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कविता

मुँडेरवा कागा काहे बोले
हरेराम द्विवेदी


मुँडेरवा कागा काहे बोले
काजानी के आवै वाला तनिको मरम न खोलै
मुँडेरवा कागा काहे बोले

करकस बोलिया अस मने भावै
जानी कवन रस घोलै
मुँडेरवा कागा काहे बोले

हनि-हनि ओरहन मारै सधिया
तिरिन-तिरिन तन तोलै
मुँडेरवा कागा काहे बोले

पुलकै पलक नयनवाँ फरकै
कउनो सुख अनमोलै
मुँडेरवा कागा काहे बोले 


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