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कविता

नाचे नि‍रखि-निरखि दरपनवाँ में
हरेराम द्विवेदी


पवना बेनियाँ डोलावे, बदरा रस बरसावै
गावै झूम झूम मनवाँ सिवनवाँ में
नाचै निरखि-निरखि दरपरनवाँ में
भिनसहरे जँतसार गीत कै बोल करेज करोवै
जइसे केहू पइठ के भित्तर लगै हियरवा टोवै
माटी सगुन जगावै, भरि नेह दुलरावै
पावे सुखवा जोगवले परनवाँ में
नाचे निरखि-निरखि दरपनवाँ में

बिहने भुइयाँ उतरि किरिनियाँ अँचरा लगै पसारै
तनै उमिर कै ताना-बाना जिनगानी पुचकारै
सगरो पसरै अँजोरिया, कत्तों रहै न अन्‍हरिया
रेंगै लागैला असरवा अँगनवाँ में
नाचे निरखि-निरखि दरपनवाँ में

मचियाँ बइठे आजी लेके छोढ़ी चलै कमोरी
देखतै बने दुलार धरै जब लैनू काढ़ि गदोरी
जियआ अस कै लोभाला, किछु कहलो न जाला
सुख सरगे क उतरै भवनवाँ में
नाचे निरखि-निरखि दरपनवाँ में

गहबर पियरी पहिर खेत में खड़ी फसिल गदराइल
सबही के मन टटकी टटकी साध लगै अँखुआइल
कइसन सपना सजोवैं, केतनी मनियाँ पिरोवैं
झाँकि-झाँकि रहैं अपने अयनवाँ में
नाचे निरखि-निरखि दरपनवाँ में

पाखे के खोता में बइठ गावै सोन चिरइया
घुटुरुन ढुरकत देखिबकइयाँ भरि जाले अँगनइया
संझा कहनी कढ़ावै, रतिया लोरी सुनावै
ममता निदिया बलावै नयनवाँ में
नाचे निरखि-निरखि दरपनवाँ में 


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