूल और धुएँ से घिरी हुई भाषा है जो ताजी हवा के लिए खिड़की के पास वाली सीट तलाश रही है। यह मिट्टी की सोंधी गंध में पगी हुई भाषा है। यहाँ ऋतु के प्रथम फूल के खिलने की आहट सुनी जा सकती है। यदि यह एक सताए हुए मनुष्य के दुख और करुणा से विगलित है तो उसके क्रोध की भट्ठी में तपी हुई भी। भाषा में कविता बची हुई है और कविता में हमारे समय और इतिहास का एक बेमालूम-सा दिखाई देनेवाला कंपन भी दर्ज है।

कविता का घर

कविता का दुर्ग अभेद्य होना चाहिए और अलंघ्य भी। यह तभी होगा जब कविता शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ हो - इस तरह कि कोई उसमें प्रवेश न पा सके।

सुगठित शिल्प में कविता की वस्तु अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त करती है। चरम लक्ष्य यानी संप्रेषणीयता। वहीं ढीले-ढाले शिल्प में उसकी केंद्रीयता विशृंखल हो सकती है। एक राजगीर एक ईंट रखता है। फिर गारा। फिर दूसरी ईंट। इस तरह तीसरी, चौथी, पाँचवीं और अंतिम ईंट और एक दीवार खड़ी हो जाती है। दीवारों से तैयार घर एक दिन बस जाता है - जीवन की आहटों और क्रियाओं से। शब्द की एक-एक ईंट से ये पंक्तियाँ तैयार होती हैं जैसे दीवार। पंक्तियों से कविता जैसे दीवारों से घर। कवि इस घर के बस जाने का स्वप्न देखता है। कविता के इस घर में एक पाठक की चंद गर्म साँसें भी यदि छूट जाती हैं तो कवि का श्रम सार्थक है। एक राजगीर का गारा मिट्टी और जल से तैयार होता है और कवि विचार की मिट्टी में संवेदना का जल मिलाकर इसे तैयार करता है। कविता के घर में रोशनी और हवा की पर्याप्त गुंजाइश होनी चाहिए और दरवाजा पूर्व दिशा की ओर - अन्यथा एक आलोचक की भृकुटि टेढ़ी हो जाएगी कि अरे, ईशान में जल और देवों के लिए जगह छोड़ी या नहीं ? आग्नेय में रसोई की अग्नि को जगह दी या नहीं ? नैऋत्य में धन के लिए स्थान और वायव्य में वायु के आने की गुंजाइश छोड़ी जानी चाहिए। अर्थात कविता का घर आलोचना के वास्तु (वस्तु नहीं) के अनुसार बनना चाहिए - ऐसी उम्मीद की जाती है। लेकिन एक अच्छी कविता हर बार आलोचना के वास्तु को बदल देती है और अपना वास्तु स्वयं तय करती है।

कविता प्रायः एक संश्लिष्ट विधा है। कवि को बहुत कम में बहुत कुछ कहना है। क्या कविता का बहुत वाचाल होना उचित है ? वहाँ कुछ संकेत हो सकते हैं, कुछ प्रतीक और बिंब। शब्द सरकारी संपत्ति नहीं हैं। इनके दुरुपयोग की इजाजत कवि को नहीं दी जा सकती। कविता का शिल्प अधिक डिटेल्स की संभावना नहीं छोड़ता। पाठक को अनुमान से काम चलाना पड़ता है। क्या इसी में कविता की शक्ति और सौंदर्य विद्यमान है ? कविता में एक घर खाली है। उसमें एक खूँटी है जिस पर एक कमीज टँगी है - धीरे-धीरे हवा में हिलती हुई। यह साफ-शफ्फाफ और पाकीजा कमीज नहीं है। धूल, मिट्टी और पसीने से सनी हुई है। कालर गंदी और आस्तीनें मुड़ी हुईं। इसकी जेब में कुछ सिक्के हैं या चाबी जो हवा चलने पर बजती है या कुछ पेपर जिनकी फड़फड़ाहट की बहुत मद्धिम आवाज पाठक तक पहुँचती है। किसकी है यह कमीज ? जिस दिन यह पहनी गई, उस दिन का रोजनामचा क्या था ? कहाँ चला गया वह इसे खूँटी पर टाँगकर ? वह - जिसकी यह कमीज है। क्या वह कभी लौटकर आएगा ? कैसा सुनसान है ! कोई बोलता क्यों नहीं ! कविता की निर्जनता में भी एक समाज उपस्थित रहता है - अपनी अनुपस्थिति में उपस्थित। एक कविता इस तरह खत्म हो जाती है जैसे बस अभी-अभी वह शुरू हुई थी और अभी उसे बहुत कुछ करना था। कविता की समाप्ति के बाद एक पाठक अकेला है - अपने अनुमान और कल्पना के साथ। और उन कुछ प्रश्नों के साथ जिन्हें एक कविता अक्सर अपने पीछे छोड़ जाती है।

कविता का शिल्प बार-बार कवि को सावधान करता है कि यहाँ कविता ही लिखी जानी है, निबंध या उपन्यास नहीं। और यदि उपन्यास भी तो कविता में उसका रूप-विधान भिन्न होगा। यह भिन्नता शिल्प की भिन्नता है। क्या त्रिलोचन की बहुचर्चित कविता 'नगई महरा' के आधार पर गद्य में एक पूरा उपन्यास नहीं लिखा जा सकता ? अवश्य। लेकिन तब उसे शिल्प के एक पृथक प्रारूप की जरूरत पड़ेगी।

बाजार में ग्राहक खरा माल देखता है। यदि वह घड़ा खरीदता है तो कुम्हार के श्रम से उसका कोई सरोकार नहीं। घड़ा सुंदर और सुडौल होना चाहिए। बेशक पानी ठंडा होना चाहिए और रिसने की कोई आशंका नहीं होनी चाहिए। जल को ठंडा रखना तो अंतिम लक्ष्य है ही मगर कोई केवल इसी वजह से कुरूप और बेडौल घड़ा नहीं खरीद लेता। यहाँ चाम भी देखा जाता है और दाम भी। रूप और वस्तु का तार्किक संतुलन आवश्यक है। कवि उस गोताखोर की तरह है जिसे गोताखोरी की कलाबाजियाँ तो दिखानी ही हैं लेकिन अंत में मुट्ठी खोलकर मोती भी दिखाना है - अन्यथा उसकी गोताखोरी में, उसके श्रम में पाठक या आलोचक की न दिलचस्पी होगी, न सहानुभूति।

वस्तु की ठोस भूमि पर भाषा और शिल्प के गहरे संस्कारों से संपन्न कविता की दीर्घायु हो सकती है अन्यथा उसकी अकाल मृत्यु का जिम्मेदार कवि स्वयं होगा।

रचना का सच

मिथ का हिंदी रूपांतरण 'गप्प' है जो साहित्य और कला में प्रयुक्त मिथ के लिए कुछ अधिक क्रूर जान पड़ता है। क्या कविता के मिथ को केवल गप्प कहकर पल्ला झाड़ा जा सकता है ? शायद नहीं। मिथ भारतीय जन-जीवन में और फलतः साहित्य में भी इतने रच-बस गए हैं कि इनके बिना संभवतः संस्कृति-मीमांसा भी अपूर्ण समझी जाएगी। मिथ की बुनियाद हटाते ही भारतीयता की स्वतंत्र और विरल पहचान की अवधारणा ही भरभराकर गिर पड़ेगी। साहित्य की एक प्रदीर्घ परंपरा में मिथ ने रचना को अधिक आत्मीय, विश्वसनीय और निस्संदेह अधिक भारतीय बनाया है। एक देश-विशेष के मिथ उस राष्ट्र-राज्य की विशिष्ट पहचान भी हैं। मिथ को गप्प की बजाय सभ्यता का आदिम विश्वास कहना अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है। इस देश की संवेदनशील जनता अपने इन आदिम विश्वासों के साथ जीती है और इन्हें टूटता देखना पसंद नहीं करती। निस्संदेह यह भावना का सत्य है लेकिन क्या भावना के सत्य को विचार और विज्ञान के सत्य से कम करके देखा जा सकता है ? यह विज्ञान और भूगोल का सत्य है कि चंद्रमा एक उपग्रह है और वहाँ ऊबड़-खाबड़ गड्ढे हैं। मगर भावना का सत्य कहता है कि चंद्रमा समुद्र-मंथन से निकला है। वह पूज्य है, देव है क्योंकि कृष्णपक्ष के बाद की काली रातों को वह अपने शीतल प्रकाश से आलोकित करता है। स्त्रियाँ उसे देखे बगैर करवा-चौथ का व्रत नहीं तोड़तीं। यह भावना का सत्य है। यह विश्वास है। यह मिथ है। जो साहित्य लोकजीवन की बारीकियों को रेखांकित करता है, वह परंपरा, मिथ और विश्वास की अवहेलना नहीं करता। विज्ञान जिस मिथ को मिथ्या मानकर अपने वस्तुपरक और तार्किक संसार से निष्कासित करता है, वही मिथ रचना में प्रायः एक आत्मीय सच बनकर प्रकट होता है।

लेकिन साहित्य या कविता में मिथ के अपने खतरे भी हैं। कविता में मिथ अपने प्रगतिशील रूप में अभिव्यक्त किया जाना चाहिए। बेशक इन प्राचीन मिथों का समय-संदर्भ वर्तमान से संपृक्त होना चाहिए। मिथ अपने आप में साध्य नहीं हैं। वे साधन हैं - काव्य-वस्तु और काव्य-अभिप्रेत को बल प्रदान करने के साधन। अतः मिथ प्रयोग का अपना जोखिम भी है जिसके प्रति जरा-सी चूक या असावधानी कविता के लिए संकट पैदा कर सकती है।

मिथ कहीं से भी लिए जा सकते हैं - रामायण से, महाभारत से या पौराणिक आख्यानों से और निस्संदेह लोक से भी। छत्तीसगढ़ में प्रायः ऐसा माना जाता है कि प्रचंड ग्रीष्म के बाद जब एक चिड़िया - भरई, की आवाज सुनाई पड़ती है तो पानी बरसता है। यह लोक का आदिम विश्वास है। यह मिथ है। एक बोलते हुए कव्वे को देखकर मन ही मन कहा जाता है कि अगर कोई पाहुन आनेवाला है तो उड़ जाओ। वह उड़ जाता है और पाहुन की प्रतीक्षा आरंभ हो जाती है - फिर चाहे वह आए या न आए। क्या इस विश्वास से केवल यह कहकर मुक्त हुआ जा सकता है कि यह अंधविश्वास है ? इन विश्वासों में ही लोकजीवन का सौंदर्य निहित है, लेकिन यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इनका अतिरेक सीमा भी बन सकता है। मिथ योजना और उसके समर्थ प्रयोग की दृष्टि से 'राम की शक्तिपूजा' और 'अंधा युग' जैसी कृतियाँ सहज ही याद आती हैं। 'तय तो यही हुआ था' शीर्षक कविता (स्व. शरद बिल्लौरे) में मिथ की प्रभावकारी अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। देवीप्रसाद मिश्र की कुछ आरंभिक कविताओं में मिथ का बहुत सावधान प्रयोग लक्ष्य किया जा सकता है। सीताकांत महापात्र उड़िया ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय कविता में अपने मिथ-विधान के लिए प्रख्यात हैं।

पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और ऋतु-परिवर्तन का कारण बनती है। दुनिया के बारे में यह कहा जाता है कि वह उम्मीद की धुरी पर घूमती है। बेशक इस उम्मीद में सभ्यता के ये आदिम विश्वास भी सम्मिलित हैं जिन्हें हम मिथ कहते हैं। अपनी प्रदीर्घ रचना-यात्रा में कविता को भी कभी न कभी इस धुरी पर घूमना पड़ता है।

ओस की एक बूँद

कविता का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा
यदि वह
ओस की एक बूँद को बचा न सके।
- पाब्लो नेरुदा

सभ्यता का कोई भी भौतिक विकास अपने आत्मिक और नैतिक विकास के बिना अपूर्ण और एकांगी है। दोनों का संतुलन आवश्यक है लेकिन दुर्भाग्य से यह संतुलन प्रायः सध नहीं पाता और सभ्यता के विकास में कुछ जगहें रिक्त छूटती जाती हैं। कविता का प्रथम उद्देश्य संभवतः इस रिक्त स्थान को भरना है। इस स्थान की रिक्तता 'ओस की एक बूँद' से भी भरी जा सकती है। यह बूँद हमारे हृदय की तरलता की द्योतक है। यह बूँद हमारी संवेदनशीलता की द्योतक है। ओस की एक बूँद - जिसके बिना कविता का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। कविता हाशिए पर आ गए मूल्यों की वकालत करती है जो अपनी केंद्रीय सत्ता से अपदस्थ कर दिए गए हैं। कविता उस अंतिम मनुष्य की रक्षा के लिए चिन्तित होती है जो भीषण समय के चक्रव्यूह में फँस गया है। ऐसे समाज में जहाँ 'समय का रथ ही घिर गया हो' वह आह्वान की तरह उठने के लिए प्रस्तुत करती है।

कविता अपनी चिंता में मानवीय है लेकिन उसकी सीमाएँ हैं। वह क्रांति नहीं कर सकती। वह स्वयं हाशिए पर खड़ी है। उसे बहुत कम लोग पढ़ते हैं। वह धनार्जन का साधन नहीं है। वह भौतिक नहीं, नैतिक संपदा से मनुष्य को संपन्न करती है और फिलहाल ज्यादातर लोगों को इसकी जरूरत नहीं है। यहाँ पोल कवि तदेयुश रोजेविच की इन पंक्तियों का स्मरण दिलचस्प होगा कि 'मेरी कविता / खेल के नए नियम ईजाद नहीं करती / कोई हिस्सा नहीं लेती खेल में / उसकी एक सुनिश्चित जगह है / जिसे उसको भरना है / अपनी जरूरतों / अपनी सीमा और विस्तार के अनुसार / चलती हुई / वह खुद अपने से भी हार जाती है / उसके सामने बहुत से कर्तव्य हैं / जिनके साथ वह कभी न्याय नहीं कर पाएगी।'

ऐसे में कभी तुलसीदास जैसे कवि भी कविता को 'स्वांतः सुखाय' कहने के लिए विवश हो गए थे। कविता सर्वप्रथम स्वयं कवि और उसकी इच्छा को अभिव्यक्त करती है। वह स्वयं अपनी बात कहती और सुनती है। वह एक थके और पराजित मनुष्य की आवाज है लेकिन इसी आवाज में फिर से उठने और जूझने का संकल्प भी निहित है। कविता का उद्देश्य सभ्यता के ध्वंस पर केवल विलाप करना नहीं है बल्कि एक नए समाज की रचना के लिए मनुष्य को प्रेरित करना भी है। इस गुरुतर दायित्व के मार्ग में अनेक बाधाएँ हैं। सबसे बड़ी बाधा तो यही कि वह स्वयं हाशिए पर है लेकिन यही क्या कम है कि इन सबके बावजूद न उसके संकल्प डिगते हैं, न उसके स्वप्न टूटते हैं। वित्तीय पूँजी और भूमंडलीकरण के इस दौर में इस नए समाज के निर्माण की आशा बहुत धूमिल दिखाई पड़ती है। लेकिन वह है। कविता के जन्म का कारण भी वही है और निस्संदेह उसका उद्देश्य भी।

यह नया समाज समता और न्याय पर आधारित होगा। वहाँ वर्ग-भेद और जाति-भेद नहीं होगा। वहाँ मनुष्यता की कीमत धन से अधिक होगी - यह एक यूटोपिया है। कविता भी कुछ कम जिद्दी नहीं है। वह स्वप्न देखना बंद नहीं करती - यह नया समाज चाहे जब बने पर फिलहाल मनुष्य बचा रहे - उन मूल्यों के साथ जिन पर एक सभ्यता टिकी होती है। यदि इतना भी हुआ तो यह कुछ कम नहीं। कविता ओस की बूँद को बचाना चाहती है। यही उसका उद्देश्य है। यही उसका धर्म है और कर्म भी। इस बूँद को मोती में बदल देने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। मोती एक कीमती रत्न चाहे हो मगर मोती बनकर बूँद अपनी तरलता खो देती है और कविता इसी तरलता को बचाने के लिए कटिबद्ध है।

स्मृति और स्वप्न के बीच

स्मृति केवल संस्मरण या आत्मकथा की रचना-सामग्री नहीं है। कला और साहित्य में स्मृति की विशिष्ट भूमिका है। स्मृति में जाना हर बार नास्टैल्जिक होना भी नहीं है। न मनुष्य स्मृतिविहीन है, न उसका जीवन। आज जिया गया जीवन कल सूर्योदय के साथ स्मृति में चला जाएगा। अभी-अभी कोई क्रिया पूर्ण हुई, कोई घटना घटित हुई और आसन्न भूतकाल में परिवर्तित हो गई। इस तरह स्मृति में चली गई। एक निरंतर वर्तमान के भीतर एक निरंतर भूतकाल सक्रिय है। वर्तमान दृश्यमान है - बाहर बहता हुआ - जल की तरह। स्मृति अंतःसलिला है - एक संपूर्ण सभ्यता और संस्कृति की जड़ें जिसमें डूबकर जीवन-रस ग्रहण करती हैं। मनुष्य की बहुत निजी स्मृति भी एक अर्थ में वहाँ सामाजिक स्मृति होती है, आनुभूतिक स्तर पर जहाँ दूसरे मनुष्यों की स्मृतियों से उसमें साम्य होता है। और यदि स्मृति का संपूर्ण स्वरूप ही सामाजिक हो - जैसे 1857 या स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति - तब वह एक राष्ट्र-राज्य की जातीय स्मृति में तब्दील हो जाती है। कहने की जरूरत नहीं कि स्मृति में ही मनुष्य और समाज का इतिहास, उसकी संस्कृति और परंपरा अक्षुण्ण रहती है। छूट गए प्रथम प्रेम की स्मृति और स्वतंत्रता-संघर्ष की स्मृति - दोनों का स्वरूप भिन्न-भिन्न होगा। स्पष्ट है कि कला में उनकी भूमिका और महत्ता भी भिन्न-भिन्न ही होगी।

जिस प्रकार एक कारीगर के लिए एक छोटे से छोटे तार, स्क्रू, पेंचकस, सूक्ष्म औजार या कील की उपादेयता होती है ठीक उसी प्रकार कविता की कार्यशाला में एक छोटी से छोटी स्मृति भी कवि के लिए जरूरी और मूल्यवान होती है। स्मृति में जाकर वर्तमान कुछ और निखर उठता है - फिर चाहे उसका सौंदर्य हो या उसकी विभीषिका। सब कुछ एक नई अर्थ-दीप्ति में चमकने लगता है। कला में दूरी एक विशेष अर्थ रखती है। कुछ दूर से एक वृक्ष को आपादमस्तक देखा जा सकता है। उसकी छाँव में खड़े होकर सान्निध्य का सुख तो प्राप्त किया जा सकता है लेकिन दृष्टि की संपूर्णता नहीं। इसलिए कवि से यह उम्मीद गलत है कि तत्काल वर्तमान को वह तत्काल कविता में बदल दे। तात्कालिकता समाचार पत्रों या लेख, निबंधों की अनिवार्यता हो सकती है लेकिन कविता में तात्कालिकता से उसकी आयु और प्रासंगिकता - दोनों संदिग्ध हो उठती हैं। यों भी कवि के पास कोई चाट का ठेला नहीं है कि वह जल्दी-जल्दी मसालेदार चटपटी चीजें तैयार करे और गरमा-गरम आपके सामने परोस दे। वर्तमान की ट्रेन जब स्मृति की सुरंग से गुजरकर आती है तब कविता में (और उससे बाहर भी) उसकी व्हिसिल बहुत दूर से और बहुत देर तक सुनाई देती है।

और स्वप्न ? वह बिल्कुल दूसरा ध्रुव है। कविता स्मृति और स्वप्न के दो ध्रुवों के बीच झूलती रहती है। दो बाँस स्मृति की भूमि पर गड़े हैं और दो स्वप्न की भूमि पर। दोनों के बीच धधकता हुआ वर्तमान है। इस धधकते वर्तमान के ऊपर तनी हुई रस्सी पर कवि को नट की तरह केवल एक बाँस के सहारे संतुलन बनाते हुए चलना पड़ता है। दूसरा और बीच का कोई रास्ता नहीं। जो आगे का मार्ग प्रशस्त करता है, वह स्मृति नहीं कोई स्वप्न होता है। स्वप्न भविष्य की रूपरेखा है। कविता स्मृति से आरंभ होती है और वर्तमान को पार करती हुई एक स्वप्न तक पहुँचती है। इस तरह वह काल के उन तीन बिंदुओं का संस्पर्श करती है जिन्हें मोटे तौर पर हम भूत, वर्तमान और भविष्य के रूप में जानते हैं। जिस तरह केवल स्वप्नजीवी कविता सामाजिक सत्य को प्रकट करने में असमर्थ होती है उसी तरह केवल स्मृति की परिक्रमा करनेवाली कविता भी अपनी सीमा स्वयं निर्धारित कर लेती है। उपर्युक्त दोनों प्रकार की कविताएँ उसी तरह नष्ट हो जाती हैं जिस तरह दीये की लौ से आसक्त पतंगे उसमें जलकर नष्ट हो जाते हैं। केवल स्मृति या केवल स्वप्न से आसक्त कविता अपना एक नास्टैल्जिक या यूटोपियन प्रति-संसार रचने लगती है।


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